जुबानी चुनावी कथाएँ

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जुबानी चुनावी कथाएँ

अनूप मणि त्रिपाठी

नेता जी कुछ सहमे-सहमे से जा रहे थे कि उनकी पत्नी ने आवाज लगाई। ‘बीस बार कहा है कि पीछे से मत टोका करो!’ नेता जी कुछ झुंझलाते हुए बोले। उनकी पत्नी उनके कहे को अनसुना करते हुए आरती की थाल उनके मुखारबिंब के सामने गोल-गोल घुमाने लगी।

‘आज आपका चुनाव प्रचार का पहला दिन है, बिना रस्म के चले जाइगा! अशुभ होता!’ नेता जी की आरती उतारते हुए बोलीं। जब आरती पूरी हो गई। नेता जी जाने को हुए तब उनकी पत्नी ने फिर टोका,‘अभी एक सबसे जरूरी रस्म तो बाकी है! ऐसे ही चले जाएंगे!!!’

‘ओह! मैं यह कैसेे भूल गया!’ नेता जी ने मन में सोचा। नेता जी फौरन अपनी जुबान बाहर निकाली। उनकी जुबान बाहर आते ही उनकी पत्नी ने उस पर तिलक लगा दिया। तिलक लगते ही नेता जी बहुत आत्मविश्वास के साथ दनदनाते हुए बाहर निकल गए।

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2

आज नेता जी सपत्निक चिकित्सक के पास पहुंचे हुए है, जो उनका मित्र भी है। कुछ दिनों से तबीयत नासाज चल रही थी। कुछ भी खाते स्वाद न मिलता। चिकित्सक मित्र ने उनका मुआयना किया। मुंह खोलने को कहा। फिर जुबान बाहर निकालाने को कहा। नेता जी ने जैसे ही अपनी जुबान बाहर निकाली। चिकित्सक मित्र चैक कर बोला,‘ ओ माइ गाॅड!!!’ ‘क्या हुआ भईया!! सब ठीक तो है न!’ नेता जी की पत्नी चितिंत हो कर बोली।

‘अरे! भाभी इतने सालों से प्रैक्टिस कर रहा हूं,मगर ऐसा तो पहली बार देख रहा हूं!’ चिकित्सक मित्र बोला।
‘क्या हुआ भईया! प्लीज बताइए न!’ नेता जी की पत्नी घबराकर बोलीं।

‘अरे भाभी! इसकी जुबान पर बैक्टीरिया से ज्यादा तो गालियां हैं!’ यह कहकर चिकित्सक मित्र जोर से हंस पड़ा। इतना सुनते ही नेता जी की जुबान हरकत में आई और उसमें से एक भारी-भरकम गाली बाहर निकल पड़ी।

3

पत्रकार जैसे ही नेता जी के घर में घुसा तो वहां का दृश्य देखकर दंग रह गया। उसने देखा कि नेता जी एक चाकू पर अपनी जुबान फेर रहे हैं। यह देखकर वह अंदर से काफी डर गया। वह वहां से उल्टे पांव लौटा। बाहर निकलते ही नेता जी के निकटस्थ सहयोगी ने शंकित हो कर पूछा,‘हो गया इंटरव्यू!’ पत्रकार ने एक सांस में अंदर देखी हुई सारी आप बीती बता दी। यह सुनकर नेता जी का निकटस्थ सहयोगी जोर से हंसा और बोला,‘अरे कुछ नहीं! कई दिनों से भाभी जी उलहाना दे रही थीं, सो आज फुर्सत में थे, तो वह चाकू में धार लगा रहे थे…’

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4

रात को देर से आए थे और सुबह जल्दी जाना था। सुबह उठ कर नेता जी ने जल्दी जल्दी ब्रश किया, फिर लगे जीभ साफ करने। ये देख कर उनकी धर्मपत्नी आग बबूला हो गईं। बोलीं,’ये क्या कर रहे हैं जी!’
‘जुबान साफ कर रहा हूं…’ नेता जी हड़बड़ाते हुए बोले।
‘तो आज प्रचार के लिए नहीं जाइयेगा!! क्या!!!’

5

नेता जी जब बोल रहे थे तब भीड़ में एक ने नेता जी का गला पकड़ लिया। यहां गला पकड़ना मुहावरा तक सीमित था, न की क्रिया। ‘पिछली बार आप जुबान दिए थे, मगर काम नहीं हुआ!’ वह आदमी बोला।
‘ऐ भाई! अगर हम तुमको जुबान दे दिए थे तो अभी हम बोल कैसे रहे थे!’ नेता जी के यह कहते ही वहां एक जोरदार ठहाका लगा। सब नेता जी की वाक्पटुता के कायल हो गए और एक जोर का नारा लगा,‘हमारा नेता कैसा हो!’

6

‘तू झूठी है!’
‘तू मक्कार है!’
‘तू गद्दार है!’
‘तू बदलचलन है!’
‘तू आवारा है!’
‘और तू…तू तो आग लगाती है!’
‘हूंउ…तू किए कराए पर पानी फेर देती है!’
‘और तू ऐसा करती है कि सिर फूट जाते हैं!’
‘तू न हो न…तेरे मालिक को कोई न पूछे!’
‘अरे तू है तो तेरे मालिक की पूछ है!’
‘एक बात तो बता!’
‘क्या!’
‘हम आपस में लड़ क्यों रहे हैं!’
‘क्योंकि हम दोनों नेता की जुबानें जो हैं!’

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7

रात के एक बजे फोन घनघनाया। डाक्टर साहब ने आंखें मींचते हुए फोन उठाया। ‘डाक्टर साहब! फौरन नेता जी के घर चले आइए! इमरजेंसी है!’ उधर से एक घबराती हुई आवाज आई। ‘हां…हां… क्या हुआ नेता जी को!’ डाक्टर धीरे से बोला। ‘अरे डाक्टर साहब क्या बताए! नेता जी अभी खाना खा रहे थे कि….’ ‘हां हैल्लो!’ डाक्टर साहब ने पूछा। नेटवर्क के चलते उसकी आवाज बीच में चली गई थी। ‘हां हेल्लो! क्या हुआ नेता जी को खाना खाते समय!’ डाक्टर साहब थोडे़ से सावधान हुए। ‘क्या बताएं डाक्टर साहब! नेता जी ने अभी दूसरा कौर मुंह में डाला ही था कि खाते वक्त उनकी जुबान कट गई! आपको फौरन बुलाया है! नेता जी कह रहे हैं जरा भी रिस्क नहीं ले सकते!!!’
‘हां भई! चुनाव का टाइम जो है!’ डाक्टर जम्हाई लेता हुआ बोला।

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