चुनिंदा चुनावी कथाएं

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चुनिंदा चुनावी कथाएं

अनूप मणि त्रिपाठी

(1)

ट्रेन आने वाली थी, जोकि पिछले चार घण्टे से आए जा रही थी। ऐसे में उसने टाइम पास की गरज से अपने को तौलने की सोची। वह खड़ा हो गया मशीन पर। उसमें से एक टिकट निकला। जिसमें एक तरफ उसका वजन पांच सौ किलो अंकित था और दूसरी तरफ ‘आप के अच्छे दिन आ गए हैं। आप का दिन शुभ हो!’ अंकित था।

उसे देखकर वो चौंका। वह मुश्किल से पचास किलो होगा और कहां ये मशीन पांच सौ बता रही है। न तो उसकी खुराक बढ़ी है, न तो उसकी तनख्वाह! कहीं थायराइड तो नहीं हो गया! उसे शंका हुई।

उसने फिर से सिक्का डाला और खुद को तौलने के लिए मशीन को समर्पित किया। नतीजा इस बार भी पांच सौ वाला ही निकला। इस बार वह मुस्कुराया। उसने सोचा कि मशीन भले ही खराब हो मगर परिणाम उसका एक ही आ रहा है।
उस का मन अभी भी नहीं माना। उसने एक बार खुद को तौला। मशीन से बाहर टिकट निकला जिस पर इस बार वजन के साथ कुछ और भी लिखा हुआ था,’ आप बार बार खुद को न तौले। आपका मौजूदा समय में वजन पांच सौ किलो ही है। आप का वजन दरसअल इसलिए बढ़ा गया है, क्योंकि देश में चुनाव चल रहा है। धन्यवाद।’

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(2)

कल रात उसकी झोपड़ी में नेता जी ने खाना खाया। इतना ही नहीं बल्कि उसके साथ खाया। अगले दिन अखबार में उसकी फोटो छपी, जिसे देखकर वह गदगद हो गया। वह अखबार लेकर निकल पड़ा। उसे जो-जो मिलता उसे वह बहुत उत्साह के साथ दिखाता। अधिकांश लोगों की प्रतिक्रिया ‘वाह अपना जुमई बड़ा आदमी हो गया अब तो!’ रही।
वह अखबार दिखाते-दिखाते अपनी प्रंशसा पाते-पाते आखिकार उस जगह पर पहुंच गया जहां के लिए वह निकला था। लाला की दुकान पर पहुंचते ही उसने लाला के सामने अखबार बढ़ा दिया। लाला ने जिसे बहुत ध्यान से देखा। इसका परिणाम सुखद निकला। आज यह पहली बार हुआ था कि लाला ने बिना जली-कटी सुनाए हुए उधारी का राशन दे दिया था।

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चुनिंदा चुनावी कथाएं
Illustration By Hasan Zaidi

(3)

सभागार में नेता जी का धाराप्रवाह भाषण चल रहा था कि तभी भूकंप आ गया। सभी लोग आनन-फानन में सभागार के बाहर भागने लगे। कुछ ने भूंकप आने का कारण नेता जी के भाषण को दिया। लेकिन मन ही मन। नेता जी पूरी तेजी के साथ भागे। मगर उनके भागने में एक बात हो गई। मारे हड़बड़ी के वह कुर्सी उठाकर भागे।

खैर,कुछ देर बात खतरा टल गया। जान-माल का कोई नुकसान नहीं हुआ। जब सारी स्थिति समान्य हो गई तब नेता जी को सहसा एहसास हुआ कि वह गफलत में सभागार के बाहर अपने साथ कुर्सी ही उठा लाए। अब वह परेशान हो गए।चुनाव का समय। विरोधियों को अगर यह बात पता चल गई तो मजाक बनाएंगे और मीडिया की तो खैर पूछो मत! अब क्या किया जाए! नेता जी ने फौरन एक पहुंचे हुए ‘अपने आदमी’ को फोन मिलाया। जो उनकी सभी खबरों को मैनेज करता था और इसके साथ अन्य चैनल-अखबारों को भी। उसने नेता जी को बेफिक्र होने का इतना आश्वासन दिया, जितना नेता जी ने अभी तक जनता से वादा भी न किया होगा। नेता जी बहुत उलझनों के साथ घर पहुंचे। डरते हुए टीवी चलाया। वहां उनकी कोई खबर नहीं थी। अगली सुबह कुछ झिझकते हुए घर में आए हुए अखबारों को एक एक करके उठाया, वहां भी उनकी खबर नादारत थी। सिर्फ एक अखबार में इस घटना का जिक्र मात्र था जिसका शीर्षक इस प्रकार से दिया गया था…
‘भाषण के दौरान आया भूंकप, नेता जी जान हथेली पर लेकर भागे…’

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(4)

नेता जी पेट के बल लेटे हुए पीठ सहित कमर की मालिश करावा रहे थे तभी उनका साला आ गया। आते ही बोला,‘मिस्त्री कह रहा था कि गाड़ी के शॉकर बदलने पडे़ंगे…और कोई चारा नहीं है!’ नेता जी कछुए की तरह अपना सिर खींचते हुए बोले, ‘यार! तब तो लंबा खर्चा बैठेगा! अभी तो स्याला अपने निर्वाचन क्षेत्र में अपन लोग एक ही बार प्रचार करने गए हैं!!!’ उनका साला इस पर कुछ बोलता कि नेता जी के मुंह से जोर की एक ‘हाय!’ निकली। जिस वक्त नेता जी के मुंह से हाय निकली ठीक उसी वक्त मालिश वाले का हाथ पीठ से फिसल कर उनकी कमर पर आ गया था।

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(5)

‘आप क्या सोचते हैं,राजनीति किस लिये होती है!’ पत्रकार ने नेता जी से पूछा।
‘देश सेवा के लिए…’ यह कहते हुए नेता जी की हँसी छूट गई।

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