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BSP Supremo Mayawati: मुस्लिम और दलित के सहारे 2024 की चुनावी नैया पार करने की कोशिश में बसपा सुप्रीमो मायावती

बहुजन समाज पार्टी मुखिया मायावती अब फिर से चर्चा में हैं। ये चर्चा उनके द्वारा किए गए ट्विट को लेकर है। बसपा सुप्रीमो ने एक ट्विट में भाजपा पर निशाना साधा तो दूसरे से सपा मुखिया अखिलेश यादव पर वार किया। अखिलेश यादव पर वार कर उन्होंने मुस्लिम राजनीति करने वाले दलों को नींद से जगा दिया है। मायावती के दोनों ट्विट के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो चुकी है। राजनीतिक पंडित ये कयास लगाने लगे हैं कि आखिर बसपा की लड़ाई आगामी 2024 के आम चुनाव में किससे होगी। मायावती खुद के लिए सपा को बड़ा खतरा मानती रही हैं। ये उन्होंने 2019 के आम चुनाव में सपा से गठबंधन करके भी देख लिया। जिसका सबसे अधिक लाभ सपा को ही मिला। जबकि बसपा के खाते में कुछ खास हाथ नहीं लगा। सवाल ये है कि मायावती सपा और भाजपा में किसे सबसे बड़ा राजनैतिक दुश्मन मान रही है।। 2024 के आम चुनाव में मुस्लिम वोटर किस ओर करवट लेगा। इस पर भी जोड़तोड़ अब शुरू हो चुका है।  

तेलंगाना में भाजपा से निलंबित विधायक टी राजा सिंह ने पैगम्बर मोहम्मद पर एक विवादित बयान दिया। इसके बाद से देश में टी राजा और भाजपा के खिलाफ आक्रोश बढ़ा। लेकिन भाजपा ने समय रहते बड़ा फैसला किया और टी राजा को निलंबित कर दिया। बसपा प्रमुख मायावती ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने ट्विट कर लिखा कि भाजपा से निलंबित नुपूर शर्मा द्वारा पैगम्बर.ए.इस्लाम के विरुद्ध विवादित टिप्पणी पर देश में गर्माया माहौल पूरी तरह से ठंडा नहीं हुआ कि भाजपा के एक और नेता तेलंगाना विधायक राजा सिंह ने उत्तेजनात्मक कार्य कर दिया। यह अति.शर्मनाक और घोर निंदनीय है। इसके बाद बसपा प्रमुख मायावती ने आज किए अपने दूसरे ट्वीट में कहा कि समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव मुसलमानों को पसंद नहीं करते। यही कारण है कि जब आजम खान जेल में बंद थे तब वह उनसे मिलने नहीं गए। जबकि आजमगढ में जेल में बंद बाहुबली रमाकांत यादव से मिलने पहुंच गए। 

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मायावती ने अपने इस टवीट में लिखा है कि समाजवादी पार्टी प्रमुख द्वारा आजमगढ़ जेल जाकर वहां बंद पार्टी के बाहुबली विधायक रमाकांत यादव से मिलकर उनसे सहानुभूति व्यक्त करने पर हर तरफ से तीखी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। इस आम धारणा को भी प्रबल करता है कि सपा इस प्रकार के आपराधिक तत्वों की संरक्षक पार्टी है। साथ ही, विभिन्न संगठनों व आम लोगों द्वारा भी सपा प्रमुख से यह सवाल पूछना क्या अनुचित है कि वे मुस्लिम नेताओं से मिलने जेल क्यों नहीं जाते हैं। 

आखिर बसपा की लड़ाई किसके साथ:- 

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती जाति और धार्मिक आधार पर वोट मांगने के लिए स्पष्ट हैं। दलित आज मायावती को अपना मसीहा मानते हैं। मायावती को यह पता है कि उनका कोर दलित वोटर्स भले ही खिसक कर भाजपा में चला जाए। लेकिन वह जब चाहेंगी वापस सब उनके पास ही आ जाएंगे। ऐसे में राजनीति में मजबूत होने के लिए उन्हें दलितों के साथ अन्य वर्ग का साथ चाहिए होगा। 2022 के चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण वोटर्स को रिझाने की कोशिश की। लेकिन ऐसा करने में वो असफल रहीं। यही कारण है कि एक बार फिर से मायावती दलित.मुसलमान गठजोड़ की पिच पर 2024 की चुनावी बैटिंग करना चाहती हैं। इसके लिए वह लगातार प्रयास भी कर रहीं हैं। उप्र में मुसलमान मतदाता का साथ खुलकर समाजवादी पार्टी को मिलता रहा है। ऐसे में मायावती को अगर मुसलमानों का मत चाहिए तो उन्हें सपा से दूर करना ही होगा। इस समय मायावती यही करने की कोशिश में लगी हुई हैं। वह चाहती हैं कि मुसलमान एक बार फिर से बसपास के साथ आ जाएं। जिससे वह दलित-मुसलमान गठजोड़ बनाकर सपा को 2024 में तगड़ी चुनौती दे सकें। 

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मायावती दो बार भाजपा की मदद से प्रदेश की मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। भाजपा को लेकर उनके बयान काफी नरम रहते हैं। हालांकि मायावती यह चाहती हैं कि एक बार मुसलमान उनके साथ आ गया तो वह भाजपा को पीछे कर सकती हैं। इसलिए ही मायावती की सबसे अधिक लड़ाई बीजेपी के बजाय सपा से दिख रही है। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के बाद से अब मुसलमानों का भरोसा समाजवादी पार्टी से उठ रहा है। बड़ी संख्या में मुस्लिम नेताओं ने अपने इस्तीफे भी दिए। सपा के खिलाफ मुसलमानों के इस आक्रोश को  मायावती तेजी से भुनाने की कोशिश कर रही हैं। आजम खान के जेल से बाहर आने के बाद उनकी अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद कुछ बदलाव नजर आ रहा है। आज आजम खान मुसलमानों के प्रदेश के सबसे ताकतवर नेता मानते जाते हैं। ऐसी स्थिति में मायावती का दांव फिलहाल कमजोर पड़ा है। हालांकि मायावती की कोशिश जारी है। वेा किसी भी तरह से मुसलमानों को सपा से दूर कर बसपा से जोड़ना चाहती हैं। यहीं कारण है कि बसपा प्रमुख इसको कोई भी राजनैतिक मौका नहीं छोड़ती हैं।

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