शिव नगरी काशी की अनोखी परम्पराओं और रिवाज़ों को पूरा विश्व जनता है। यहाँ पर त्योहारों को मनाने का भी अपना एक अलग और अनूठा ढंग है। चाहें होली हो या दिवाली हर त्यौहार को मनाने का काशीवासियों का अपना एक अंदाज़ है। काशी में होली की शुरुआत रंगभरी एकादशी के दिन शमशान की चिता-भस्म से होली खेलकर की जाती है। अब यहाँ क्यों है ऐसा अनूठा रिवाज़ आइये जानते है।
क्यों खेलते है चिता-भस्म से होली :
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महादेव का पार्वतीजी से विवाह महाशिवरात्रि के दिन हुआ था। रंगभरी एकादशी के दिन महादेव अपनी ससुराल गए थे और माता पार्वती का गौना करवा कर काशी विश्वनाथ लेकर आये थे। उसके बाद उन्होंने अपने गणो को होली खेलने की अनुमति प्रदान करी थी। अपने आराध्य से आज्ञा प्राप्त करने के पश्चात गणो ने अतिउत्साह में आकर अबीरगुलाल के साथ साथ शमशान जाकर चिता भस्म से भी होली खेली इसलिए काशी में रंगभरी एकादशी के दिन चिता भस्म से होली खेलने की परंपरा चली आ रही है।
रंगभरी एकादशी के दिन भगवन शिव और माता पार्वती की पालकी यात्रा काशी की गलियों से निकाली जाती है। इस दिन माता का गौना लेकर बाबा विश्वनाथ भक्तों के कन्धों पर सवार होकर रजत प्रतिमा के रूप में काशी के भ्रमण पर निकलते है तो पूरे नगर में रंग बिखर जाते हैं। पूरे शहर में रंगो की छठा डमरू की धुन और हर हर महादेव की गूँज शहर के माहौल को शिवमय बना देती है। यात्रा काशी विश्वनाथ मंदिर में समाप्त होती है जहाँ भक्त अपने भगवान के साथ होली खेलते हैं।
357 वर्ष पुरानी है परंपरा पालकी निकलने की परंपरा :
माना जाता है काशी में इस परंपरा का आरम्भ 1842 में हुआ था। तब पहली बार महंत परिवार के लोगो ने लकड़ी की पालकी पर बाबा विश्वनाथ की सवारी निकाली थी। इसके बाद फिर 1917 में तत्कालीन महंतों ने रजत पालकी का निर्माण करवाया और तबसे रजत प्रतिमा के रूप में बाबा पूरे नगर का भ्रमण करते है।

