-फरीद वारसी

ईद का दिन अल्लाह की तरफ से रोजदारों को दिया गया खुशियों का अजीम तोहफ़ा है। जिसे मुसलमान बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाते हुए अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं। इस दिन बच्चों की खुशियां देखते ही बन पड़ती हैं। कल ईद है। पर कहीं कोई रौनक, खुशी या उमंग नहीं। क्योंकि पिछले साल की तरह इस साल भी ईद महज एक औपचारिकता बन कर रह गई। कोरोना की मुखरता ने ईद को फीका कर दिया है। मालूम हो कि पिछले साल से कहीं अधिक कोविड-19 ने जान-माल की भारी तबाही मचाई। रमज़ान शरीफ में मस्जिदें भले ही सूनी हो गई हों। लेकिन घरों पर रह कर लोगों ने इबादत में कोई कमी नहीं की। अपने मालिक, अपने खालिक, अपने राजिक को राजी करने और उसकी नाराजगी दूर करने के लिए दुआएं कीं। इसमें वे छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल हैं जो ऊंगलियों में दिन गिन कर ईद का इंताजार करते थे। और नए कपड़े पहन कर खुशी-खुशी ईदगाह जाते थे। लेकिन इस साल ईद के दिन ऐसा मुमकिन नहीं। रही-सही कसर इजरायल द्वारा मस्जिद-ए-अक्सा और फिलस्तीन के बेकसूर मुसलमानों, महिलाओं और बच्चों पर किए गए बर्बरतापूर्ण हमले ने पूरी कर दी। जिसने देश के मुसलमानों में गम को और बढ़ाने का काम किया।
विदित हो कि कोरोना वायरस ने इस साल अपने देश में भारी तबाही मचाई। कोरोना की यह दूसरी लहर कब और कैसे खत्म होगी, यह कोई नहीं जानता है। बस खुदा ही खैर करे। मरने वालों की संख्या ढ़ाई लाख से भी ज्यादा के आंकड़े को पार कर गई है। और इस भयानक तबाही के कारणों से देश की मौजूदा सरकार को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। जो समय रहते वैज्ञानिकों और संसदीय समिति की चेतावनी पर सतर्क होने के बजाए राज्यों में चुनाव जीतने और सरकार बनाने की अपनी मंशा का त्याग नहीं कर पाई। आज देश के हालात सबके सामने है। जिस बिहार और बंगाल में स्वास्थ्य के मुद्दे को पीछे छोड़ते हुए हाथ फैला-फैलाकर वोट मांगे गए थे वहीं कोरोना का प्रकोप अपना तांडव मचा रहा है। पंचायत चुनावांे के चलते यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना तेजी से फैला। और दूसरी अन्य सरकारी लापरवाही के कारण देश के शेष हिस्से भी इससे अछूत नहीं है। और लगभग पूरा देश ही कोरोना की चपेट में है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि कोरोना से कहीं अधिक लोग आक्सीजन की कमी से मर रहे हैं। यही कारण है कि मोदी सरकार की इस नाकामी को देखते हुुए सुप्रीम कोर्ट को आक्सीजन आर्पूिर्त के लिए खुद ही एक टाक्स फोर्स का गठन करना पड़ा।
वहीं दूसरी तरफ कोरोना महामारी के चलते हर तरफ मानो जैसे मौत का साया मंडरा रहा हो। शमशान घाटों में शवों के अंतिम संस्कारों के लिए लगी लंबी-लंबी कतारें। उनके लिए बंटते टोकन। कब्रस्तिानों में कम पड़ती जगह। इलाज के लिए भटकते लोग। सड़कों पर मरते लोग और ऐसे में बेचारे बेबस पीड़ित परिवारजनों की ठंडी आह और रोते-बिलखते उनके चेहरे। नदियों तैराते शवों की दर्दनाक तस्वीरों और ख़बरों ने संकट, निराशा और अवसाद के इस माहौल में दुख और गम को बढ़ाने का काम किया है। अब ऐसे में सवाल यह उठता है कि कैसी ईद और किसकी ईद। महामारी ने जहां जब अपना विकराल रूप ले लिया हो तो वहां शायद ही कोई गांव, शहर या गली बची हो जहां से किसी न किसी के दिंवगत होने के समाचार न आए हों। या कोरोना से लोग संक्रमित न हुए हों। हमारे आपके तमाम रिश्तेदार, अजीज-कारीब और मिलने-झुलने वाले लोग जिसमें कोई न कोई कोरोना के कारण काल के गाल में या तो समा गया या फिर जिन्दगी मौत से जूझ रहा है। इनमें से तमाम ऐसे लोग है, जिसमें गैर-मुस्लिम भी शामिल हैं जो हर साल हमको-आपको ईद की मुबारकबाद देते थे। हमारे घरों पर ईद की सिंवाई खाने आते थे। उनमें से बहुत से ऐसे है जो अब इस दुनिया मंे नहीं रहे। ऐसा मंजर लगभग हर शहर का है। जिसके चलते स्वाभाविक रूप से ईद के त्योहार पर ग्रहण लग गया। जानी नुकसान के साथ-साथ आर्थिक नुकसान भी किसी से छिपा नहीं है। कोरोना ने बाजारों में ऐसा लग रहा है कि कभी खत्म न होने वाला सन्नाट पसार दिया हो। रमजान और ईद से जुड़े तमाम उद्योग व कारोबार चैपट हो गए। जिसके चलते छोटे और मझोले दुकानदार बहुत प्रभावित हुए। संकट की इस घड़ी में जाहिर सी बात है कि ईद मनाने का दिल तो शायद ही किसी का हो। बच्चे भी हालात को देख कर मायूस ही नहीं खामोश हो गए हैं। ईद तो फिर इंन्शाहअल्लाह अगले साल आएगी, लेकिन अपना या पराया जो चला गया वह वापस नहीं आएगा। और सभी खुदा से यही दुआ कर रहे है कि कोरोना का खात्मा हमारे शहर और मुल्क से जल्द से जल्द हो। (आमीन) जिस दिन यह समाचार आएंगे कि कोरोना देश से खत्म हो गया वह दिन भी ईद से कम न होगा। बस इसी दिन का बेसब्री से इंताजार है। तब सारा देश खुशी के इस पल को बखूबी जिएगा।

