देवराहा बाबा महान सिद्ध संतों में से एक हैं। उनके चमत्कारों से अनेकों किस्से आज भी कहे-सुने जाते हैं। 1990 में ही बाबा ने सबके सहयोग से राम मंदिर बनने की भविष्यवाणी भी की थी। बाबा भक्तों को राम-नाम जपने का मंत्र देते। वृंदावन धाम में बाबा को रहने का आदेश भी भगवान श्री कृष्ण ने दिया था। कहते हैं की एक बार बाबा ने हिमालय जाकर ब्रह्मलीन होने का विचार कर लिया। पूरी तैयारी हो गयी। बाबा ने भक्तों में घोषणा भी करवा दी कि वह शीघ्र की महासमाधि लेंगे। दर्शन खोल दिये गए। दूर दूर से भक्त आने लगे। बाबा को अगली सुबह अदृश्य होकर हिमालय जाना था। किंतु सुबह बाबा अपने आश्रम में ही मिले। सब अचंभित रह गए। छोटे और बड़े महाराज अत्यंत प्रसन्न थे। हालांकि किसी की हिम्मत बाबा से कुछ पूछने की नहीं थी। दोपहर बाद बाबा ने बड़े महाराज को बुलाया और पूछा” बच्चा- बाबा हिमालय नहीं गए। जानना नहीं चाहोगे, की क्यों नहीं गए? बड़े महाराज ने पूछ लिया। तब बाबा ने बताया कि रात में स्वयं श्री कृष्ण, राधा रानी और यमुना जी उन्हें ब्रह्मालीन होने से रोकने आये थे। प्रभु के निवेदन और आदेश की वजह से ही वह नहीं गए। श्री-कृष्ण ने स्वयं उन्हें आदेश दिया कि बाबा आप मेरे धाम में ही रहिए। भक्तों में ज्ञान का संचार कीजिये। बाबा आज भी अपने भक्तों की पुकार पर उनकी मुरादें पूरी करते हैं।
हवा-पानी पर चलने की थी सिद्धि प्राप्त
कई सुने-अनसुने किस्से देवराहा बाबा की चमत्कारिक होने की पुष्टि करते हैं। भक्तों के अनुसार देवराहा बाबा को किसी ने भी कभी कहीं आते-जाते नहीं देखा था। बावजूद उसके वह एक से दूसरी जगह पर पहुंच जाते थे। किसी ने भी उन्हें वाहन का प्रयोग करते हुए नहीं देखा था। कहा जाता है बाबा को पानी में, हवा में, आसमान पर चलने की विद्या प्राप्त थी। यह भी कहा जाता है कि बाबा एक समय पर कई जगह उपस्थित हो सकते थे। पानी पर उन्हें चलते देखने के दावे भी किये जा चुके हैं। बाबा का खानपान भी बिल्कुल अलग था, बताते हैं कि बाबा दिनभर में सिर्फ 250 से 400 एमएल गाय के दूध का ही सेवन करते थे। दिन में एक बार शौच, सुबह, शाम और रात में स्नान अवश्य करते थे। वह योगसिद्ध थे।
जब कांग्रेस को मिला चुनाव चिन्ह
कई किस्सों के अनुसार कांग्रेस का चुनाव चिन्ह पंजा भी देवराहा बाबा का दिया हुआ है। एक बार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी देवराहा बाबा के दर्शन प्राप्त करने गयी। वहां बाबा ने उन्हें हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। जिसके बाद इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी का चुनाव चिन्ह पंजा रख दिया। उन्हें जीत मिली। यह भी कहा जाता है कि इसके बाद कांग्रेस ने कई ऊंचाइयों को छुआ और लगातार आगे बढ़ती गयी।
गर्भ से नहीं हुआ था बाबा का जन्म
बाबा का जन्म कब हुआ ये कोई नहीं जानता। बाबा की आयु 250, 500 या 1000 वर्ष रही या इससे भी अधिक, इसको लेकर भी किसी को कोई पुष्ट जानकारी नहीं है। कोई नहीं जानता देवरहा बाबा कितने वर्षों तक जीवित रहे। उनके जन्म को लेकर भी तमाम कथाएं प्रचलित हैं। मान्यताओं के अनुसार बाबा ने स्वयं कहा था कि वह गर्भ से उत्पन्न नहीं हैं। माना जाता है कि बाबा की उत्पत्ति सरयू नदी से हुई थी। बाबा महान संत, सिद्ध योगी थे। उन्हें द्वापर युग का योगी भी कहा जाता है।कई कथाओं के अनुसार तुलसीदास जी भी उनके सखा रहे हैं। जबकि तमाम राजनेता, प्रधानमंत्री, अभिनेता भी उनके दरबार में शीश झुकाते रहे हैं। 1986 में बाबा देवरिया छोड़कर वृन्दावन धाम में रहने लगे, यमुना जी किनारे शहर और भीड़ से दूर उन्होंने अपना आश्रम बनाया। बाबा उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी थे इसलिए ही उनका नाम देवरहा, देवरिया बाबा पड़ा। 19 जून 1990 को योगिनी तिथि में बाबा यमुना जी में समाधि लीन हो गए। बाबा के समाधि लेने के बाद उनका शरीर तुरंत ही अदृश्य हो गया। कई गोताखोरों ने उन्हें ढूंढा भी लेकिन वहाँ सिर्फ आसन और पुष्पमाला ही मिली। बाबा कहते थे कि जीवन और मृत्यु का उन पर कोई प्रभाव नहीं, इसलिए ही वह योगेश्वर कहलाये। आज भी उनके आश्रम में भक्तों का तांता लगा रहता है।
ऐसे मिले बाबा को गुरु
बाबा की अपने गुरु से मिलने की कथा भी काफी रोचक है। कहा जाता है कि बाबा बचपन में ही बैरागी हो गए थे और उन्होंने घर छोड़ दिया था। एक दिन वह काशी के अस्सी घाट के निकट गंगा किनारे घूम रहे थे। वहां एक बहुत पहुंचे हुए महान सिद्ध संत आहोबलाचारे पहुंच गए। वह गीता का 15 वां श्लोक बोलते हुए जा रहे थे। महान सिद्ध संत का कहना था कि उन्हें स्वयं श्री कृष्ण ने ऐसा करने के लिए कहा था। श्री कृष्ण ने उनसे कहा था कि गंगा किनारे 15 श्लोक बोलते हुए जाना जो भी आगे का श्लोक बोल देगा। वही तुम्हारा शिष्य होगा। श्लोक को पूरा करने वाले देवराहा बाबा थे। जिसके बाद महान संत ने उन्हें अपना शिष्य बना दिया। बहुत दिन तक बाबा आश्रम में रहे। वह कई जगहों पर तप करने के लिए भी पहुंचे थे। एक समय बाबा ने चित्रकूट में तपस्या की जहां हनुमान जी ने उनको स्वयं दर्शन दिए और बाबा को मचान पर रहने की आदेश भी दिए। हनुमान जी ने उन्हें आदेश दिया कि उनके जमीन पर रहने से मनुष्य उन्हें छुएंगे जिससे उनका तप नष्ट हो सकता है। तबसे ही बाबा मचान पर रहने लगे। पूर्व राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने भी अपनी किताब माय आटोबायोग्राफ़ी में बाबा का जिक्र किया है।
