सुनील शर्मा
कोरोना क्या है, यह सवाल शर्माजी को परेशान किये हुए था। अनेक लोगोें से पूछा, अखबार, वेबसाइट तलाशी तो सबने बताया कि कोरोना एक वायरस है। मगर शर्माजी के चिंतन मन को यह जबाव से सतुंष्ट नहीं कर पा रहा था। एक दिन उन्होंने पहाड़ों में रहने वाले अर्न्तयामी बाबा त्रिवेंद के बारे में सुना। एक समय में वह पहाड़ों पर राज करते थे मगर चंद लोगों ने उनके भीतर छिपे सन्यासी को पहचान कर उनको राज्य की चिंता और जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया। अब बाबा त्रिवेंद जगह-जगह प्रवचन कर जनता को जीवन के रहस्य बता रहे हैं।
तो कोरोना वायरस के गूढ़ ज्ञान को जानने को ललायित शर्माजी पहुंच गये पहाड़ों के बीच धूनी रमाये बाबा त्रिवेंद के पास। अर्न्तयामी बाबा उन्हें देखते ही बोले, आ गया कोरोना की परेशानी लेकर। अपने मन की बात बाबा के मुख से सुनकर शर्माजी उनके चरणों में नतमस्तक हो गये और पूछा, बाबाजी आपने मेरे मन की बात बिना बताये कैसे जान ली। शर्माजी की बात सुनकर बाबा त्रिवेंद का पारा हाई हो गया और चिल्लाकर बोले, अरे तेरे-मेरे मन की बात की क्या बात है। हर कोई कोरोना से परेशान है तो तू कौन सा अनोखा आया है। अरे मेरी परेशानी भी तो देख, सब कुछ छुड़वा कर यहां बैठा दिया। अब आने वाला भी मेरे हाल पूछने की बजाये कोरोना की चाल जानने आता है। मैं परेशान हूं मगर ये क्या हुआ, कैसे हुआ पूछने वाला कोई नहीं आता है। साहेब से लेकर पत्रकार तक अपने मन की कहते हैं मेरे मन की बात सुनाने का तो मौका भी किसी ने नहीं दिया।
बाबा त्रिवेंद को परेशान देख शर्माजी उठने को हुुए तो बाबा त्रिवेंद उन्हें रोक कर बोले, कहां चल दिये, जिस दिन से सिंहासन छूटा है एक तो वैसे ही कोई मिलने नहीं आता। तुम आये हो तो बिना सवाल पूछे ही चले जा रहे हो। अरे पत्रकार नहीं हो तो पत्रकारों जैसी बात ही कर लो, कोई सवाल पूछो, हमसे जवाब ही मांग लो। कुछ तो पुराने दिन ताजा हो जायें, वीराने में थोड़ी बहार ही आ जाये।
त्रिवेंद बाबा की बात सुनकर शर्माजी का हौसला बढ़ा तो उन्होंने कोरोना वायरस के बारे में जानने की इच्छा व्यक्त की। बाबा त्रिवेंद मुस्कुराए, चेहरे पर दार्शनिक अंदाज लाये और कोरोना के बारे में गूढ़ ज्ञान देना शुरू कर दिया। बाबा बोले, हे शर्माजी इस कलयुग में वास करने के बावजूद यर्याथ से भटको नहीं। हमारी तरह कोरोना वायरस भी एक प्राणी मात्र है। उसे भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना पृथ्वी पर रहने वाले किसी भी प्राणी को है। हम खुद को उससे बुद्धिमान समझते हैं मगर वह हमसे भी चालाक है। हम वैक्सीन बनाते हैं, वह रूप बदल लेता है। हम उसके पीछे चलते हैं तो वह भाग लेता हैै। कोरोना नाम का प्राणी इस धरती पर बढ़ती जनसंख्या का बोझ कम करने आया है और हम उसके कार्य में बाधा बन रहे हैं।
बाबा की बात सुनकर शर्माजी थोड़ा चिंतित हो गये और बोले, बाबाजी, तो फिर कोरोना का खात्मा कैसे होगा। मानव जाति की रक्षा का कोई उपाय बतायें ताकि हम कोरोना से खुद की रक्षा कर सके।शर्माजी की गुहार सुनकर भावुक हुए बाबा त्रिवेंद की आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी। रूंधे गले से बोले, हे शर्माजी, यदि इस सवाल का जवाब मेरे पास होता तो आज भी मैं राज सिंहासन पर ही बैठा होता। अरे, कोरोेना से तो मैं खुुद को और अपनी गद्दी को भी नहीं बचा पाया। अब इस पहाड़ से उस पहाड़ भटकने को मजबूूर हूं। तो शर्माजी कोरोना के खात्मे की बात छोड़ो और दौड़ने का अभ्यास करो। देखोे कोरोना तेजी से दौड़ रहा है, हमें उससे भी तेजी से दौड़ना होगा। हां दौड़ना थोड़ी दूरी बनाकर, कोरोना कहीं पास आ गया तो वहीं टंगड़ी मार कर गिरा देगा। और वह भी तो प्राणी है न, तो मारने की जरूरत क्या है। हमारा देश अहिंसा का पुजारी है इसलिये कोरोना भी चलता रहे, लोग भी चलते रहें, देश भी चलता रहे और अब तुम भी यहां से चल दो ताकि हम भी दूसरे भक्तों के पास चल दें।
त्रिवेंद बाबा से मिले गूढ़ ज्ञान से लबालब शर्माजी ने भी अब चलना ही उचित समझा। क्योंकि उन्हें समझ आ गया था कि ज्यादा देर बैठे तो दौड़़ लगा रहा कोरोना उनके पास आ सकता है। प्राणी होने के नाते कोरोना है तो अपना भाई, लेकिन खुद को खतरों का खिलाड़ी समझना खतरनाक हो सकता है। तो शर्माजी ये गाना गुनगुनाते हुए निकल लिये
हे कोरोना भाई, तुम भी चलो, हम भी चलें, चलती रहे जिंदगी…

