अमित बिश्नोई
रायबरेली या वायनाड, चुनाव के बाद का सबसे बड़ा सवाल, राहुल गाँधी किसे अपनाएंगे और किसे ठुकरायेंगे, राजनीतिक विश्लेषक कयास लगा रहे हैं, तुक्के मार रहे हैं , कभी कहा जाता है राहुल गाँधी वायनाड से बेमुरव्वती करके रायबरेली को अपनाएंगे तो कभी कहा जाता है कि नहीं वो वायनाड से किये गए अपने वादे को निभाएंगे। इस चुनाव में राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी ने खूब सस्पेंस क्रिएट किया, पहले सपा से गठबंधन पर सीटों के तालमेल पर, फिर अमेठी से कौन की बात पर और अब रायबरेली या वायनाड में किसे चुनने की बात पर. कांग्रेस पार्टी द्वारा कहा जा चूका है कि 17 जून से पहले इस बात का फैसला हो जायेगा कि राहुल गाँधी किसे अपनाएंगे। चुनाव जीतने के बाद रायबरेली और वायनाड, दोनों जगहों का दौरा राहुल कर आये हैं, दोनों ही जगह के वोटरों का शुक्रिया भी अदा कर आये है और अपनी दुविधा भी शेयर कर आये हैं
दोनों जगहों पर उनके दिए गए भाषणों का चुनावी पंडित अपने तौर पर विश्लेषण कर रहे हैं मगर एकमत होते नहीं दिख रहे हैं, लोगों की राय बंटी हुई है, राहुल के भाषणों से स्पष्ट तौर पर कुछ भी नतीजा निकालना काफी मुश्किल है, रायबरेली में वो अपने को वहां का सांसद बताते हैं तो वायनाड में वो कहते हैं कि मैं कहाँ का सांसद बना रहूंगा ये बात मुझे छोड़कर सारी दुनिया जानती है. बात सही है, लोगों का आंकलन आगे की राजनीती को सामने रखकर होता है, इसलिए राजनीती का हर जानकार यही कहेगा कि राहुल गाँधी रायबरेली की सीट को अपनाएंगे और वायनाड को छोड़ेंगे। इसकी बहुत स्पष्ट वजह भी है, कांग्रेस का भविष्य तभी चमकेगा जब यूपी में उनका रुतबा बढ़ेगा, यूपी में रुतबा बढ़ाने के लिए यूपी से कनेक्ट भी रहना होगा। अमेठी में हार के बाद राहुल का कनेक्शन यूपी से बिलकुल कट गया, उनका सारा ध्यान वायनाड पर रहा, पूरे कार्यकाल में उन्हें बार बार वायनाड जाते हुए देखा गया लेकिन अमेठी की तरफ कहा जा सकता है कि उन्होंने पलटकर नहीं देखा। यही वजह है कि कांग्रेस यूपी से पूरी तरह आउट हो गयी और विधानसभा चुनावों में लगभग ख़त्म हो गयी. माना कि चुनाव भाजपा और सपा में आमने सामने का बन गया था लेकिन एक नेशनल पार्टी का देश के सबसे पड़े प्रदेश में सिर्फ दो सीटें लाना उसके वजूद पर खतरा पैदा करता है.
राहुल गाँधी ने वायनाड में अपनी दुविधा भी बताई लेकिन साथ में ये भी कहा कि मेरा जो भी फैसला होगा उससे रायबरेली और वायनाड दोनों जगहों के लोग खुश होंगे। राहुल की इस बात से एक बात तो स्पष्ट होती लगती है कि प्रियंका गाँधी का चुनावी राजनीती का आगाज़ होना लगभग तय हो चूका है लेकिन राहुल की खुश होने की बात के भी दो मतलब निकलते हैं, वो ये कि प्रियंका रायबरेली से भी लड़ सकती हैं और वायनाड से भी. अब प्रियंका के चुनाव लड़ने से कौन ज़्यादा खुश होगा? वायनाड वाले या फिर रायबरेली वाले। वैसे केरल कांग्रेस के लोग मानसिक तौर पर इस बात के लिए तैयार नज़र आते हैं कि राहुल गाँधी वायनाड की सीट छोड़ सकते हैं, केरल कांग्रेस का कहना है कि देश हित और पार्टी के हित में अगर राहुल गाँधी का वायनाड छोड़ना सही फैसला है तो उसपर केरल कांग्रेस निराश नहीं होगी और न ही वायनाड के लोग भी निराश होंगे क्योंकि उनकी जगह प्रियंका गाँधी का नाम वायनाड के साथ जुड़ जायेगा।
ऐसा नहीं है कि राहुल गाँधी ने फैसला नहीं लिया होगा, फैसला हो चूका होगा, पेंच शायद अभी इस बात पर फंसा होगा कि प्रियंका गाँधी चुनाव लड़ने के लिए राज़ी होंगी या नहीं। वैसे चुनाव के दौरान एक इंटरव्यू में प्रियंका गाँधी ने ये बात कही थी कि पार्टी को अगर लगेगा कि मेरा चुनाव लड़ना ज़रूरी है तो मैं चुनाव लड़ूंगी। मुझे चुनाव लड़ने में कोई परेशानी नहीं है. दरअसल चुनाव से पहले प्रियंका को उम्मीदवार बनाये जाने पर फैसला इसलिए नहीं लिया जा सका क्योंकि भाजपा के परिवारवाद के आरोपों से बचना भी कांग्रेस की एक रणनीति थी. प्रियंका के चुनाव लड़ने से मोदी जी परिवारवाद पर और मुखर होकर कांग्रेस पर हमले करते और कांग्रेस को कहीं न कहीं बैकफुट पर जाना पड़ता लेकिन अब चुनाव ख़त्म हो चूका और उपचुनाव में परिवारवाद जैसा कोई मुद्दा असर भी नहीं करता। इस चुनाव में अखिलेश के परिवार के पांच लोगों ने चुनाव जीता। भाजपा की तरफ से एक दर्जन से ज़्यादा जीतने वालों का ताल्लुक राजनीतिक परिवार से है. ऐसे में प्रियंका गाँधी उपचुनाव में उतरती है तो कम से कम परिवारवाद कोई मुद्दा नहीं हो सकता। बात सिर्फ प्रियंका की मंज़ूरी की है. इस बात पर ये कहा जा सकता है कि चुनाव के बाद इंडिया गठबंधन की बैठकों में प्रियंका गाँधी जिस तरह दिखाई पड़ीं उससे कहीं न कहीं ये इशारा मिल रहा है कि प्रियंका ने भी शायद चुनावी राजनीती में उतरने का मन बना लिया है वरना चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान इंडिया गठबंधन की बैठकों में प्रियंका गाँधी दिखाई नहीं पड़ती थीं. बहरहाल रायबरेली या वायनाड पर सस्पेंस बना हुआ है, कहा जा रहा है कि फैसला चौंकाने वाला होगा। अब चौंकाने वाली बात क्या हो सकती है, क्या अमेठी जैसा कोई फैसला? इंतज़ार करते हैं कि राहुल की दुविधा में कांग्रेस पार्टी कौन सी सुविधा ढूंढ रही है।
