जाति-धर्म की दीवारों को तोड़कर एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं लोग
मेरठ। संकट की घड़ी में एक-दूसरे के साथ खड़ा होना हमारे देश के संस्कार है और गंगा-जमुनी तहजीब भी। कोरोना काल में भी जाति-धर्म की दीवारों को तोड़कर इंसानियत की मिसाल पेश कर रहे हैं मेरठ के मुस्लिम समाज के लोग जो हिंदू भाईयों की अर्थी को कंधा दे रहे हैं। वहीं हिंदू भी मुस्लिम भाईयों के जनाजे में शामिल होकर सांप्रदायिक सौहार्द की भावना को जिंदा रखे हुए हैं।
कोरोना काल में जहां हर दिन अपनों की मौत की खबर सुनने को मिल रही है वहीं लोग अपनों के अंतिम संस्कार में भी शामिल होने से दूरी बना रहे हैं। अनेक मौतें ऐसी हुई जिसमें अर्थी को कंधा देने के लिये भी रिश्तेदार सामने नहीं आ रहे हैं। श्मशान से लेकर कब्रिस्तान तक में शवों की कतारें लगी हुई हैं। ऐसे में कोरोना काल में जाति-धर्म की दीवारों को तोड़कर इंसान ही इंसान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। इंसानियत के हाथ एक-दूसरे से मिलकर हालात का सामना कर रहे हैं।
इंसानियत की ऐसी ही एक मिसाल देखने को मिली कंकरखेड़ा के अनुज की मौत के बाद जब उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने से रिश्तेदारों ने भी इंकार कर दिया। सोमवार शाम को अनुज का देहांत हो जाने के बाद मंगलवार सुबह तक जब अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिये रिश्तेदार नहीं पहुंचे तो पड़ोंस में रहने वाले मुस्लिम युवा मानवता दिखाते हुए अनुज के अंतिम संस्कार के लिये आगे आये। कोरोना के खौफ से बेखौफ, इंसानियत की शमा जलाये इन मुस्लिम युवाओं ने न सिर्फ अनुुज की अर्थी तैयार की बल्कि उसे कंधा देकर श्मशान घाट तक भी ले गये। वहां अनुज का हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार कराया गया।
अंतिम संस्कार कराने में शामिल मोहम्मद अरशद, शाहरुख एडवोकेट, इमरान, फिरोज, आरिफ आदि का कहना है कि कोरोना काल में हम सभी को एक-दूसरे की मदद करनी चाहिये। खासकर किसी परिवार पर आपत्ति आ जाने के बाद उसकी मदद करना इंसानियत का फर्ज है। मुस्लिम युवाओं के इस सराहनीय कदम की क्षेत्रवासी जमकर तारीफ कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि जब तक देश में इंसानियत जिंदा रहेगी, कोरोना क्या किसी भी आपदा का मुकाबला किया जा सकता है।

