लोकतंत्र का योद्धा या आन्दोलनजीवी परजीवी

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लोकतंत्र का योद्धा या आन्दोलनजीवी परजीवी

  • नवेद शिकोह
लोकतंत्र का योद्धा या आन्दोलनजीवी परजीवी
नवेद शिकोह

दूसरों को आहार बनाकर जीने वाले जीव को परजीवी कहते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसी भी आन्दोलन का समर्थन करने पंहुच जाने वाले लोगों को आन्दोलनजीवी परजीवी की संज्ञा दी है। प्रधानमंत्री का ये वक्तव्य कुछ की नज़र में प्रशंसनीय व्यंग्य है और कुछ लोग प्रधानमंत्री के इस कथन को आपत्तिजनक बता रहे है

तीसरे नजरिया से देखिए तो राज्यसभा में पीएम मोदी का ये बयान दुरुस्त है। ग़ौर कीजिए तो उन्होंने गलत कुछ नहीं कहा। किसी भी लोकतंत्र के खूबसूरत चेहरे की बिंदिया जैसा होता है आन्दोलन। किसी ब्याहता की मांग के सिंदूर जैसा पूरा आन्दोलन ही परजीवी होता है। ये दूसरों के समर्थन के आहार पर ही ज़िन्दा रहता है और हक की लड़ाई में सफलता पाता है क्योंकि आन्दोलन सत्ता या शक्ति के खिलाफ और कमजोरों के हक के लिए होते हैं इसलिए किसी भी शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन/धरना /अनशन/रैली इत्यादि से जुड़ने वालों को इज्जत की नजर से देखा जाता है। ऐसे लोगों को लोकतंत्र का योद्धा, साहसी और भारत के जनतंत्र की शक्ति माना जाता है। आन्दोलन साथ देने यानी समर्थन की कड़ियों से जुड़ता है इसलिए इससे जुड़ा हर कोई एक दूसरे के साथ देने के आहार पर निर्भर रहता है और पूरा आन्दोलन ही परजीवी यानी समर्थन के आहार पर जीने वाला होता है।

शायद इस भाव को ही किसी शायर ने शब्द देते हुए कहा था-
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।

यदि प्रधानमंत्री के नज़रिए से इस शेर को दोहराइए तो ये कहना पड़ेगा-
किसान अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर,
परजीवी साथ आते गए और कारवां बनता गया।

प्रधानमंत्री ही को नहीं.बल्कि हम सब को पता है कि ग़ुलाम भारत को आजाद गणतांत्रिक/लोकतांत्रिक देश बनने में दो शताब्दियों का संघर्ष इतिहास में दर्ज है। 1857 में स्वतंत्रता संग्राम का पहला आन्दोलन छिड़ा। 164 साल पहले आजादी के मतवालों ने पहली लड़ाई लड़ी, फिर दूसरी लड़ाई 1947 में जीती गई।
भारत के माता-पिता समान दो बड़े आन्दोलन अगर न होते तो लोकतांत्रिक स्वतंत्र भारत का जन्म ही न होता। यही कारण है कि हर भारतीय की घुट्टी में आन्दोलन घुला है। जब भी पानी सर के ऊपर आता नजर आता है जनतंत्र की एक बूंद-बूंद समंदर बन कर बड़ी से बड़ी ताकत को बहा ले जाती है। हक की हर लड़ाई में आम जनता जीतती है और बड़ी से बड़ी शक्तियों की तानाशाही की चट्टानें खिसकने लगती हैं। इमरजेंसी के वक्त जेपी आन्दोलन ने इंदिरा सरकार की जड़े हिला दी थीं। भष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन हो या निर्भया बलात्कार की घटना, सिस्टम से नाराज हर जनाक्रोश ने हर दौर मे जन आन्दोलन को जन्म दिया है।

आंदोलन चिंगारी की तरह होता है। एक कड़ी की तरह होता है। एक बीज की तरह होता है। जो क्रमशः हवा, कड़ियों और समर्थन के खाद-पानी से वट वृक्ष बन जाता है। वादाखिलाफी, अन्याय, पीढ़ा, जुल्म, हक छीनने के सितम और तानाशाही की कीचड़ में खिलने वाले हर प्रोटेस्ट की कड़ियां समर्थन की ताकत से ही आगे बढ़ती हैं और इस ताकत के आगे बड़ी-बड़ी ताकतों/हुकुमतों को झुकना पड़ता है नहीं तो लोकतंत्र की इस पिक्चर में जनता सरकार को नमस्ते करके विदा कर देती है।

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