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रायबरेली से दिनेश प्रताप तो कैसरगंज से बृजभूषण के बेटे को टिकट

brijbhushan

आखिरकार नामांकन की समयसीमा ख़त्म होने से पहले भाजपा ने रायबरेली और कैसरगंज से अपने उम्मीदवारों के नामों का एलान कर दिया। कैसरगंज से मौजूदा सांसद और महिला पहलवानों के साथ यौन उत्पीड़न के आरोपी बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह की जगह उनके छोटे बेटे करण भूषण सिंह को और रायबरेली सीट से सोनिया गाँधी के खिलाफ पिछ्ला चुनाव हारने वाले और वर्तमान में योगी सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री दिनेश प्रताप सिंह को उम्मीदवार घोषित किया है.

भाजपा द्वारा घोषित किये गए दोनों उम्मीदवारों के नाम को देखकर किसी को कोई हैरानी नहीं हुई, भाजपा इन दोनों सीटों से अभी तक अपने उम्मीदवार क्यों घोषित नहीं कर रही थी इसके बारे में यही कहा जा सकता है कि वो कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालना चाह रही थी. कैसरगंज से भाजपा एक यौन शोषण आरोपी को टिकट दे नहीं सकती थी और ये भी तय था कि बृजभूषण शरण सिंह की मर्ज़ी से ही कैसरगंज का उम्मीदवार घोषित होगा। इसलिए बृजभूषण शरण सिंह नहीं तो उनका बेटा ही सही, सीट परिवार में ही रहना चाहिए। करण भूषण सिंह का ये पहला चुनाव होगा। उनके बड़े भाई प्रतीक भूषण पहले से ही चुनावी राजनीती में हैं. प्रतीक गोंडा विधानसभा से दो बार विधायक रह चुके हैं. करण ने ऑस्ट्रेलिया से बिजनेस मैनेजमेंट कोर्स किया है और नेशनल लेवल के शूटर हैं।

वहीँ रायबरेली से प्रत्याशी बनाये गए दिनेश प्रताप सिंह एक ज़माने में गाँधी परिवार के बहुत करीबी हुआ करते थे, कांग्रेस पार्टी में रहकर उन्होंने राजनीति में अपने पैर जमाये। कांग्रेस पार्टी ने ही इन्हें 2010 में एमएलसी बनने का मौका दिया, 2016 में कांग्रेस पार्टी ने इन्हें दोबारा एमएलसी बनाया, लेकिन 2019 के आते-आते इनका मोदी जी के प्रति प्रेम जगा और ये रायबरेली से सोनिया गाँधी को चैलेंज देने के लिए मैदान में उतर गए. भाजपा ने भी दिनेश प्रताप के लिए पूरी जान लगा दी लेकिन पुलवामा लहर के बावजूद इन्हें सोनिया गाँधी के खिलाफ 1,67,178 वोटों से हार का सामना करना पड़ा. राय बरेली सीट से भाजपा ने वरुण गाँधी को उतारने की बहुत कोशिश की, जे पी नड्डा, अमित शाह ने उन्हें फ़ोन करके इस बात के लिए मनाने की कोशिश की कि वो रायबरेली से चुनाव लड़ें लेकिन वरुण गाँधी ने साफ़ इंकार कर दिया। इसके बाद भाजपा के पास दिनेश प्रताप सिंह को मैदान में उतारने के सिवा कोई और विकल्प भी नहीं था।

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