क्या अमेरिका के इलेक्शन में धांधली हो सकती है?

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क्या अमेरिका के इलेक्शन में धांधली हो सकती है?

  • 3 नवंबर को पता चलेगा कौन होगा अमेरिका का अगला राष्ट्रपति
  • रिपब्लिकन से ट्रंप और डेमोक्रेटिक से बाइडेन किस्मत आजमा रहे हैं

अमित बिश्‍नोई

पूरी दुनिया की अमेरिका में नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति इलेक्शन पर टिकी है.ऐसा इसलिए क्योंकि इस देश का लगभग हर देश में इनवॉल्वमेंट होता है. पिछले बार हुए इलेक्शन की पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. इस वक्त लोगों के जेहन में बड़ा सवाल है कि क्या अमेरिका में लोकतंत्र हाईजैक हो सकता है? ट्रंप दोबारा इलेक्शन जीतने के लिए क्या गणित लगा रहे हैं. कहीं धांधली तो नहीं हो जाएगी.क्या बूथ कैप्चरिंग जैसी घटना भी हो सकती है.यदि होती है तो दोनों उम्मीदवारों में पर्दे के पीछे से कौन ऐसी घटना को अंजाम देगा. आपके जेहन में चल रहे इन सब सवालों का आंसर देती पढ़े एक रिपोर्ट

रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक आमने-सामने
दुनिया भर में अमेरिका के इलेक्शन की चर्चा हो रही है. यहां दो पार्टियां है. रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक. रिपब्लिकन से डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेटिक से जो बाइडेन अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. दोनों ही पार्टी के नेता एक दूसरे पर इलेक्शन को फ्रॉड करके जीतने का आरोप एक दूसरे पर लगा रहे हैं.

चुनाव का बड़ा फोकस क्या है?
इस बार पोस्टल बैलट यानी मेल इन वोटिंग की बात बार-बार हो रही है. ट्रंप तो बीते मार्च से लगातार इसे लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी पर निशाना साध रहे हैं. लेकिन उनके पास इसका कोई सुबूत नहीं है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट में क्या?
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की हाल ही में एक रिपोर्ट आई है. इसके मुताबिक पोस्टल बैलट वोटिंग पार्टी निरपेक्ष है. यह वोट शेयर को प्रभावित नहीं करती है. टर्न आउट ज्यादा होने की स्थिति में वोट शेयर में मामूली फर्क पड़ता है. जो किसी भी पार्टी के पक्ष में हो सकता है.

क्या होता है वोटर सप्रेशन?
वोटर लिस्ट से नाम काट देना एक तरीका है. ज्यादातर नाम ब्लैक वोटरों के काटे जाते हैं. एंटी इनकंबेंसी के चलते ट्रंप पोस्टल वोटिंग को दबाना चाहते हैं.
वोटर लिस्ट से लोगों का नाम हटा देना.ज्यादातर माइनारिटीज, गरीबों के नाम एंटी इनकंबेंसी की वजह से हटाए जाते हैं. इसिलिए ट्रंप ने अपने एक डोनर लुइस डिजॉय जो लॉजिस्टिक कंपनी के ओनर है को पोस्टल सर्विस का चीफ बना दिया है. यह ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को चंदा देते रहे हैं. खास बात यह है कि जून महीने में उन्हें ये जिम्मेदारी दी गई और उनके पास इस फील्ड की कोई नॉलेज नहीं थी.

मेल बॉक्स मशीनें हटाई
लुईस ने चार्ज लेते ही पोस्ट बॉक्स मशीनें और शार्टिंग मशीनें हटाना शुरू करवा दी. इसके पीछे मकसद शायद यह रहा कि मेल डिलीवरी में लेट होगा और जब पोस्टल बैलट देर से पहुंचेगा सेंटर में तो रिजल्ट में हेरफेर करने में आसानी होगी. हालांकि इसका बड़े पैमाने पर विरोध शुरू हो गया. इसके बाद लुईस को आगे आना पड़ा और कहना पड़ा की वह नवबंर तक कोई बदलाव नहीं करेंगे.

क्या खतरा टल गया?
लुईस के इस बात के बाद भी खतरा टला नहीं है क्योंकि जो मशीनें हटा ली गई थीं उन्हें दोबारा लगाया ही नहीं गया. मामले में मजेदार बात यह है कि एक तरफ तो ट्रंप पोस्टल बैलेट का विरोध कर रहे हैं. लेकिन फ्लोरिडा में वह खुद पोस्टल बैलेट के जरिए ही वोट डालते हैं.उन्हें इस बार भी इसके लिए रिक्वेस्ट भेज दी है. नॉर्थ कोराइना के दौरे के दौरान उन्होंने यहां तक कह दिया कि वोटर दो बार वोट डाले एक बार पोस्टल बैलेट से और एक बार पोलिंग सेंटर में जाकर. यह सब चीजें है जो वहां लोगों को डरा रही है कि कैसे चुनाव में पारदर्शिता रह पाएगी.

नेशनल पोल्स का सर्वे क्या कहता है?
नेशनल पोल्स की बात करते हैं. रियल क्लियर पॉलिटिक्स के 16 सितंबर के नेशनल पोल एवरेज के मुताबिक, बाइडेन को 49 फीसदी समर्थन हासिल है, वहीं ट्रंप के लिए यह आंकड़ा 43.1 फीसदी है.

क्या जरूरी है राष्ट्रपति चुनाव लड़ने के लिए?
अमेरिका का अपना संविधान है. इसके आर्टिकल 2 के सेक्शन 1 में राष्ट्रपति चुनाव के बारे में पूरी जानकारी दी गई है. मुख्य रूप से तीन बातें जरूरी हैं.
1- उम्मीदवार का जन्म अमेरिका में हुआ हो.
2- उसकी उम्र 35 साल या उससे अधिक हो.
3- वह पिछले 14 साल से अमेरिका में रह रहा हो.

2 कार्यकाल तक राष्ट्रपति हो सकता है?
अमेरिका में चार साल के लिए राष्ट्रपति चुना जाता है. 2 कार्यकाल तक राष्ट्रपति रह सकता है. हालांकि युद्ध की स्थिति बनने पर तीसरा कार्यकाल भी संभव है.

कैसे चुना जाता है राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार?
अन्य किसी लोकतांत्रिक देश की तरह अमेरिका में भी कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति का चुनाव लड़ सकता है.लेकिन अमेरिका में दो पार्टियां है. रिपब्लिकन पार्टी और डेमोक्रेटिक पार्टी इन्हीं के मध्य चुनाव होता है.यहां पार्टी के उम्मीदवार के चयन के लिए दो तरह के चुनाव होते हैं.

प्राइमरी और कॉकसस क्या हैं?
पहला प्राइमरी और दूसरा कॉकसस. प्राइमरी चुनाव राज्य सरकारों के अंतर्गत कराए जाते हैं. अगर चुनाव खुले तौर पर होते हैं तो इसमें पार्टी कार्यकर्ताओं के अलावा आम जनता भी मतदान कर सकती है.वहीं, बंद रूप से अगर मतदान होता है तो सिर्फ पार्टी के कार्यकर्ता ही वोटिंग करते हैं.अगर कॉकसस की बात करें तो यह पार्टी की तरफ से ही कराए जाते हैं. इसमें पार्टी के समर्थकों का एक कार्यक्रम बुलाया जाता है.इसमें राष्ट्रपति उम्मीदवार अलग अलग मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं. जिस उम्मीदवार के पक्ष में ज्यादा लोग हाथ खड़ा करते हैं, वही उम्मीदवार चुना जाता है. हालांकि, अमेरिका के ज्यादातर राज्यों में प्राइमरी के तहत ही उम्मीदवार चुना जाता है.

टीवी डिबेट होती है अहम
अमेरिकी चुनाव में टीवी डिबेट काफी अहम मानी जाती है. यह मतदान से पहले होती है.यह दो प्रकार की होती है पहली प्राइमरी और दूसरी प्रेसिडेंशियल। प्राइमरी पार्टी के उम्मीदवारों के बीच होती है. वहीं, प्रेसिडेंशियल डिबेट दोनों पार्टियों के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों के बीच में होती है.यह अमेरिकी मीडिया द्वारा आयोजित की जाती हैं. हर डिबेट में अलग अलग मुद्दे पर दोनों पार्टियों के उम्मीदवार अपनी बात रखते हैं, इसी के आधार पर जनता अपना मूड बनाती है.

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