अमिताभ@78 : “सात हिंदुस्तानी” का एक हिंदुस्तानी कैसे बना महानायक

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अमिताभ@78 : “सात हिंदुस्तानी” का एक हिंदुस्तानी कैसे बना महानायक

ख्वाजा अहमद अब्बास को भी शायद अहसास नहीं होगा कि गोवा की आजादी की पृष्ठभूमि पर बनने वाली अपनी फिल्म के लिए सात हिन्दुस्तानियों के समूह में उन्होंने जिस एक हिन्दुस्तानी का चयन किया है, उसमें से सबसे अलग, सबसे लम्बा, इतना कि कैमरा भी समेटने में संकोच करे, वह हिन्दी सिनेमा के सबसे लम्बे या कहें अंतहीन लगते दौर का केंद्र बनेगा।

‘सात हिन्दुस्तानी’ 1969 में आई और यह 2020 है, इन 51 सालों में अमिताभ की फिल्में आई या नहीं, फर्क नहीं पड़ा, अमिताभ आज 78 साल के हो गए हैं लेकिन हिन्दी सिनेमा के केंद्र में वह आज भी मौजूद हैं। शायद राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के उस वक्त की जूरी को इस बेडौल से लगते नौजवान में भविष्य के अमिताभ की झलक दिख गई थी। उन्होंने सर्वश्रेष्ठ नवागन्तुक अभिनेता के रूप में सात में से इसी एक हिन्दुस्तानी का चयन किया, पहचान मिली, अमिताभ बच्चन। लेकिन, हिन्दी की मुख्य धारा के सिनेमा के लिए इस पहचान का कोई अर्थ नहीं था। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और हिन्दी सिनेमा उस समय लगभग एक दूसरे के लिए अप्रासंगिक थे।

अमिताभ बच्चन को अपनी दूसरी और घटिया-सी भूमिका वाली फिल्म ‘परवाना’ के लिए दो साल की प्रतीक्षा करनी पड़ी। कहते हैं उस दौर में अमिताभ फिल्मकारों से मिलने स्टूडियो जाते तो कहा जाता, हो गया गोवा आजाद, अब घर जाओ।लेकिन हिन्दी सिनेमा को अमिताभ बच्चन मिलना था, बगैर किसी चयन के जो भी भूमिकायें मिली, कैमरे के सामने वे पूरी शिद्दत से उतरे। चाहे ‘संजोग’ में कलक्टर माला सिन्हा के क्लर्क पति की दब्बू भूमिका हो या ‘बाम्बे टू गोवा’ में महमूद का साथ भर देने की। अधिकांश फिल्मों में नायक होने के बावजूद नायिका या सहनायक से उनकी भूमिका कमतर ही रखी जा रही थी,चाहे वह शत्रुघ्न सिन्हा के साथ ‘रास्ते का पत्थर’ हो या मुमताज के साथ ‘बंधे हाथ’।

वास्तव में राजेश खन्ना की चमक में जब देव आनंद, राजेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र, जीतेन्द्र जैसे सारे बड़े और पुराने सितारे गुम हो चुके थे, अमिताभ के लिए यही बडी उपलब्धि थी कि ‘आनंद’ के बाबू मोशाय को दर्शक याद कर ले रहे थे। ऋषीकेश मुखर्जी (अभिमान) और शुभेन्दु राय (सौदागर) जैसी फिल्म परिकल्पित कर रहे थे, तो अमिताभ को केन्द्र में रखने लगे थे। लेकिन यह अमिताभ के दौर की शुरुआत नहीं थी। उसकी पूर्व पीठिका भर थी। वाकई यह प्रकाश मेहरा की विलक्षणता ही थी कि इन्हीं दब्बू भूमिकाओं में छिपे आक्रामक युवा की उन्होंने पहचान कर ली, और ‘जंजीर’ में परिवार की हत्या का बदला लेने वाले युवा की भूमिका उन्हें सौंपी।

कहा जाता है कानून के दायरे से बाहर जाकर अपराध से मुकाबला करने वाले इस पुलिस इंस्पेक्टर के प्रकाश मेहरा की पहली पसंद देव आनंद थे। देव आनंद के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन की जगह देव आनंद की कल्पना से ही हंसी आती है। देव आनंद ही नहीं किसी भी दूसरे अभिनेता को उस स्थान पर रख कर देखना संभव नहीं, अपने अभिनय से अमिताभ ने ऐसे नए नायक की नींव रखी,जो सिर्फ प्रस्तुति में ही नहीं, शील, स्वभाव में भी हिन्दी सिनेमा के परंपरागत नायकों से नितान्त अलग था। वास्तव में मौके तो मेहनत ही दिला सकती है, लेकिन सिनेमा में सफलता समय और समाज के साथ फिल्मकार की परिकल्पना पर ही मिलती है।

1973 में ‘जंजीर’ की सफलता कहीं न कहीं इस बात का संकेत थी कि मौजूदा व्यवस्था से लोगों का विश्वास डगमगा रहा है। वे ऐसे नायक पसंद करने लगे हैं जो व्यवस्था से बाहर जाकर समस्या का निदान ढूंढने के लिए तैयार हो। याद करें तो एक ओर 1971 भारत की जयगाथा के लिए याद की जाती है, दूसरी ओर नक्सलवाद की शुरुआत के लिए भी। 1973 में ‘जंजीर’ की सफलता में भारतीय संवैधानिक ढांचे के चरमराने की आवाज भर सुनाई दे रही थी, ’दीवार’ में वह स्पष्ट दिखने लगी। हिंसा दिखाने के लिए फिल्मकारों को अब ‘धर्मात्मा’ की तरह काल्पनिक कथा की जरूरत नहीं थी, परदे पर आम जीवन और उनके बीच की हिंसा दिखाने की शरूआत हो गई थी। अमिताभ को सफल होना ही था।

इस सफलता में कहीं न कहीं थोड़ा योगदान अमिताभ के व्यक्तित्व का भी था। ऊंचा कद जो कभी हिन्दी सिनेमा के नायकों के लिए असामान्य माना जाता था, वही अमिताभ के लिए यूएसपी बन गया, शायद उनके दर्शकों को अपने नायक का सामान्य हिन्दुस्तानियों से अलग दिखना संतोष देता था। अमिताभ तो वही ‘बंशी बिरजू’ थे, लेकिन उनकी फिल्में बदल गई थी। दीवार, शोले, जमीर, हेरा फेरी, अदालत, खून पसीना, परवरिश, त्रिशूल, डॉन, मुकद्दर का सिकन्दर, मि.नटवर लाल, सुहाग, शान, लावारिस, कालिया…..अमिताभ के 1975 से 1990 के बीच की फिल्मों के अधिकांश किरदार उसी हाशिए पर पड़े शहर से जुड़े दिखते हैं।

अमिताभ के दौर को यदि 1990 में आयी ‘अग्निपथ’ तक के रूप में याद करें तो ‘कुली’, ‘मर्द’, ‘नास्तिक’, ‘नमकहलाल’, ‘खुद्दार’ अमिताभ की सफलता उनके निभाए चरित्र में समाहित दिखती है। आश्चर्य नहीं कि कि ‘लावारिस’, ‘कालिया’, और ‘तूफान’ जैसी फिल्मों की सफलता आज भी सिनेमा के जानकारों के लिए किसी तिलिस्म से कम नहीं। इसके बरक्स यदि 1975 के पहले की फिल्मों को याद करें तो वे सामाजिक समन्वय की कथा बयान करती थी। उसमें परिवार दिखता था, मां बाप ही नहीं, चाचा, मामा से लेकर फूफी मौसी तक का कहानी में अहम किरदार रहा करते थे। 75 से 90 के काल को अमिताभ बच्चन के दौर के रूप में याद किया जाता है तो उसकी वजह है कि अधिकांश कलाकारों की लोकप्रियता अपने सीमित दर्शक वर्ग में थी, दक्षिण भारतीय फिल्में महिलाओं के बीच पसंद की जा रही थी, तो मल्टी स्टारर मध्य वर्ग को लुभा रही थी।

अमिताभ एक मात्र ऐसे नायक थे जिनकी स्वीकार्यता सर्वमान्य थी। उनकी फिल्मों की कथा भूमि उन्हें शहरी सर्वहारा से जोडती थी, संवेदना महिलाओं को छूती थी, उनका सहज हास्य मध्य वर्ग को लुभाता था। तो उनका संपूर्ण व्यक्तित्व और संवाद शैली उन्हें क्लास देता था। अमिताभ को भी अपनी इस क्षमता का अहसास था यही कारण है कि अमिताभ का दौर ‘कालिया’ , ‘दीवार’ के लिए जितना याद किया जाता है उतना ही ‘चुपके चुपके’, ‘कभी कभी’, ‘बेमिसाल’ और ‘सिलसिला’ के लिए भी। लगभग दशक के अंतराल के बाद 2000 में अमिताभ का दौर एक बार फिर वापस आएगा यह उम्मीद तो शायद अमिताभ को भी नहीं होगी। लेकिन अमिताभ ने अपनी जिद और समर्पण से इसे साकार कर दिखाया।

अमिताभ ने ‘पीकू’, ‘पिंक’,’सत्याग्रह’,’आरक्षण’, ‘बागबान’, ‘वक्त’, ‘फेमिली’, ‘सरकार’ से लेकर ‘ब्लैक’, ‘निशब्द’ और ‘कभी अलविदा न कहना’ जैसी फिल्मों के साथ यह साबित करने की कोशिश की कि उम्र के साथ जिंदगी कमजोर नहीं पड़ती, अनुभव उसे मजबूत बनाते हैं। वास्तव में आने वाले दिनों में जब अमिताभ का समग्र मूल्यांकन होगा,यह तय करना मुश्किल होगा कि उन्हें एंग्री यंगमैन के रूप में याद रखा जाय या जीवंत प्रौढ़ के रूप में।

–टीम बिजनेसबाइट्स

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