डायरेक्ट दिल से…चोट लगे दीदी को तो दर्द उन्हें होता है…

आर्टिकल/इंटरव्यूडायरेक्ट दिल से…चोट लगे दीदी को तो दर्द उन्हें होता है…

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सुनील शर्मा

लो जी लो करलो बात, ऐसा भी कहीं होता होगा कि चोट लगे दीदी को तो दर्द उन्हें होता है। हां भाई माना भाई-बहन मेें अक्सर ये होता है लेकिन जानी दुश्मनों में भी ऐसा हो भी कैसे रहा है। अब भईया जी बताओ, दीदी को चोट लग गयी तो खिलता कमल का फूल उदास हो गया तो लेफ्ट भी बिल्कुल दीदी के राइट हो गया। और तो और हाथ भी घायल दीदी के जख्मों की चिंता में मुठ्ठी भिंचता दिखने लगा। एक सुर में सबकी आई आवाज, कराओ इस मामले की सीबीआई जांच। उधर दीदी कह रही हैं कि विपक्षी दलों ने हमला कराया तो विपक्षी दल खुद मामले की जांच कराने की मांग कर रहे हैं।

अब घायल दीदी अस्पताल में तो शर्माजी अपने घर में परेशान थे। सुबह से कई बार अखबार पढ़कर इस पहेली को सुलझाने में लगे हुए थे शर्माजी मगर हल उनके दिमाग से कोसों दूर था। तभी पान मुंह में दबाये उनके जिगरी दोस्त मियां जी ने घर में कदम रखा तो शर्माजी को इस गुत्थी को सुलझाने का रास्ता दिख गया। उम्र के 70 बरस देख चुके भाई मियां जी को राजनीति का गहरा तजुर्बा था। सो मियां जी को चाय-पानी पिला कर शर्माजी ने अपने मन की व्यथा उनके सामने रखी। शर्माजी की बात सुनते ही चाय का कप छोड़कर भाई मियां पेट पकड़ कर हंसने लगे और बोले अमां यार शर्माजी, इस बात की चिंता तो यह बात कहने वाले भी नहीं कर रहे और तुम हो कि बेकार में हलकान हुए जा रहे हो। अरे यार, राजनीति में न कोई दोस्त होता है और न कोई दुुश्मन, होती है तो सिर्फ कुर्सी हासिल करने की दौड़। इस राह में जो भी आये उसे धाराशायी कर लक्ष्य तक पहुंचना ही एकमात्र उद्देश्य होता है। चुनावी रणभूमि में न कोई बंधु-बांधव है और न कोई सखा, जो सामने आया वो दुश्मन और जो साथ है वो दोस्त।

कुरूक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन की तरह असमंजस में डूबकर सुबह से अपने घर के आंगन में पड़े शर्माजी को मानो गीता का ज्ञान मिल गया। फिर भी उन्होंने अपनी शंका पूरी तरह से मियां जी के सामने रखी और बोले, भाईजान, जब चुनावी दुश्मन दीदी के चोट लगी तो कमल से लेकर हाथ तक, लेफ्ट से लेकर राइट तक, क्यों सब सीबीआई जांच की बात कर रहे हैं। दीदी तो वैसे ही दुर्घटना में विपक्षी दलों का हाथ बता रही हैं। सीबीआई जांच होगी तो जांच के हाथ उनके दामन को भी तो पकड़ेंगे न।

शर्माजी की नादानी भरी बातें सुनकर मियां जी मुस्कुराए और बोले, यार शर्माजी जीवन में इतने नेता देखने के बाद भी तुम रहे बस आम जनता ही। अरे ये राजनीति के दांव-पेंच अगर जनता के समझ आ ही जाते तो इन नेताओं को पूछता कौन। अरे मियां, सीबीआई जांच की बात ही तो कर रहे हैं, ये थोड़े ही कह रहे हैं कि वो अपराधी हैं आओ गिरफ्तार कर लो। अरे उन्हें सीबीआई की नहीं, उन्हें तो चिंता है जनता की अदालत की जो चंद दिनों में ही अपना फैसला सुना देगी। अब ये जांच-वांच का नतीजा तो चुनाव बाद में आयेगा फिर क्या करेंगे जब चिड़िया ही चुग जायेगी खेत। तो भईया, उन्हें न है जरा भी चिंता दीदी की। उन्हें तो चिंता इस बात की है कि यदि जनता को दीदी की चिंता हो गयी तो आने वाले पांच साल फिर से चिंता में गुजर जायेंगे। इसलिये वो चिंता जता रहे हैं कि कहीं व्हीलचेयर पर बैठी दीदी को देखकर उनका भी वोटर दीदी के खेमे में न चला जायेे। इसी चिंता में वो दीदी की इतनी चिंता कर भी रहे हैं वरना ये नेता हैं, वोट मिलने के बाद अपने वोटर तक की चिंता नहीं करते तो ये भला चिंता कैसे करेंगे किसी राजनीतिक विरोधी की। इसलिये शर्माजी, आप भी चिंता छोड़ो और चुनावी बेला में खबरों पर ज्यादा चिंतन छोड़ दो। क्योंकि आपकी यह हालत देख मुझे चिंता हो रही है। और ये चिंता दोस्त की है नेता की नहीं…

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