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अभिव्यक्ति आपका अधिकार पर जिम्मेदारी भी समझें सेलेब्रिटीज


अभिव्यक्ति आपका अधिकार पर जिम्मेदारी भी समझें सेलेब्रिटीज

सुनील शर्मा

अभिव्यक्ति की आजादी सभी को है और किसी भी बात पर सभी का अपना नजरिया हो सकता है। किसी भी देश में रहने वाले सभी लोग किसी बात को लेकर एकमत हो ऐसा कभी-कभार ही देखा गया है। ऐसे में कृषि कानूनों के विरोध में बैठे किसान और दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन को लेकर लोगों की विचारधारा अलग-अलग होने पर अचरज नहीं होना चाहिये। निःसंदेह अपने-अपने मंच पर बोलने की आजादी सभी को है ऐसे में विदेशियों द्वारा किसान आंदोलन के समर्थन में किये गये ट्वीट को लेकर सवाल खड़े करना उचित नहीं है। यह उनका विचार है और बोलना उनका अधिकार है जिससे उनको वंचित नहीं किया जा सकता।

अमेरिकी अभिनेत्री रेहाना और ग्रेटा थनबर्ग जैसी विश्वस्तरीय शख्सियतों के किसान आंदोलन को लेकर किये गये ट्वीट के बाद भारत सरकार द्वारा इसका विरोध दर्ज कराया गया है। वहीं बाइडेन प्रशासन द्वारा की गयी टिप्पणी का भी जवाब कड़े शब्दों में दिया गया है। समाज का एक वर्ग इसको सरकार के दमनकारी रवैये के रूप में देख रहा है और सरहद पार से आये समर्थन को किसान आंदोलन की सफलता के रूप में देख रहा है। बहस जारी है और सर्द रातों में सड़कों पर बैठे किसानों की चिंता अपने गर्म कमरों में बैठे लोग कर रहे हैं। सोशल मीडिया के योद्धा अपनी जंग लड़ रहे हैं और बुद्धिजीवियों अपनी विद्धता से परिपूर्ण पोस्टों से सर्द मौसम में भी माहौल को गरमाने में लगे हैं।

पुरानी कहावत है कि आपकी आजादी तब समाप्त हो जाती है जहां से मेरी नाक शुरू होती है। निःसंदेह रेहाना और ग्र्रेटा की चिंता को नाजायज नहीं ठहराया जा सकता बल्कि इसे उनकी मानवता के रूप में देखते हुए सार्थक रूप से लेना चाहिये। मगर यह देखना भी बेहद जरूरी है कि क्या इससे पहले उन्होंने किसी भी देश में चल रहे आंदोलन को लेकर ट्वीट किया था, या किसी देश में चल रहे आंदोलन को लेकर अपनी सहमति या असहमति जताई थी। गौरतलब है कि ट्विटर पर रेहाना के 10 करोड़ फाॅलोवर बताये जा रहे हैं जो पूरे विश्व मेे फैले हैं। उनका ट्वीट किसी भी मसले को अन्र्तराष्ट्रीय मुददे पर बदलने की ताकत रखता है। ऐसे मंे उनके ट्वीट को मामूली समझना नासमझी होगा। वहीं मात्र 18 वर्ष की आयु में अन्र्तराष्ट्रीय शख्सियत बन गयीं ग्रेटा थनबर्ग की बातों को पूरे विश्व में गंभीरता से लिया जाता है। ग्रेटा का किसान आंदोलन को समर्थन करना एक बात हो सकती है मगर उनके ट्विट के साथ किसान आंदोलन को समर्थन करने वाले लिंक को पोस्ट करना किसी भी प्रकार से जायज नहीं ठहराया जा सकता। रेहाना और ग्रेटा जैसी शख्सियतों को लोगों ने सोशल मीडिया स्टार बनाया है तो उनकी भी जिम्मेदारी है कि वह किसी भी मुद्दे को एकतरफा नजरिये से न देखें बल्कि उसके पक्ष-विपक्ष को समझते हुए अपनी ओर से उचित सलाह भी दें। क्योंकि उनके ट्वीट दुनिया भर में लोगों का नजरिया बदल सकते हैं। किसी भी गंभीर मुद्दे पर टिप्पणी करने से पहले सोशल मीडिया सेलेब्रिटीज को अपनी जिम्मेदारी समझना भी जरूरी है।

यहां एक बात पर भी विचार करना आवश्यक है कि लगभग 71 दिनों से चल रहे किसान आंदोलन पर पहले किसी विदेशी शख्सियत की निगाह क्यों नहीं गयी। आखिर 26 जनवरी को दिल्ली में हुई हिंसा के बाद ही क्यों विदेशी शख्सियतों से लेकर पाकिस्तान तक किसान आंदोलन पर चिंता जता रहा है। क्या इससे पहले दिल्ली की सीमाओं पर बैठे लोग किसान नहीं थे या उनकी मांगे पहले जायज नहीं थीं। हो सकता है कि किसानों के प्रति उनकी मानवता देर से जागी हो मगर कहीं किसान आंदोलन की आड़ में देश को तोड़ने का कार्य तो नहीं किया जा रहा। क्योंकि देश में किसी भी आंदोलन से लेकर चुनाव तक में विदेशी लोग, उनकी सरकारें और मीडिया सरकार विरोधी माहौल बनाने का प्रयास करती रही है। सरकार से लेकर जनता तक को इस दिशा में भी एक बार विचार अवश्य करना चाहिये।

किसान आंदोलन में विदेशियों के बढ़े दखल को इसकी ताकत बताने वालों को यह नहीं भूलना चाहिये कि कश्मीर मुद्दे को अन्र्तराष्ट्रीय मुद्दा बनाने का हश्र क्या हुआ था। कितनी जानें गयीं, कितने घर-बार उजड़े मगर कश्मीर मुद्दा हल नहीं हुआ। देश की संसद और मुंबई में हुए हमले को भी हम अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर ले गये लेकिन क्या किसी को भी सजा दिलाने में अन्र्तराष्ट्रीय समुदाय ने मदद की। अपनी हर लड़ाई को हमने खुद लड़ा है। ऐसे में देश के आंतरिक मुद्दे या आंदोलन के समर्थन-विरोध को देशवासियों तक ही सीमित रखना आवश्यक है। क्योंकि घर के मसले घर की चारदीवारी के भीतर ही सुलझा लेना समझदारी है।

किसान आंदोलन की आड़ में जहां राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेक रहे हैं वहीं सरकार द्वारा इस आंदोलन को समाप्त करने के सार्थक प्रयास न किये जाना पीड़ा पहुंचाता है। इन सबके बीच अन्र्तराष्ट्रीय मुद्दा बन गये भारतीय किसान अब भी सड़कों पर बैठे हैं। अगर उनकी पीड़ा को हल करना ही है तो अनावश्यक दबाव बनाने या सरकार के हर कदम को संदेह से देखना उचित नहीं होेगा। वहीं किसानों की मांगों और कृषि कानूनों को समझे बिना किसी को भी दोषी करार देने की नीयत से ऊपर उठ कर सोचना होगा। किसान और सरकार अपनी हठ को छोड़ कर सार्थक वार्ता करें और समस्या का हल निकालें, स्वस्थ लोकतंत्र के लिये यह बेहद आवश्यक है।

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