- नवेद शिकोह
उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इसकी बड़ी एहमियत है। ये चुनाव विपक्षियों का शक्ति प्रदर्शन और सत्तारूढ़ भाजपा की अग्निपरीक्षा है।
यूपी का पंचायत चुनाव केंद्र की मोदी सरकार के मुस्तकबिल का आईना बनेगा ! ये बात आपको हास्यास्पद लग सकती है। आप कहेंगे कि इतने छोटे स्तर के स्थानीय चुनाव केन्द्र की शक्तिशाली मोदी सरकार के मुस्तकबिल का आईना कैसे बन सकते हैं ?
आपके इस सवाल का भी जवाब है। ग्रामीण इलाकों की प्रधानता वाले यूपी का पंचायत चुनाव ग्रीमीण क्षेत्रों पर आधारित है। भाजपा का वर्चस्व जब तक केवल तीस प्रतिशत शहरी इलाकों तक सीमित रहा तब तक वो सत्ता से बेदखल रही थी। उन दिनों यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में सपा-बसपा का कब्जा था और यही दल बारी-बारी सत्ता पर काबिज़ रहे। जब भाजपा ने भी शहरों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों, यहां के मजदूर-किसानों, दलितों और पिछड़ों का दिल जीत लिया तो यूपी में भाजपा की प्रचंड बहुमत से सरकार बन गई।
अब माहौल कुछ बदला है। देश के किसानों में कृषि कानूनों को लेकर आंदोलन छेड़ा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसानों की नाराजगी का केंद्र बना। नाराजगी की हवा पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी बहती नज़र आई। दलित-पिछड़े समाज की लड़कियों से कथित बलात्कार की घटनाएं सुर्खियां बनीं। इन सारे नकारात्मक पहलुओं के बाद भी उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव के नतीजों में भाजपा का दबदबा क़ायम रहता है तो ये अनुमान लगाया जा सकता है कि ठीक एक वर्ष बाद विधानसभा चुनाव में भी यूपी में भाजपा की वापसी हो सकती है। क्योंकि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव की फिल्म का ट्रेलर बन कर बता देगा कि ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों-मजदूरों और कमजोर तबक़ों में भाजपा को लेकर विश्वास अभी भी बना हुआ है। माना जाएगा कि ग्रामीण, किसान और कमजोर तबक़े के लोग भले ही सरकार से नाराज हों पर वोट भाजपा को देंगे, क्योंकि इनके पास कोई ठोस विकल्प नहीं है। और यदि ऐसा नहीं होता है तो इस बात की आशंका जताई जा सकती है कि आगामी विधानसभा चुनाव में यूपी में भाजपा की वापसी मुश्किल है।
और यदि यूपी में भाजपा की वापसी नहीं होती है तो केद्र में भी भाजपा की सरकार की वापसी मुश्किल होगी। क्योंकि इतिहास गवाह है कि उत्तर प्रदेश में जब भाजपा का जनाधार मजबूत होता है तब पूरे देश में भाजपा का परचम लहराता है और केंद्र में भी भाजपा के सिर ताज होता है। या फिर जब देश में भाजपा का वर्चस्व होता है तो इस जनाधार की धार यूपी में तेज होती है।
इतिहास के पन्ने पलट कर देखिए- पहले यूपी में कल्याण सिंह सरकार बनी और फिर केंद्र में अटल की सरकार बनीं। इसी तरह भाजपा के वर्चस्व के सेकेंड यानी नरेन्द्र मोदी फेस में पहले केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और फिर यूपी में भाजपा प्रचंड बहुमत से जीती और यहां योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बनाए गए।
यानी पंचायत चुनाव इशारा करेंगे कि अगले वर्ष उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा की वापसी होगी या नहीं होगी। और फिर विधानसभा चुनाव के नतीजे ये संकेत दे देंगे कि केंद्र में मोदी की सरकार की तीसरी बार वापसी होगी अथवा नहीं होगी। क्योंकि इतिहास गवाह है कि यूपी में भाजपा का जनाधार रहा तो केंद्र में भाजपा रही और यदि केंद्र में भाजपा टिकी रही तो ये पैमाना है कि यूपी में भी भाजपा का जनाधार बरकरार है।
मौजूदा समय में बदलती परिस्थितियां क्या दिशा तय करेंगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा मगर इस बार के पंचायत चुनाव कुछ अलग ही होंगे यह भाजपा भी जानती है इसलिए राज्य से लेकर केंद्र तक उसका वर्चस्व बरक़रार रहने के लिए पार्टी के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसी के साथ अपनी खोई हुई ज़मीन वापस पाने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव विशेष महत्त्व रखते हैं। बिगुल बज चूका है, पहलवान लंगोट कस कर अखाड़े में उतरने को तैयार हैं, बस देखना है कौन किसको पटखनी देता है। अंत में इतना ही, इन चुनावों को जिसने हलके में लिया समझो उसका बंटाधार हुआ।

