ज़ीनत सिद्दीक़ी

पिछले दो तीन दिनों से यूपी की सियासत में सुस्त पड़ा हाथी हिलने डुलने लगा है, पार्टी सुप्रीमो बहन मायावती गठबंधन को लेकर सुर्ख़ियों में बनी हुई हैं। पहले ओवैसी की मीम पार्टी से न्यूज़ चैनलों में गठबंधन की ख़बरें, फिर मायावती का खंडन, मगर इससे बढ़कर जो बात रही वह थी जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनावों से दूर रहने का एलान। सियासी पंडितों का मानना है कि जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव न लड़ने का फैसला मायावती का बड़ा सोचा समझा रणनीतिक निर्णय है, मायावती का यह निर्णय एक तीर से कई शिकार वाला बताया जा रहा है.
बात पहले ओवैसी से गठबंधन की. यह बात आम तौर पर प्रचलित है कि बहुजन समाज पार्टी कभी घाटे का सौदा नहीं करती, यह परम्परा काशीराम के समय से चली आ रही है, गधे को बाप बनाना और फिर उसी बाप को गधा बताकर लात मार देना, मायावती ने यह हुनर अपने राजनीतिक गुरु काशीराम से ही सीखा है. गठबंधन की बैसाखियों के सहारे ही बहुजन समाज पार्टी ने उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक विस्तार किया और कई बार सत्ता सुख भोगा। बसपा ने भाजपा, कांग्रेस और सपा सबके साथ गठबंधन किया और बाद में दोष मढ़कर खुद को अलग किया। 2019 के लोकसभा चुनाव के समय तो यह स्थिति थी कि बसपा को यूपी में कांग्रेस से भी गया गुज़रा मान लिया गया था. यह बात सोलह आने सच है कि सपा से गठबंधन ने उसे नया जीवन दिया और बाद में संजीवनी देने वाली उसी पार्टी को बसपा ने लात मार दी. कहा, गठबंधन से हमें नुक्सान हुआ. है न बढ़िया मज़ाक़! शून्य से 10 पर पहुँचने वाली पार्टी यह बोल रही थी जबकि सपा पांच के पांच पर ही सिमटी रही, तो नुक्सान किसका हुआ? अखिलेश की नासमझी ने एक मुर्दा पार्टी को जीवित कर अपने लिए ही राह मुश्किल कर ली.
बहरहाल बहन जी का बड़ी पार्टियों से गठबंधन का प्रयोग अब पूरा हो चूका है और पिछले तजुर्बों को देखते हुए कोई भी बड़ा दल अब बसपा के साथ नहीं जाना चाहता इसलिए बात हैदराबाद से निकलकर दूसरी रियासतों में कथित रूप से मुसलमानों की सियासत करने वाली असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ गठबंधन पर आ निकली। कहते हैं जहाँ आग होती है धुंआ भी वहीँ से उठता है, इसलिए न्यूज़ चैनलों पर पुख्ता रूप से जब बसपा और मीम के गठबंधन की ख़बरें चलीं तो किसी को हैरानी नहीं हुई. यह अलग बात है कि पहले मायावती और फिर ओवैसी ने इन ख़बरों का खंडन किया। राजनीति में दो और दो चार नहीं होते और इंकार को भी लोगों ने अक्सर इक़रार में बदलते देखा है, इसलिए दोनों का यह इंकार कितना पक्का है यह आने वाले कुछ महीनों में देखने को मिल जायेगा।
अब बात जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनावों से दूरी बनाने की तो यूपी के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ठीकठाक प्रदर्शन करने वाली बसपा का यह कहना कि यह चुनाव समय की बर्बादी है, हलक़ से नहीं उतरता। अगर यह चुनाव समय कि बर्बादी हैं तो फिर पंचायत चुनावों में अपनी कामयाबी का ढिंढोरा क्यों पीटा था? अक्सर ट्वीट के सहारे अपनी बातें कहलाने वाली मायावती ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और मायावती मीडिया का सहारा तभी लेती हैं जब उन्हें लोगों तक अपनी बात पहुंचानी होती है. ओवैसी से गठबंधन का इंकार उन्होंने ट्वीट से किया मगर जिला पंचायत लड़ने से इंकार की जानकारी उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस के द्वारा दी.
दरअसल इसबार यूपी के चुनावों को लेकर कहा जा रहा है कि हवा सपा की और बह रही है, पंचायत चुनावों में बेहतरीन कामयाबी के बाद सपा की निगाहें जिला पंचायत पर हैं जिसको लेकर अखिलेश बहुत गंभीर हैं और 11 जिला अध्यक्षों की बर्खास्तगी इसी बात का सबूत है जो पार्टी प्रत्याशी का पर्चा भरवाने में नाकाम रहे. सेक्युलर-कम्युनल की राजनीति में बसपा की टक्कर समाजवादी पार्टी से ही है और वह किसी भी कीमत पर नहीं चाहती कि सपा सत्ता में आये और इसलिए उसके निशाने पर सत्तारूढ़ भाजपा न रहकर विपक्षी समाजवादी पार्टी ही रहती है. माया के इस एलान से अब बसपा के जिला पंचायत सदस्य आज़ाद हो गए हैं कि वह अपना वोट किसे दें या बेचें और सभी को मालूम है कि वोटों की खरीदारी में कौन सी पार्टी उस्ताद है. मायावती के इस निर्णय से बसपा सदस्यों की कमाई का एक रास्ता भी खुल गया है और इस फैसले से फिलहाल बसपा की दुश्मन नंबर एक सपा को नुक्सान पहुंचना लाज़मी है क्योंकि भाजपा से बड़ी खरीदार तो सपा कभी नहीं हो सकती।
आप मायावती के इस दांव को एक तरह से सत्तारूढ़ पार्टी को अपरोक्ष समर्थन भी कह सकते हैं. किसी बड़ी पार्टी से गठबंधन बिना चुनाव में जाने का परिणाम तो बसपा सुप्रीमो को अच्छी तरह मालूम है, इसलिए चुनाव बाद की स्थिति क्या बन सकती है मायावती को शायद एहसास है. पार्टियों के तमाम दावों के बावजूद स्थिति यह भी बन सकती है कि भाजपा और सपा दोनों ही बहुमत से दूर हों और तब मायावती किसके साथ जाना पसंद करेंगी यह अपने आप में बड़ा सवाल होगा। फ़िलहाल तो मायावती के हावभाव सत्ता विरोधी नहीं लग रहे हैं, उनके निशाने पर सपा और कुछ हद तक कांग्रेस ही रहते हैं मगर माया की माया को सिर्फ माया ही जानती हैं इसलिए इस मायावी बहस को यहीं पर विराम देते हैं।

