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शहर का पूरा अहमद परिवार संभाल रहा है डॉग्स ट्रेनिंग का पुश्तैनी काम

अपने मालिक के एक इशारे पर वह फुर्ती से दोनों पैरों पर खड़े हो जाते हैं। यहां तक आफिस से थके हुए आने वाले अपने ओनर्स को देख वह उनके लिए जूते और टॉवल भी लाते हुए नजर आ जाते हैं। आखिर यूं ही खास नहीं होते यह ओबिडियेंस डाग्स। डाग्स अब सिर्फ घर की रखवाली करने वाले पहरेदार ही नहीं, बल्कि यह फैमली का जरुरी हिस्सा बन चुके हैं। डॉग्स को एक परिवार के करीब लाने, उन्हें अपने ओनर्स के लिए फरमाबरदार बनाने का काम करते हैं डॉग्स ट्रेनर्स। इन दिनों  शहर में डाग्स टे्रनर्स की डिमांड तेजी से बढ़ रही है और हर कोई अपने इस वफादार पेट को ट्रेन करने के लिए डॉग्स ट्रेनर्स की मदद ले रहा है। शहर में ऐसे ट्रेनर्स हैं जो हर ब्रीड के डाग को ऐसे ट्रेन करते हैं कि वह कभी घर आए मेहमानों से कम्प्लीमेंट लेता है तो कभी डॉग शो में प्राइज जीत कर आता है। यही नहीं यह ट्रेनर्स डॉग शो, स्नैपिंग और गार्ड डॉग्स की ट्रेनिंग भी दे रहे हैं।

यह हमारा पुश्तैनी काम हो गया है

बारह साल की उम्र में अपनी ट्रेनिंग से डॉगशो में पहला इनाम जीतने वाले असद अहमद बताते हैं कि यह शौक अब हमारा पुश्तैनी व्यवसाय बन गया है। उन्होंने बताया कि उनके पिता अहमद हुसैन पहले प्राइवेट डॉग ट्रेनर हैं शहर के। मैं जब नौवीं क्लास में पढ़ता था और मुझसे डॉग सम्भल भी नहीं पाता था तब मेरे पिता ने मुझे ट्रेनिंग दी थी। मेरे चाचा और मेरे भाई, भांजे सभी इस काम को कर रहे हैं। जब भी शहर में कोई नय़ा डॉग आता है हमारे परिवार से ही कोई उसे ट्रेन करने के लिए बुलाया जाता है। वैसे तो हर ब्रीड पर हमारा हाथ साफ है लेकिन मेरा जर्मन शेर्फड पर बहुत अच्छा कमांड है।

ज्यादातर ओबिडियेंस ट्रेनिंग की डिमांड है

डॉग ट्रेनर इकबाल अहमद बताते हैं कि वैसे तो हम 6 केटेगरी की ट्रेनिंग डॉग्स को देते हैं जिसमें मिनिमम छह महीने से डेढ़ साल तक का समय लगता है। कितने टाइम में डॉग सारी बातें सीखेगा यह ट्रेनिंग पर डिपेंड होता है कि उसे हाऊस ट्रेनिंग देनी है, डोमेस्टिक ट्रेनिंग, नार्मल ओबिडियेंस ट्रेनिंग, ओबीडियेंस, स्पोर्टस ओबीडियेंस या फिर गार्डर्निंग ओबीडियेंस। लेकिन इन सबमें हमारे पास लोग सबसे ज्यादा ओबीडियेंस ट्रेनिंग दिलाने के लिए आते हैं। इन दिनों मैं रेस्ट पर हूं लेकिन मेरे तीनों भाई और पिता ट्रेनिंग देने का काम कर रहे हैं। इकबाल अहमद बताते हैं के उनके पिता यूपी डॉग स्कावयड में थे। उन्हीं से मैंने यह काम सीखा। और आज मेरे भाई, मेरे चारों बेटे इसी काम को कर रहे हैं।

यह उतना आसान भी नहीं

हवा में उछलती हुई गेंद को पकडऩा, ऊंची दीवार से जम्प करना, देखने में कितना अच्छा और आसान लगता है, लेकिन डॉग ट्रेनर्स को इसके लिए खतरों और महीनों की मेहनत से गुजरना होता है। पिछले कई साल से डाग्स को ट्रेन करने वाले निजामुद्दीन बताते हैं कि एक जानवर कब क्या कर जाए इसका अंदाजा किसी को भी नहीं। साल में एक बार हमें एंटी रेबीज लगवाना पड़ता है। साल में 26 जनवरी और पन्द्रह अगस्त को हमारा दिन फिक्स है एंटी टिटनेस लगवाने के लिए। वहीं हाइड्रोफोबियम होम्योपैथ की दवा हर वक्त हमारे घर पर होती है और वीक में एक डोज इसका लेना ही पड़ती है।

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