कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
डॉ. दिलीप सरदेसाई

चीन के वुहान शहर से उत्पन्न कोरोना वायरस ने आज भारत ही नही सारे विश्व को अपने चपेट में ले लिया है। लाखों की संख्या में विश्व में लोग इस वायरस से संक्रमित होकर मर चुके हैं। अमेरिका, इटली, स्पेन, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकसित राष्ट्रों में भी इस वायरस ने तबाही का मंजर उत्पन्न कर दिया है। द्वितीय विश्वयुद्ध में भी इतनी जनहानि नहीं हुई थी जितनी हानि इस अदृश्य विषाणु के संक्रमण से हो रही है। समूचे विश्व में लोग एक दूसरे को शंका की निगाह से देख रहे हैं तथा हाथ मिलाने या गले लगाने से भी कतरा रहे हैं। इस वायरस का प्रसार अभी कब तक और कहाँ तक होगा तथा और कितने प्राणों की बलि चढ़ेगी इसकी भविष्यवाणी करने में ज्योतिषी, भविष्यवेत्ता, राजनेता तथा समाजशास्त्री ही नहीं चिकित्सीय विशेषज्ञ भी असमर्थ हैं, क्योंकि आज भी इस विषाणु के संक्रमण से बचाव अथवा उपचार के लिए कोई सर्वस्वीकृत औषधि अथवा टीके (वैक्सीन) नहीं हैं।

इस वायरस की विकरालता को समय से भांपते हुए “जान है तो जहान है” इस मंत्र के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने २४ मार्च की रात से ही पूरे देश में इक्कीस दिन का लॉकडाउन घोषित कर दिया था, जिसका सम्मान पूरे देश में बहुतायत में किया गया। प्रधानमंत्री द्वारा यदि ये लॉकडाउन ना किया गया होता तो कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या का ग्राफ तथा मृतकों के आंकड़ों का ग्राफ जिस घातांकी बढ़त (एक्सपोनेंशियल राइज) के साथ ऊपर की और गए होते, यह सोच कर भी मन सिहर जाता है। विश्व के अनेक राष्ट्राध्यक्षों ने मोदी के इस समयानुकूल एवं दृढ़ता पूर्वक लिए गए निर्णय का स्वागत किया है। इस लॉकडाउन से हमने निश्चित रूप से प्राणों की क्षति को एक सीमा तक बचाया है। यदि तब्लीगी समाज के दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज में सम्मिलित जमातियों द्वारा समझदारी से काम लिया गया होता तो परिस्थितियां और भी हितकर होतीं।

लॉकडाऊन – १ में इस वायरस के संक्रमण को रोकने में सफलता मिल रही है किंतु आर्थिक मोर्चे पर बड़ी क्षति होने की संभावना को देखते हुए “जान भी जहान भी” के प्रकाश में नरेंद्र मोदी ने 14 अप्रैल से कुछ रियायतों के साथ लॉकडाऊन – २ संस्करण 3 मई तक लागू कर दिया है। इस संस्करण में उन लाल-रंगित क्षेत्रों, जहां कोरोना का असीमित प्रसार है, उन्हें छोड़कर अन्य क्षेत्रों में आवश्यक व्यापारिक एवं कुछ औद्योगिक गतिविधियों के संचालन की सशर्त अनुमति दी है। इसके बाद भी यह पर्याप्त नहीं है क्योंकि लॉकडाऊन को अनंत काल तक चलाना संभव नहीं है। जनता को हो रही कठिनाइयाँ एवं वित्तीय क्षति के चलते लॉकडाऊन से बाहर निकलना आवश्यक है। लॉकडाऊन – १ के बाद लॉकडाऊन – २ लगाने से लाभ यह हुआ हैं कि संक्रमित लोगों की संख्या जो प्रारम्भ में ३.४१ दिन में दुगनी हो रही थी अब १० दिनों में हो रही है।

कोरोना के इस लॉकडाऊन से क्रमबद्ध पद्धति से बाहर आने के लिए देश के स्तर पर कई महत्वपूर्ण उपायों को लागू करना अत्यावश्यक है।
सर्वप्रथम देश के पटल पर राजनीतिक संबद्धताओं को परे रखते हुए जाति, पंथ, भाषा अथवा विचारों के मतभेदों को भुलाकर एक ऐसा समूह जिसे कोरोना कार्य दल (कोरोना टास्क फोर्स) कह सकते हैं, बनाना चाहिए। इस दल में प्रसिद्ध समाजशास्त्री, शिक्षाविद, अर्थशास्त्री तथा उद्योगपति हो जो प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को भविष्य की नीति निर्धारण के लिए परामर्श दे सकें। सारे निर्णय केवल प्रधानमंत्री कार्यालय ले यह वस्तुतः व्यावहारिक नहीं है। नीति निर्धारण के बाद उनके क्रियान्वयन के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय का उत्तरदायित्व यथावत बना रहेगा।

दूसरी बात सरकार अपने सभी लंबित भुगतानो को शीघ्रातिशीघ्र जारी करें जिससे बाजार में तरलता (लिक्विडिटी) बढ़ सके। यद्यपि रिजर्व बैंक ने रेपो रेट कम करके बैंकों की वित्तीय क्षमता को और सशक्त किया है किंतु कोरोना लॉकडाऊन से उत्पन्न विषम वित्तीय परिस्थितियों से उभरने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। कृषि क्षेत्र में रबी की फसल, विशेषकर गेहूं की कटाई, खरीद एवं ऍफ़ सी आई द्वारा भण्डारण हेतु केंद्र सरकार द्वारा लिए गए निर्णय सराहनीय हैं। छोटे और मध्यम क्षेत्र (एम एस एम इ) के उद्योगों के लिए सरकार को अधिक चिंता करने की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) के नियमों में सरकार द्वारा तत्काल में लिए गए परिवर्तन स्पष्ट रूप से चीन के निवेश के विरोध के लिए है, जिसका कुछ अर्थशास्त्रियों ने स्वागत भी किया है परंतु यह स्मरण रहे कि इस कोरोना संकट के समय जब अमेरिका की आर्थिक स्थिति अत्यंत शोचनीय है तथा भारत में चल रहे अधिकांश स्टार्टअप जैसे पेटीएम, फ्लिपकार्ट, बायजू, ड्रीम-११ आदि सभी में चीन की एक अथवा अनेक संस्थाओं के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष निवेश किया हुआ है। चीन जितना निवेश करके हमें कोई हानि नहीं होगी बल्कि उल्टा अधिक लीवरेज चीन के निवेश से कहां तक निर्लिप्त रहा जा सकता है? कोरोना के संकट से त्रस्त होकर जापान ने चीन में स्थित अपने कई उद्योगों को अन्यत्र स्थान पर स्थापित करने के लिए २.२ बिलियन डॉलर का राहत पैकेज घोषित किया है। यदि भारत सरकार जापान के उद्योगों को लाल कालीन स्वागत (रेड कारपेट वेलकम) प्रदान करें तो इनके लिए भारतीय भूमि प्रथम विकल्प होगा। उत्तर प्रदेश में अमेरिका के उद्योगपतियों के हुई वेबिनार बैठक में अमेरिका के चीन से अपने उद्योगों को स्थानांतरित करके उत्तर प्रदेश में लाने का प्रयत्न प्रशंसनीय है। कोरोना से भविष्य में होने वाली आर्थिक क्षति से देश को कैसे उभारा जाए यह अर्थशास्त्री ही ज्यादा बता सकते हैं क्योंकि इसमें 15 लाख करोड़ की क्षति एवं १० करोड़ लोगों के बेरोजगार होने का अनुमान है।

तीसरा महत्वपूर्ण निर्णय अप्रवासी मजदूरों की चिंता करने का है। हम सभी को स्मरण होगा कि पचास वर्ष पूर्व गांव में रहने वाला व्यक्ति यदि पास के शहर में सरकारी नौकरी पाता था तो भी वह गांव में रहकर ही शहर की नौकरी करना पसंद करता था। पिछले पचास वर्षों में सरकार की कृषकों के प्रति दुर्लक्षता तथा बढ़ती जनसंख्या के दबाव के कारण गांव का व्यक्ति घर छोड़कर पास के अथवा दूर के बड़े शहरों में बिना किसी निश्चित नौकरी के प्राप्त हुए केवल काम की तलाश में पहुंचा है, जिन्हें आज प्रवासी मजदूर (माइग्रेंट लेबर) कहा जा रहा है। यह सभी मजदूर नहीं है। इनमें से कई बढ़ई, विद्युत-कर्मी, संगणक-कर्मी (कंप्यूटर ऑपरेटर) इत्यादि के रूप में कार्य कर रहे हैं और ये सभी उस शहर के अब महत्वपूर्ण अंग हो गए हैं किंतु इनकी चिंता ना तो प्रदेश की सरकारों ने और ना ही स्थानीय निकायों ने की है जिसके फलस्वरूप ये आज भी खानाबदोश हैं। कोरोना संकट काल में इनके काम-धंधे छिन गए हैं और यह तत्काल घर जाना चाहते हैं। यदि कोटा की कोचिंग से छात्रों को घर पहुंचाने के लिए विशेष बसों की व्यवस्था की जा सकती है तो फिर इनके लिए क्यों नहीं? प्रदेश सरकारों को बसों की अथवा केंद्र सरकार को ट्रेन की व्यवस्था सुनिश्चित करके इन्हें घर पहुंचाना चाहिए एवं इनके जनधन खातों में सीधे डीबीटी के माध्यम से धन पहुंचाना चाहिए।

चतुर्थ निर्णय पर्याप्त संख्या में कोरोना पीड़ितों अथवा संभावित पीड़ितों के लिए प्रत्येक शहर में (विशेषतः लाल एवं नारंगी क्षेत्रों में) आश्रय तथा क्षेत्रीय स्तर पर अस्पतालों (फील्ड हॉस्पिटल) का अस्थाई निर्माण होना चाहिए क्योंकि गरीबों तथा अप्रवासी मजदूरों के लिए इसकी महती आवश्यकता होगी। यह काम तीव्रता के साथ चीन और अमेरिका दोनों ने अपने यहाँ किया है।

पांचवी बात शीघ्रातिशीघ्र कोरोना और उसके उपचार के लिए पर्याप्त संख्या में नैदानिक उपकरण (डायग्नोस्टिक किट्स), औषधीयां, टीके (वैक्सीन) जीवन-रक्षक उपकरण (वेंटिलेटर) इत्यादि की त्वरितता से व्यवस्था करनी है। इसके लिए अभी शोध-प्रक्रिया को तेज करना है। फिर तकनीक को परख कर बड़े पैमाने पर उत्पादन भी करना है। सुझाव यह है कि सरकार को अपनी ओर से एक ऐसे प्लेटफार्म का निर्माण करना चाहिए जिसमें सभी हित-धारको (स्टेक होल्डर्स) – शोधकर्ता, डॉक्टर्स, टेक्नोक्रेट्स, फार्मेसिस्ट एवं उद्योगपति अपने शोध एवं विचारों को साझा कर सकें। ऐम्स (ए आई आई एम एस) तथा आई. आई. टी. का भी सहयोग लेना चाहिए। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के कार्यकाल सन २००१ में एचआईवी-एड्स के चिंताजनक फैलाव के समय भारत के शोधकर्ताओं, दवा कंपनियों तथा डायग्नोस्टिक कंपनियों ने साझा प्रयास के माध्यम से उपचार के खर्च को जो प्रति व्यक्ति $१०००० था उसे मात्र $४०० पर लाया था। ऐसा ही सस्ता उपचार हमने मलेरिया, क्षयरोग (टीबी), डेंगू, हेपेटैटस – बी, सी, चिकनगुनिया एच१एन१ तथा २००९ के स्वाइन-फ्लू के समय में भी दिया था।

छठवीं बात यह है कि गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) का उपयोग करते हुए सरकार और जनता के बीच एक संवाद स्थापित करना चाहिए। चिकित्सा कर्मियों की जिन स्थानों पर कमी है वहां पर इन संगठनों की मदद लेनी चाहिए इसका उदाहरण बांग्लादेश है जिसने एनजीओ के माध्यम से अत्यंत त्वरिता से कोविड-19 को रोकने में सफलता पाई है।

सातवां सूत्र है कि चिकित्सा कर्मी अथवा जिन्हें आज कोरोना-वॉरियर्स कहा जा रहा है, उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मिलनी चाहिए। केंद्र सरकार ने अभी नए अध्यादेश के माध्यम से महामारी रोग कानून (एपिडेमिक डिसिज एक्ट – १८९७) में सुधार करके स्वास्थ्य कर्मियों को प्रताड़ित करने पर कड़ी शिक्षा का प्रावधान किया है, यह स्वागत योग्य है। अब प्रदेश की सरकारों द्वारा इसे कड़ाई से लागू किया जाना आवश्यक है। मेरे विचार से यह भी अपर्याप्त हैं क्योंकि यह मात्र महामारी के समय के लिए ही है जबकि सामान्य परिस्थितियों में भी स्वास्थ्य कर्मियों पर हमले होते रहे हैं। यथासंभव यदि सदैव के लिए एक कड़ा कानून बनाया गया होता तो अधिक उचित होता।

एक ओर उपरोक्त सात सूत्रीय कार्यों से लॉकडाऊन से क्रमशः बाहर निकला जा सकता है वहीं दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर भी भारत को महत्वपूर्ण नेतृत्व प्रदान करना है। जिस प्रकार चीन ने कोरोना के बढ़ते प्रकोप को छुपाया, मृतकों की संख्या कम करके प्रदर्शित की एवं इस महामारी के उपचार की प्रक्रिया को भी मानवता के हित में उजागर नहीं होने दिया, अत्यंत निंदनीय है। दूसरी ओर अमेरिका द्वारा यह शंका प्रकट किया जाना कि यह वायरस चीन द्वारा प्रयोगशाला में उत्पन्न किया गया है तथा यह विश्व की अर्थव्यवस्था का नाश करके चीन द्वारा अपने आधिपत्य को स्थापित करने की चाल है पूर्णतया दुर्भाग्यपूर्ण है। यह घटनाएं एक दूसरे के प्रति अविश्वास की खाई को और चौड़ा करती है। दूसरी ओर भारत द्वारा अमेरिका सहित ४० देशों को मलेरिया उपचार की हाइड्रोक्लोरोक्वीन की २८ करोड़ ५० लाख टेबलेट्स कोरोना के संभावित उपचार के लिए भेजी गई है। अभी-अभी भारत ने नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश को उनकी मांग पर हाइड्रोक्लोरोक्वीन टेबलेट्स, मास्क और व्यक्तिगत संरक्षण यंत्र (पीपीइ) की पर्याप्त संख्या में सहायता के रूप में प्रदान किए हैं। विश्व स्तर पर देशों के बीच घोर अविश्वास है और विश्व बंधुत्व के भाव का ह्रास हो रहा है, इसलिए भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। हम इस संकट की घड़ी में विश्व को क्या दे सकते हैं आइए इस पर भी विचार कर लें।

प्रथम पग के रूप में भारत विश्व के देशों को तथा उनकी कार्यपद्धती को अपने उदाहरण से अधिक से अधिक पारदर्शी बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। इसी तारतम्य में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के साथ विश्व के अनेक देशों का सामंजस्य स्थापित करने के लिए भारत अपना नेतृत्व प्रदान कर सकता है। इस समय जब चीन पर डब्ल्यूएचओ को कोरोना से संबंधित सूचनाएं पारदर्शिता के साथ न देने का आरोप है तथा अमेरिका द्वारा इस संगठन को प्रतिवर्ष दी जाने वाली सहायता राशि ($८९३ मिलियन) को स्थगित करने का निर्णय लिया गया है, अतः डब्ल्यूएचओ को एक ईमानदार एवं विश्वस्त नेतृत्व की आवश्यकता है। अतः मई मास में विश्व स्वास्थ्य सभा (वर्ल्ड हेल्थ असेंबली) की संभावित बैठक में भारत को विश्व के सामने अपनी बात स्पष्टता से रखनी चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने विशेष करके युवा वैज्ञानिकों एवं चिकित्सकों को आह्वान किया है कि वे कोरोना वायरस के उपचार के लिए शीघ्रातिशीघ्र औषधि एवं टीके (वैक्सीन) के अनुसंधान के लिए अपना सर्वस्व लगा दें। किसी देश और समाज के सामने ऐसी चुनौतियां यदा-कदा ही आती हैं। इसलिए एक कवि की भावना “देश हमें सब कुछ देता है, हम भी तो कुछ देना सीखे” के अनुरूप शोधकर्ताओं को यह चुनौती अत्यंत गंभीरता से लेनी चाहिए। यदि हम औषधि के शोध में सफल हो जाते हैं तो हम विश्व को “दधीचि की हड्डियां” दे सकेंगे।

भारत विश्व में आबादी के पैमाने पर दूसरे क्रमांक का तथा युवा आबादी के संदर्भ में प्रथम क्रमांक का देश है, क्योंकि हमारी ९०% आबादी ६० वर्ष से नीचे है। यह अभिशाप नहीं वरदान है। विश्व के कई देशों को आज स्वास्थ्य कर्मियों की आवश्यकता है। हम अपनी चिकित्सकीय शिक्षा (मेडिकल एजुकेशन) व्यवस्था को और सुदृढ़ करके लाखों की संख्या में प्रशिक्षित सफाईकर्मी, नर्सेज, तकनीकी विशेषज्ञ एवं चिकित्सक विभिन्न देशों की आवश्यकता के अनुसार दे सकते हैं। इसी कड़ी में कोविड-19 की रोकथाम एवं उपचार के लिए आवश्यक स्वास्थ्य उपकरणों का उत्पादन करके विश्व के अल्प विकसित राष्ट्रों को सस्ते मूल्य पर उपलब्ध भी करा सकते हैं। पूर्व में महामारी के समय हम यह भूमिका सफलतापूर्वक अदा कर चुके हैं।

चौथी बात बौद्धिक संपदा विनियमन (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी रेगुलेशन – आई पी आर) के संबंध में है। जर्मनी, कनाडा, चिली इत्यादि कुछ छोटे-बड़े देशों ने अपने विनियमन पर आवश्यक परिवर्तन करके आईपीआर के निर्गमन का रास्ता सरल बनाया है किंतु अधिकांश देशों में आई पी को देश की सीमाओं तक सीमित करके रखा हुआ है। इस वैश्विक युग में यह उचित नहीं है और भारत के नेतृत्व कि यहां भी आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने जब २२ मार्च को तालियां तथा थालियां बजाकर स्वास्थ्य कर्मियों का अभिनंदन एवं 5 अप्रैल को रात को ९:०० बजे दीप प्रज्वलन करने का आह्वान किया था तो उन्हीं भी यह ज्ञात था कि इससे कोरोना वायरस डरकर भागने वाला नहीं है। उसका लाभ यह हुआ कि बड़े सीमा तक स्वास्थ्य कर्मियों के साथ जनता ने सहयोग किया एवं यदि पश्चिम बंगाल को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो सारी प्रदेश सरकारें और केंद्र ने परस्पर सहयोग करके जनता की एकजुटता से समूचे राष्ट्र को एक सूत्र में बांधा। हमने सफलता की ओर कुछ कदम अवश्य बढ़ाए हैं किंतु अभी देश और विश्व स्तर पर बहुत आगे जाना है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व देश के स्तर पर निर्विवाद रूप से स्थापित हो चुका है और अन्य किसी दल का कोई नेता ऐसा नेतृत्व देने की क्षमता ही नहीं रखता। इतना ही नहीं वैश्विक धरातल पर भी मोदी नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं और यह भारत के लिए सौभाग्य की बात है।
ऋग्वेद की ऋचा में कहा है –

“इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम् अपघ्नन्तो अरावणः”।

इसमें अरावणः शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है कि जो अज्ञानता वश अपने संकुचित विचारों में कैद है और इसलिए दूसरों का तिरस्कार करता है और अपने को अलग-थलग रखना चाहता है, उसे सही दिशा दिखाना। भारत के जनमानस ने कृण्वन्तो विश्वम आर्यम का जो स्वप्न देखा था उसका अर्थ सैन्य बल के आधार पर सारे राष्ट्रों को जीतकर अथवा शक्ति से सभी पंथों को समाप्त कर उन्हें आर्य बनाना नहीं था, वरन जब भी विश्व को सही दिशा दिखाने की आवश्यकता होगी हम उस भूमिका को अवश्य निभाएंगे। इस कोरोना महामारी ने वह अवसर प्रदान किया है।आइए इस महामारी की त्रासदी को सुनहरे अवसर में बदलें।

डॉ. दिलीप सरदेसाई
संरक्षक, राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ उत्तर प्रदेश

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