अमित बिश्नोई
दादा को मरणोपरांत भारत रत्न मिला तो पोता एहसानों तले दब गया, इतना दब गया कि पुराने सहयोगियों को तो छोड़ा ही बाप दादा की परंपरा को भी छोड़ दिया। परंपरा लोकसभा चुनाव लड़ने की. जिस दादा ने मरते दम सांसदी का चुनाव लड़ा, जिसका बाप भी मरते दम तक लोकसभा चुनाव लड़ने से पीछे नहीं हटा उसका पोता, उसका बेटा आज चुनावी मैदान से दूर है. यहाँ बात रालोद मुखिया छोटे चौधरी यानि जयंत की हो रही है जिनमें इस बार लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं हुई. घर बदलने के बाद हिस्से में मिली जौनपुर और बाग़पत सीट से जयंत ने खुद सामने आने के बजाये चन्दन चौहान और राजकुमार सांगवान को चुनावी मैदान में उतार दिया। इस तरह चौधरी परिवार की 1971 से चली आ रही लोकसभा चुनाव लड़ने की परंपरा का खात्मा हो गया क्योंकि छोटे चौधरी हिम्मत नहीं जुटा पाए.
हो सकता है अखिलेश का साथ छोड़कर मोदी जी के 400 पार के सपने को पूरा करने के लिए हुए समझौते में जयंत को आगे कोई बड़ा इनाम देने की बात कही गयी हो, वादा किया गया हो और इसी वजह से उन्होंने खुद को असली नेतागिरी से पीछे हटने का फैसला किया हो. असली नेतागिरी इसलिए कि जन नेता तो वही होता है जो जनता द्वारा चुना जाता है, बाकी तो सारे नियुक्ति वाले नेता होते हैं जिनके नाम के आगे विधायक और सांसद लिखा तो होता है लेकिन हकीकत में वो होते नहीं हैं. चुनाव जीतने के लिए हिम्मत चाहिए और जिगर चाहिए। जो हार से डरते हैं वही चुनाव से पीछे भागते हैं. भारतीय राजनीति के इतिहास में ऐसे बहुत से तथाकथित नेताओं के नाम मिल जायेंगे जो जीवन के अधिकांश काल तक माननीय रहे हैं, मंत्री रहे हैं लेकिन उनमें चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं हुई और कभी हिम्मत की भी तो बुरी तरह मात खा गए. छोटे चौधरी भी अब उन्ही हिम्मत छोड़ और डरपोक नेताओं में शामिल हो गए हैं।
एक इंसान जब अपना घर बदलता है तो उसकी कोशिश बड़े घर में जाने की होती है, नौकरी बदलता है तो और ऊंचा ओहदा और ज़्यादा सैलरी की चाहत में बदलता है, बिजनेस बदलता है तो छोटे से बड़े बिजनेस में जाता है, कहने का मतलब कुछ ज़्यादा पाने के लिए ही पाला बदलता है लेकिन छोटे चौधरी को पाला बदलकर क्या मिला। सात की जगह दो सीटें, पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जगह सिर्फ जौनपुर और बागपत। इसे प्रमोशन नहीं डिमोशन कहते हैं। जिस रालोद की पूरे वेस्टर्न यूपी में चुनावी धाक थी वो अब सिर्फ जौनपुर और बाग़पत तक सिमट जाएगी। वेस्टर्न यूपी की बाकी ज़िलों की सीटों के रालोद कैडर का क्या होगा, समर्थकों का क्या होगा। वो किसे वोट करेंगे, भाजपा को, तो फायदे में कौन रहा, भाजपा। घाटे में कौन रहा छोटे चौधरी। भाजपा ने रालोद को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के पूरे क्षेत्र की जगह सिर्फ एक हिस्से में समेट दिया। हम मानकर चलते हैं कि रालोद भाजपा की मदद से ये दोनों सीट जीत जाएगी मगर क्षेत्र की बाकी सीटों पर तो सिर्फ भाजपा की ही चर्चा होगी न. पश्चिमी यूपी की बाकी सीटों पर रालोद की मदद से भाजपा को कामयाबी मिलेगी तो पांच साल तक क्षेत्र में भाजपा सांसद ही दिखेगा न.
बात अगर सिर्फ दो सीटें जीतने की है तो उसका मौका तो सपा और कांग्रेस के साथ मिलकर भी चुनाव लड़ने से मिल सकता था, हिस्से में तो सात सीटें आयी थीं, तीन पार्टियों का एक मुश्त वोट रालोद को दो सीटें तो दिला ही सकता था और पूरे वेस्टर्न यूपी पर धाक अलग जमी रहती, वोटरों और समर्थकों का हौसला अलग बुलंद रहता। हर सीट पर उनका उम्मीदवार होता। राजनीति की ये एक कड़वी सच्चाई है कि जब पार्टी का उम्मीदवार चुनावी मैदान में नहीं होता तो पार्टी का काडर निराश होता है, पार्टी के समर्थकों में निराशा बढ़ती है और ये निराशा आगे जाकर पार्टी के लिए बड़ी घातक होती है. इस फैसले को लेकर लोगों ने छोटे चौधरी से सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं और उनके पास कोई जवाब भी नहीं है. छोटे चौधरी दो सीटों झुक गए ये बात तो लोगों को थोड़ी समझ में आती है लेकिन चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे हैं ये बात लोगों की समझ से बाहर है. मोदी जी 400 पार का नारा लेकर चल रहे हैं ऐसे में रालोद के दो सांसदों की हैसियत क्या होगी, आसानी से समझ में आ सकता है, इसकी क्या गारंटी है कि चुनाव जीतने के बाद ये दोनों सांसद छोटे चौधरी के वफादार बने ही रहेंगे। या इसकी क्या गारंटी है कि चुनाव बाद अगर मोदी जी तीसरी बार पूर्ण बहुमत से पहुँच गए तो छोटे चौधरी को अपने मंत्रिमंडल में एडजस्ट ही करेंगे, अगर एडजस्ट कर भी लेते हैं तो क्या कोई महत्वपूर्ण विभाग भी मिल पायेगा या नहीं। हम तो यही कहेंगे कि छोटे चौधरी ने शार्ट टर्म गेन हासिल करने के लिए लॉन्ग टर्म नुक्सान कर डाला।