अनूप मणि त्रिपाठी
‘मुझे खाता हुआ नेता बहुत अच्छा लगता है।’ ब्रह्म राक्षस बोला।
मैं मुस्कुराया।
‘खाता हुआ अमूमन वह दीखता कहाँ है! मगर जब वह खाते हुए दीखता है, तो लोकतंत्र में मेरा विश्वास पक्का होता है। अभी जो मैं देख रहा हूँ, उसने लोकतंत्र में मेरी आस्था डबल कर दी…’ ब्रह्म राक्षस ने एक लंबी बात एक सांस में पूरी की।
उसकी आँखें बुझी हुई थीं । वह शांत दीख रहा था। उसकी बातों में रस आ रहा था।
‘अच्छा यह सारी कवायद कहाँ से शुरू हुई… ‘ मैंने लाइट मूड में पूछा।
उसने अखबार फेंक कर मारा। मैंने खुद को बचाते हुए उसे लपका। अखबार में छपी एक फोटो देखी। एक राष्ट्रीय स्तर के नेता जी एक दलित के घर भोजन कर रहे हैं। समाचार में जिसे ‘सह भोज’ के नाम से बताया गया है।
‘पढ़ा!’ ब्रह्म राक्षस ने पूछा।
‘देखा!’
‘अखबार यह तो कहता है कि नेता जी ने दलित के घर भोजन किया, मगर अखबार यह नहीं कहता कि उस दलित ने नेता जी के साथ भोजन किया!’ उसने मुझ से लपक कर अखबार ले लिया।
‘नेता जी को खाने की जरूरत क्यों पड़ी! नेता जी ने क्यों खाया!’ ब्रह्म राक्षस ने अखबार को मोड़ते हुए पूछा।
मुझे हँसी आ गई। मैंने हँसते हुए कहा,’समाचार पत्र कहता है कि समरसता हेतु नेता जी ने दलित के यहाँ भोजन किया।’ जो अखबार कहता था,मैंने भी वही कह दिया।
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‘हम्म!’ उसकी आँखें लाल हो गईं।
‘एक दिन ऐसा करके समरसता फैलाते हैं। बाकी दिन वे आग लगाने में तत्परता दिखाते हैं ।’
‘भक्क!’
ब्रह्म राक्षस ने अट्टहास किया। उसने अखबार को ऊपर उछाला। उसके एक-एक पन्ने को इधर-उधर फेंका। फिर उस पर कूदने लगा। सांस खींचते हुए बोला,’ मैं खुद से नहीं कह रहा हूँ। इस बात की पुष्टि यह अखबार ही कर देगा जिसमें आदरणीय नेता जी की फोटो छपी है । इस अखबार में नेता जी के बयान प्रमुखता से छापे जाते हैं। आये दिन उनके बयानों से समाज सुलगता रहता है। उनके बयान अखबार की बिक्री बढ़ाते रहते हैं। इस विज्ञापन के साथ कि देश आगे बढ़ रहा है…’
मैं चुपचाप सुनता रहा और वह अखबार पर कूदता रहा। थक कर धम्म से कुर्सी पर बैठ गया। मैं बिखरे हुए पन्नों को समेटने लगा।
‘ये पन्ने तो तुम समेट लोगे,मगर नेता जी के बयानों को कैसे समेटोगे!’
‘तुमने मेरा घर गन्दा कर दिया!’ मैंने अखबार को करीने से रखते हुए कहा।
‘सुंदर! अति सुंदर!’ मैंने देखा कि वह अखबार के प्रथम पृष्ठ को देख रहा था। चित्र को देखते हुए वह आगे बोला,’चित्र मुझे अच्छा लग रहा! चित्ताकर्षक है। हर चीज का बहुत अच्छे से खयाल रखा गया है। जमीन से जुड़ा हुआ नेता वाकई जमीन पर दीख रहा है। दोनों बैठ कर खा रहे हैं। दोनों के बीच की दूरी मगर ज्यादा है!’
‘कोरोना की वजह से!कोरोना के कारण सोशल डिस्टेंसिंग है।’ उसके साथ मैं भी उस फोटो को देखने लगा।
‘अच्छा दृश्य बन पड़ा है। सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करते हुए सोशल डिस्टेंसिंग को कम किया जा रहा है।’ ब्रह्म राक्षस जोर-जोर से ताली बजाने लगा।
मैं अभी भी चित्र देख रहा था। मेरा मन उस चित्र पर अटक गया था, जैसे पेड़ पर अटकी कोई पतंग! जो नेता जी खाते दीख रहे थे, उनके विषय में कहा जाता है कि वे नहीं खाते। वे पवित्र आत्मा है। अब ऐसा सद्चरित्र नेता अगर किसी गरीब की झोपड़ी में आकर खाये तो सोसाइटी में एक स्ट्रांग मैसेज जाएगा।
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‘क्या यह समाचार पहले समाचार पत्र के पहले पृष्ठ के लिए है!’ ब्रह्म राक्षस के इस सवाल ने मेरा ध्यान खींचा। मैं उसके प्रश्न का अभी उत्तर देता कि वह बोला,’समाचार तो नहीं है ये!’
‘तो ये विज्ञापन भी नहीं है!’ मैं गुस्से से बोला।
‘घोषित रूप से तो नहीं!’ वह ठठाकर हँसा। मेरा खून खौल उठा।
‘अब इवेंट से खबर निकलती है बबुआ!’
‘डोंट कॉल मी बबुआ!’ मैं गुस्से से चीखा।
ब्रह्म राक्षस ने अखबार उठा कर लप्प से अपनी गोद में रख लिया।
‘इस तरह के आयोजन होने चाहिये! खूब होने चाहिये! माहौल बनता है। समझे तुम!’
‘जो नेता दलित के साथ भोजन कर रहे हैं, वे दलित नहीं हैं! राइट!’
‘राइट!’
‘ वे बहुत लोकप्रिय हैं । राइट!’
‘राइट!’
‘ओके! उनकी लोकप्रियता का अपना एक ठोस कारण भी है। जानते हो वह क्या है!’
‘तुम ही बताओ! काबिल हो न तुम!’
‘उन्होंने अपनी बिरादरी को खूब आगे बढ़ाया है। जो बढ़े हुए थे,उनको शासन-प्रशासन में महत्पूर्ण जगहों पर बिठाया है। अपनों को,अपने जैसों को ऊंची जगह पर बैठाने वाले खुद जमीन पर बैठे हैं…’ यह कह कर ब्रह्म राक्षस जोर से हँसा।
मैंने उससे अखबार छीन लिया। और बोला,’दफा हो यहाँ से!’
वह अविचल बैठा रहा। वह शून्य में देखते हुए बोला,’ नेता को जब वोट की भूख ज्यादा लगती है, तो वह साथ में बैठ कर खाता है। सनद रहे! साथ-साथ नहीं!’ वह खड़ा होकर इधर-उधर देखने लगा।
‘यह सीन देखकर कहो क्या कहते हो!’ रोनी सूरत हो गई थी उसकी।
‘दलित के घर जाकर खाना बहुत अच्छी बात है।’
‘तुम इसको यह क्यों नहीं कहते कि हिन्दू नेता ने हिन्दू के घर खाना खाया।’
मैं चुप रहा। देखते ही दखते उसकी आँखें लाल हो गईं। चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। हम्म! हम्म! करता हुआ, वह बेचैन होकर इधर-उधर घूमने लगा।
‘कभी यह हेडिंग क्यों नहीं लगती कि नेता जी ने सवर्णों के साथ भोजन किया!!!’ वह तेज स्वर में बोला।
‘तुमसे अच्छी चीजें देखी नहीं जाती न!’ इस बार मुझे बोलना पड़ा।
‘जनता दरबार फिर से लगाना चाहते हैं नेता जी!’ उसने अचानक कुर्सी को लात मार दी।
‘तुम निकलो यहाँ से!’ मैं चिल्लाया
‘यह वह दलित तो नहीं होगा जिसकी बरात को सवर्णों ने अपने गाँव से निकलने न दिया!’
मुझे लगा कि मुझे ही यह कमरा छोड़ देना चाहिए।
मैं जाने लगा तो पीछे से वह बोला,’ यह वह दलित तो नहीं ही होगा जिसको उसकी शादी में दलित होने की वजह से घोड़ी नहीं चढ़ने दिया गया!’
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‘तुम क्या चाहते हो नेता जी अपना सारा काम धाम छोड़कर उसे घोड़ी चढ़वाते!’ मैं उसके संकेत समझ रहा था
‘बिल्कुल!’
‘फिर तुम विज्ञापन कहकर टांट मारते!’
‘नहीं,मैं खबर कहता दोस्त और सलाम मारता!’ यह कहते ब्रह्म राक्षस तेजी से कमरे से बाहर चला गया, जैसे हवा का कोई झोंका।
‘सारा मूड खराब कर दिया’ मैं बड़बड़ाया। उसके जाने के बाद मैं अनायास ही फोटो को देखता हूँ।
नेता जी के जाने के बाद क्या उस दलित ने अपना घर गंगा जल से धुलवाया होगा!
क्यों!!! मैं मन से पूछता हूँ,मगर वह चुप रहता है।
मैं मन मारकर रह जाता हूँ…
ब्रह्म राक्षस होता तो उससे पूछता!

