Duryodhana Mandir- उत्तराखंड के इस गांव की आज भी कर रहे हैं रक्षा

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उत्तरकाशी- देवभूमि उत्तराखंड में आप देवताओं के मंदिर और उनकी धार्मिक महत्ता के बारे में जानते ही होंगे. आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताते हैं जो महाभारत के खलनायक का मंदिर है. हम बात कर रहे हैं उत्तरकाशी जिले के जखोल गांव में स्थित दुर्योधन मंदिर की. जी हां आपने सही पड़ा उत्तराखंड में दुर्योधन का प्राचीन मंदिर स्थित है. जहां सुबह-शाम दुर्योधन की आरती और पूजा की जाती है. कहा जाता है कि शुरुआत में गांव के लोगों ने दुर्योधन की पूजा करने से इंकार कर दिया था. जिसके बाद इलाके में भयंकर महामारी फैली और सैकड़ों लोग काल के ग्रास में समा गए. तब यहां के लोगों ने उनकी पूजा-अर्चना शुरू की. जिसके बाद गांव को इस महामारी से मुक्ति मिली. आज इस मंदिर में दुर्योधन गांव के ‘क्षेत्रपाल’ के रूप में विराजमान है.

दुर्योधन के प्रशंसक भब्रुवाहन

मान्यता है कि यह गांव भब्रुवाहन नामक महान योद्धा की धरती है, जो पाताल लोक का राजा था. भब्रुवाहन कौरव और पांडवों के बीच हो रहे युद्ध का हिस्सा बनना चाहता था. भब्रुवाहन बहुत ही न्याय प्रेमी था, उसने ऐलान किया था कि वह इस युद्ध में कमजोर पक्ष का साथ देगा. बहुत ही शक्तिशाली भब्रुवाहन को भगवान श्री कृष्ण ने उसे इस युद्ध में हिस्सा लेने से रोक दिया. श्री कृष्ण ने भब्रुवाहन के धड़ को शरीर से अलग कर दिया और एक उनके सिर को एक पेड़ पर लटका दिया. कहा जाता है कि भगवान ने इसी पेड़ से पूरे महाभारत युद्ध को देखा था. यह भी मान्यता है कि जब भी कौरवों की युद्ध में हार होती तो भब्रुवाहन बहुत जोर जोर से विलाप करता. भब्रुवाहन भले ही इस युद्ध का हिस्सा ना बन पाया हो लेकिन वह दुर्योधन के बड़े समर्थक थे. यही वजह है कि मरने के बाद भगवान ने यहां उनका मंदिर बनवाया.

तमस नदी में बहते आंसू

स्थानीय लोगों का मानना है कि भगवान जब महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार देखकर रोते थे. तो उनके आंखों से आंसू बहते थे जो आज भी तमस नदी में बह रहे हैं. यही वजह है कि यहां के लोग इस नदी के पानी का सेवन नहीं करते, कहा जाता है कि इस नदी के पानी पीने से मदहोशी छा जाती है.

दुर्योधन मंदिर का प्रसाद

दुर्योधन मंदिर में सुबह शाम आरती पूजा हवन होता है. यहां पर किसी भी पर्यटक को कैमरा, मोबाइल, वीडियो रिकॉर्डर आदि ले जाने की इजाजत नहीं है. इसके अलावा आपको यहां जो प्रसाद दिया जाता है उसे मंदिर में ही खाना होता है. प्रसाद को घर ले जाने की भी इजाजत नहीं होती. तो अगर आप दुर्योधन के प्रति घृणा का भाव रखते हैं तो इस मंदिर में आने से पहले 10 बार जरूर सोचें.

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