Exclusive -162 साल से नहीं मनाया जाता गगोल में दशहरा

मेरठ रीजनExclusive -162 साल से नहीं मनाया जाता गगोल में दशहरा

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Exclusive -162 साल से नहीं मनाया जाता गगोल में दशहरा

1857 में नौ क्रांतिकारियोें को पेड़ पर लटका कर दी गयी थी फांसी
दशहरे पर शोक में डूब जाता है गगोल, नहीं मनाई जाती कोई खुशी

सुनील शर्मा

मेरठ। कल दशहरा पर्व पर पूरा देश असत्य पर सत्य की जीत का जश्न मनायेगा। मगर उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर के गांव गगोल में 162 साल से दशहरा नहीं मनाया जाता है। लोगों को दशहरा के पर्व से कोई नाराजगी नहीं है बल्कि यह उनकी ओर से श्रद्धाजंलि हैे उन नौ क्रांतिकारियों को जिन्हें अंग्रेजों ने सन 1857 में दशहरे के दिन फांसी पर लटका दिया था।

तब से लेकर आज तक दशहरे के दिन उन शहीदों को याद करते हुए शोक में डूबे गगोल में चूल्हा तक नहीं जलता है और न ही किसी प्रकार की खुशी मनाई जाती है। हालांकि दशहरे के दिन गांव में किसी के यहां बच्चे का जन्म होने पर खुशी जरूर मना ली जाती है।

इस साल का दशहरा कल यानि 25 अक्टूबर को मनाया जायेगा। पूरा देश विजयदशमी के जश्न में डूबने को तैयार है। मगर गगोल में लोग दशहरा पर्व को मनाना तो दूर इस दिन को याद तक नहीं करना चाहते। क्योंकि दशहरे का नाम लेते ही वह अपनों के जाने के गम में डूब जाते हैं। 1857 में जब देश में अंग्रेजों की गुलामी से निजाज पाने के लिये क्रांति की ज्वाला धधक रही थी उस समय गगोल में भी आजादी के दीवाने आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे थे। आजादी के आंदोलन को कुचलने के लिये अंग्रेज सरकार दमनकारी रवैया अपना रही थी।

दशहरे के दिन अंग्रेजों ने गगोल गांव को चारो ओर से घेर लिया और नौ क्रांतिकारियों को गांव वालो के सामने पीपल के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था। शिब्बा सिंह, रमन सिंह, हरजस सिंह, कढेरा सिंह, राम सहाय, हिम्मत सिंह, घसीटा सिंह, बैरम और दरबा सिंह ने आजादी की जंग में बलिदान दिया था जिनकी समाधि उसी पीपल के पेड़ के नीचे बना दी गयी।

तकरीबन अट्ठारह हजार की आबादी वाले गांव गगोल में दशहरे पर ग्रामवासी शोक में डूब जाते हैं और किसी भी प्रकार की खुशी नहीं मनाते। बिजनेस बाइट्स की टीम ने आज गगोल तीर्थ पहुंच कर लोगों से वार्ता की तो बुजुर्गों ने भी कभी दशहरे का पर्व मनाने की बात से इंकार किया।

दशहरे का जिक्र करते ही बुजुर्ग रामसिंह की आंखे भर आयीं। उन्होंने कहा, जिन शहीदों के बलिदान से देश को आजादी मिली यह उनके प्रति हमारी श्रद्धाजंलि है। बुढ़ापे से झुकी कमर से लाठी के सहारे चलते भूपसिंह का कहना है कि इन नौ बलिदानियों को सरकार ने आज तक शहीद का दर्जा नहीं दिया है। इस संबंध में कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से गुहार लगायी लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई है।

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