ज़ीनत सिद्दीक़ी
यंगिस्तान के सम्राट डंकेश्वेर आज फिर भावुक हो गए, दरबारियों को सम्बोधित करते हुए आज फिर उनका गला रुंध गया, आवाज़ भर्रा गयी, आँखें डबडबा गयीं मगर सम्राट डंकेश्वेर ने अपने कीमती आंसुओं को बहने से रोक लिया (शायद किसी और वक्त के लिए) । आवाज़ में बड़ी पीड़ा थी, बड़ी करुणा थी. यह पीड़ा, यह दर्द पिछले एक वर्ष से दिल में धीरे धीरे इकठ्ठा हो रहा था, मौका ढूंढ रहा था कि कब छलके। अंततः परिवार के लगभग तीन लाख अपनों की मौतों के बाद उसे मौका मिल ही गया और छलक ही पड़ा. दरबारियों, मंत्रियों और संतरियों के साथ पूरे देश ने देखा कि सम्राट भावुक हुए. सम्राट रोया-सम्राट का एक शोर मच गया.
वैसे यह पहला मौका नहीं है जब सम्राट डंकेश्वर इस तरह भावुक हुए हों। सम्राट बनने से पहले जब श्री डंकेश्वर एक रियासत के राजा हुआ करते थे तब अपनी फेयरवेल स्पीच में वह भावुक हो गए थे, पप्पू सेना के उनके विरोधी उन्हें सम्राट बनने की शुभकामनाएं दे रहे थे, नहीं रोक पाए अपने आंसू।
फिर वह तब भावुक हुए जब उन्हें सम्राट घोषित कर दिया गया और उन्होंने राज दरबार में प्रवेश किया, पहले चौखट पर फिर राज दरबारियों को सम्बोधित करते हुए विशेषकर गांधीनगर के राज दरबारी के त्याग के बारे अन्य दरबारियों को बताते हुए कि कैसे उसने अपनी भरी थाली मुझे परोस दी. यह अलग बात है कि उस बेचारे ने थाली परोसी नहीं बल्कि उससे छीनी गयी थी (दिल के अरमां आंसुओं में बह गए, हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए).
इसके बाद विमुद्रीकरण के फैसले के बाद गोवा में लोगों को संबोधित करते वक्त सम्राट भावुक हो गए थे। क्योंकि नोटबंदी को लेकर पप्पू सेना लगातार हमले कर रही थी। कठोर दिल सम्राट डंकेश्वर कहाँ तक बर्दाश्त करते, फिर भावुक होना पड़ा, आवाज लरजने लगी। खुद को बड़ी मुश्किल से कंट्रोल करने के बाद बात आगे बढ़ाई।
सम्राट डंकेश्वर की आँखे एक बार फिर तब डबडबाईं जब बंगाल विजिट के दौरान पहली बार बारबेलूर मठ का दौरा किया। स्वामी विवेकानंद का कमरा खुलते ही मन विचलित हो उठा, पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं क्योंकि युवावस्था में वह साधु बनना चाहते थे और इस मठ से साधू बनाने के लिए उन्होंने तीन बार प्रार्थना की थी मगर हर बार उनकी प्रार्थना को इस मठ ने ठुकरा दिया था। छलक पड़े आंसू
फिर एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के दौरान बागी छात्र रोहित वेमुला की मौत को याद करके भावुक हो गए । बोले- एक मां ने अपना बेटा खोया है. मां से याद आया कि सम्राट डंकेश्वर अपनी माँ के संघर्षो को याद करके भी भावुक हो चुके हैं, मौका था फेसबुक हेडक्वॉर्टर में मार्क जकरबर्ग के सवाल -जवाब कार्यक्रम का, माँ के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में भर आयी उनकी आंखें। याद आ गया उन्हें वह ज़माना, वह रेलवे स्टेशन, वह चाय की ठेकरी।
अभी कुछ ही महीने पहले सम्राट डंकेश्वर तब फिर भावुक हुए बल्कि रो दिए जब पप्पू सेना के एक बाग़ी सेनापति की राज दरबार से विदाई हो रही थी.
कहने का मतलब यह है कि भले ही लोग सम्राट डंकेश्वर को कितना ही कठोर दिल कहें पर यह कठोर दिल बड़ा भावुक भी है, यह अलग बात है कि इसकी भावुकता की टाइमिंग बढ़ी सटीक होती है, बिलकुल मौके पे चौका मारने जैसी। एक बार और भी है सम्राट डंकेश्वर घर में नहीं हमेशा बाहर ही भावुक होते हैं तब जबकि देश की प्रजा उन्हें देख रही हो. याद रखिये देश की प्रजा सबकुछ देख रही है.

