पांच राज्यों में मिली हार ने बढ़ाई कांग्रेस नेतृृत्व की चिंता
यूपी में हुए पंचायत चुनाव में भी नहीं मिली कोई राहत
अमित बिश्नोई
आजाद भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता सिंहासन पर काबिज रही कांग्रेस पार्टी के लिये हालिया दौर बेहद मुश्किलों भरा है। हाल ही में पांच राज्यों में हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। वहीं त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के जरिए उत्तर प्रदेश में पार्टी के लिये संजीवनी तलाश रही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने लगातार रैलियां कर ग्रामीण वोट को अपने पाले में खींचने का भरसक प्रयास किया। मगर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के बावजूद कांग्रेस को निराशा ही हाथ लगी।
ब्राह्मण और दलित मतदाताओं से दूर जा चुकी कांग्र्रेस को किसानों नेे भी सहारा नहीं दिया। इन हालातों में कांग्रेस को तलाश है ऐसे वोट बैंक की जो एकतरफा समर्थन देकर यूपी चुनाव में कांग्रेस को पूर्नजीवित करने में सहयोग दे सके। ऐसे में कांग्रेस के पास मुसलमान वोटरों में ही अपना वजूद तलाशने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। हाल ही में पार्टी में मुसलमान नेताओं का कद बढ़ाना इस बात का इशारा कर रहा है कि कांग्रेस अब मोदी-योगी विरोध के सहारे मुसलमान वोटर को कांग्रेस के पाले में लाने का प्रयास कर रही है।
काफी समय से सत्ता से दूर होने की बेचैनी कांग्रेस में साफ झलक रही है। येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस सत्ता पर काबिज होने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपना सर्वस्व न्यौछावर करने को तैयार है। सभी राजनीतिक दल इस बात को भलीभांति जानते हैं कि केंद्र की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है। ऐसे में केंद्र की सत्ता पर काबिज होना है तो उत्तर प्रदेश में अपना आधार मजबूत करना बेहद आवश्यक है। यही सोच कांग्रेस की भी है और पिछले कुछ समय से उत्तर प्रदेश के मुद्दों को जोर-शोर से उठाने और प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर विरोध-प्रदर्शन करना इस बात की गवाही देता है कि कांग्रेस यूपी चुनाव को पूर्ण गंभीरता से ले रही है। यहां तक की त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में अनेक किसान रैली महापंचायत आयोजित कर ग्रामीण वोट हासिल करने का भरसक प्रयास किया। हालांकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस द्वारा उठाए गए मुद्दे कुछ समय के लिए चर्चा में जरूर रहे मगर संगठन उन मुद्दों को राजनीतिक दृष्टिकोण से जीत के मुकाम पर लाने में नाकाम रहा। वही यूपी के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भी कांग्रेस को निराशाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा।
बात करें उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की तो कांग्रेस के लिए अभी तक कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। कांग्रेस का आधार माने जाने वाला ब्राह्मण वोट बैंक उससे छिटक कर भाजपा में जा चुका है। वही दलित वोट बैंक पर लंबे समय से बसपा प्रमुख मायावती का एक तरफा कब्जा है। दलित वोट बैंक में अब भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर भी सेंध लगायेंगे। ऐसे में कांग्रेस के लिए दलित वोट बैंक को अपने पाले में लाना बेहद मुश्किल है। इन हालातों में कांग्रेस के पास मुस्लिम वोट बैंक का समर्थन हासिल करने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है। कांग्रेस नेतृत्व इस बात को भलीभांति जानता है कि दलित और मुस्लिम वोटर्स ही एक तरफा वोट देते हैं और किसी भी चुनाव में बड़ी जीत दिलाने में सक्षम हैं।
ब्राह्मण और दलित वोट बैंक के बाद अब किसान खासकर जाट समुदाय की तरफ से निराशा हासिल होने के बाद कांग्रेस की निगाह मुस्लिम वोट बैंक पर गई हैं। मुसलमानों में अपना वजूद तलाशने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी छवि के विपरित जाकर विवादित मुस्लिम नेताओं को अपनी पार्टी में प्रमुख पद देने शुरू कर दिए हैं। हाल ही में कांग्रेस हाईकमान ने सहारनपुर के कद्दावर नेता इमरान मसूद का कद बढ़ाकर उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाने के साथ ही दिल्ली राज्य का प्रभारी बनाया है। मोदी विरोध से चर्चा में आए इमरान मसूद अपनी तीखी भाषण शैली से मुस्लिम वोट को कांग्रेस में लाने में कामयाब होंगे यह आशा कांग्रेस नेतृत्व लगाए बैठा है। वही शायर इमरान प्रतापगढ़ी को कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग का चेयरमैन बनाये जाना भी जाहिर करता है कि कांग्रेस इस बार मुस्लिम वोट बैंक हासिल करने के लिए भाजपा विरोध को और तेज करने जा रही है।
गौरतलब है कि इमरान मसूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोटी-बोटी काट देने का बयान दे चुके हैं। वही शायर इमरान प्रतापगढ़ी भी मोदी-भाजपा विरोध से चर्चा में आये थे। ऐसे में इन दोनों विवादित नेताओं को कांग्रेस में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना इस बात का संकेत है कि पार्टी उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव से पूर्व मोदी व भाजपा विरोध कर मुसलमानों को एकजुट करने और कांग्रेस को मुस्लिम हितैषी साबित करने का हर संभव प्रयास करने जा रही है। अपने इस प्रयास में कांग्रेस को कितनी सफलता मिलती है यह तो देखने वाली बात होगी मगर अब तक के पूर्व अनुभव की बात करें तो जब भी मुस्लिम नेताओं ने मोदी और भाजपा विरोध को हवा दी है तब-तब उसका फायदा भाजपा को ही मिला है। वही इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी की छवि मोदी और भाजपा के साथ हिंदू विरोधी भी बनी हुुई है। यह संभव हो सकता है कि मुस्लिम वोट कांग्रेस के पक्ष में आएं मगर संभावना इस बात की भी है कि हिंदू वोट उससे और ज्यादा दूर चली जायें। ऐसे में फायदे-नुकसान का आंकलन कांग्रेस नेतृत्व को अवश्य करना चाहिए क्योंकि एक बार चुनावी रण क्षेत्र में उतरने के बाद अपने पैर वापस खींचना संभव नहीं होता। वहीं कमान से छूटा तीर और मुंह से निकली बात कभी वापस नहीं आती…

