नई दिल्ली: अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान (Taliban) के कब्जे के बाद जहां चीन अपने प्रतिद्वंदी अमेरिका के सांकेतिक रूप से पराजित होने से अपने भू- रणनीतिक अवसरो को लेकर खुश हैं तो वहीं दूसरी तरफ अपने आर्थिक निवेशों और खासकर अपने महत्वाकांछी प्रोजेक्ट BRI (Belt and Road Initiative) जो 2013 मे शुरू किया गया था (जिसमे सड़क और जल मार्ग से Asia, Africa और Europe को जोड़ने का लक्ष्य हैं) उसके प्रति जोखिम को लेकर चिंतित भी है।
अफगानिस्तान से अमेरिका के प्रस्थान से चीन जहां अपने विस्तार को लेकर बहुत आसंवित हैं तो वहीं अफगान सीमा से सटे अपने मुस्लिम बाहुल्य शिनजियांग (Xinjiang) प्रांत में तालिबान के आने के बाद, ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट ((ETIM) जैसे आतंकी संगठनो के पैर पसारने को लेकर चिंतित हैं। दूसरी ओर उसे अपने BRI और CPEC प्रोजेक्ट को लेकर भी चिंता है जिसे चीन Pakistan से आगे बढ़ाकर अफगानिस्तान तक ले जाना चाहता हैं ताकि वहाँ के खनिज संसाधनो का दोहन करने के साथ पश्चिम एशिया तक व्यापार मार्ग बनाया जा सके।
हालांकि चीन की सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान को लेकर हैं जो एक अस्थिर देश हैं जहां अक्सर अलगाववादी उसके 60 billion लागत वाले CPEC project और उसमे कार्यरत चीनी नागरिकों पर हमला कर अक्सर नुकसान पहुंचाते रहते हैं, पिछले एक माह में पाकिस्तान मे करीब 1 दर्जन चीनी नागरिकों की मृत्यु विभिन्न आतंकी हमलों मे हो चुकी हैं।
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गौरतलब हैं कि चीन अमेरिका और NATO फोर्सेस के Afghanistan छोड़ने के बाद उसकी जगह लेने चाहता है ताकि वो मध्य एशिया में अपनी विस्तारवादी नितीयों को बढ़ावा दे सके। इसी क्रम मे उसने तालिबान को मान्यता देने के ऐलान भी किया हैं। जबकि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में मदद के नाम पर चीन वहाँ कि विशाल खनिज संपदा का दोहन करना चाहता हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं क्योंकि Taliban धर्म आधारित संगठन हैं जबकि चीन कम्युनिस्ट पार्टी के अंतर्गत नास्तिक शासन वाले दृष्टिकोण के साथ सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास को ज्यादा महत्व देता है।
अन्य देशों की तरह चीन भी तालिबान के नेतृत्व वाले अफगानिस्तान से आतंकवाद के खतरे को लेकर चिंतित है। बीजिंग ने तालिबान से बार-बार कहा है कि अफगानिस्तान Xinjiang में आतंकी हमले शुरू करने के लिए आतंकवादियों के लिए प्रजनन स्थल नहीं बनना चाहिए, जैसा कि ओसामा बिन लादेन ने USA पर अपने 9/11 के हमलों के लिए किया था।
चाइना इंस्टीट्यूट से सेवानिवृत्त एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ ली वेई ने कहा कि, “अफगान तालिबान ने वादा किया है कि वे अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी ताकतों से किनारा करेंगे, लेकिन ऐसा होने की उम्मीद कम है क्योंकि वे आधिकारिक तौर पर अभी सत्ता में नहीं और उनकी नियत पर भरोसा भी कम हैं।”
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वहीं अमेरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने आलोचनाओं के जावाब में कहा है कि अफगानिस्तान छोड़ने से America चीन सहित बड़े संभावित खतरों से निपटने के लिए और ज्यादा तैयार हो जाएगा।

