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मन्ना डे (जयंती पर विशेष)


मन्ना डे (जयंती पर विशेष)

मन्ना डे , जिन्हें प्यार से मन्ना दा के नाम से भी जाना जाता है, फिल्म जगत के सुप्रसिद्ध भारतीय पार्श्व गायक थे। उनका वास्तविक नाम प्रबोध चन्द्र डे था। मन्ना दा ने 1942 में फ़िल्म तमन्ना से अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत की और 1942 से 2013 तक लगभग 3000 से अधिक गानों को अपनी आवाज दी।हिन्दी एवं बंगाली फिल्मी गानों के अलावा उन्होंने अन्य भारतीय भाषाओं में भी अपने गीत रिकॉर्ड करवाये। भारत सरकार ने उन्हें 1971 में पद्म श्री, 2005 में पद्म भूषण एवं 2007 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया।

मन्ना दा का जन्म कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) में 1 मई 1919 को महामाया व पूरन चन्द्र डे के यहाँ हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दु बाबुर पाठशाला से पूरी करने के पश्चात स्कॉटिश चर्च कॉलेज में प्रवेश लिया। कॉलेज के दिनों वे कुश्ती और मुक्केबाजी जैसी प्रतियोगिताओं में खूब भाग लेते थे। उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे। उन्होंने विद्यासागर कॉलेज से स्नातक किया। कुश्ती के साथ मन्ना फुटबॉल के भी काफी शौकीन थे। संगीत के क्षेत्र में आने से पहले इस बात को लेकर लम्बे समय तक दुविधा में रहे कि वे वकील बनें या गायक। आखिरकार अपने चाचा कृष्ण चन्द्र डे से प्रभावित होकर उन्होंने तय किया कि वे गायक ही बनेंगे।

मन्ना डे ने संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा अपने चाचा के॰ सी॰ डे से हासिल की। उनके बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना डे के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना डे की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा – “यह कौन गा रहा है?” जब मन्ना डे को बुलाया गया तो उन्होंने उस्ताद से कहा -“बस ऐसे ही गा लेता हूँ।” लेकिन बादल खान ने मन्ना डे की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना डे 40 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिये मुंबई आ गये। और फिर यहीं के होकर रह गये। वह जुहू विले पार्ले में रहते थे।

18 दिसम्बर 1953 को केरल की सुलोचना कुमारन से उनकी शादी हुई। उनकी दो बेटियाँ हैं: शुरोमा और सुमिता। शुरोमा का जन्म 19 अक्टूबर 1956 तथा सुमिता का जन्म 20 जून 1958 को हुआ। उनकी पत्नी सुलोचना, जो कैंसर से पीड़ित थी, की मृत्यु बंगलोर में 18 जनवरी 2012 को हुई। अपने जीवन के पचास वर्ष से ज्यादा मुम्बई में व्यतीत करने के बाद मन्ना डे अन्तत: कल्याण नगर बंगलोर में जा बसे। इसी शहर में उन्होंने अन्तिम साँस ली।

पहली बार उन्हें फिल्म ‘तमन्ना’ मे बतौर प्लेबैक सिंगर सुरैया के साथ गाने का चांस मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म ‘रामराज्य’ में कोरस के रूप में गा चुके थे। इतना ही नहीं यह एक ऐसी फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को स्वर देने के लिये भी मन्ना डे का चुना था।

अपने करियर में मन्ना डे ने लोकगीत से लेकर पॉप तक सभी तरह के गीत गाए और देश विदेश में अपने हुनर से सभी को अपना मुरीद बनाया। फिल्म ‘काबुलीवाला’ का ‘ए मेरे प्यारे वतन’ और ‘आनंद’ का ‘ज़िंदगी कैसी है पहेली हाय’ आज भी संगीत प्रेमियों के जहन में उनकी याद को जिंदा रखता है। इसके अलावा ‘आजा सनम मधुर चांदनी में हम, ‘तू प्यार का सागर है’, ‘लागा चुनरी में दाग़’, ‘आयो कहां से घनश्याम’ ‘सुर न सजे’ जैसे उनके गीत आज भी उस नजाकत के साथ सुने जाते हैं, जब ये गीत आए थे।

लेकिन लंबी बीमारी के बाद 24 अक्टूबर 2013 को शरीर के कई अंगों के काम न करने से हॉस्पिटल में ही उन्होंने आखिरी सांस ली और इस तरह संगीत के जादूगर मन्ना डे इस दुनिया को अलविदा कहकर बहुत दूर चले गए।

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