बसपा- कहीं नाम की पार्टी बनकर न रह जाए

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बसपा- कहीं नाम की पार्टी बनकर न रह जाए

-फरीद वारसी

बसपा- कहीं नाम की पार्टी बनकर न रह जाए

कोरोना की दूसरी लहर से मची भारी तबाही के कारण अब तक शांत दिख रही उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2022 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हलचल शुरू हो गई है। भाजपा में मंथन बैठकों का दौर लखनऊ से लेकर दिल्ली तक प्रारंभ रहा। माना जा रहा है कि योगी भले ही अपने पद पर बने रहें, लेकिन उनकी टीम यानी मंत्रिमंडल, संगठन और नौकरशाहों में बदलाव की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। सपा छोटे-छोटे दलों को जोड़कर गठबंधन की राजनीति को विस्तार रूप देने में लगी हुई है। शिवपाल ने भी कुछ प्रत्याशियों की घोषणा कर अपनी सक्रियता का एहसास करा दिया है। और इन सब के बीच कांग्रेस भी पीछे नहीं है। बसपा में कुछ हलचल जंरूर कम थी लेकिन अचानक खबर आई कि बसपा प्रमुख मायावती ने बागी नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा कर संगठन के कील-कांटे दुरूस्त करने की शुरूआत करते हुए चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं। कुल मिलाकर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए सभी दलों ने राजनीति की बिसात पर अपनी-अपनी गोटें बिछानी शुरू कर दी जो इस बात का संकेत है कि विपक्ष सत्तारूढ़ भाजपा को कड़ी चुनौती देने के लिए कमर कस रहा है और ऐसे में योगी की राह आसान नही है। जिनको भाजपा के आलानेताओं ने भले ही क्लीनचिट दे दी हो।

जैसा कि उल्लेखनीय है कि बसपा प्रमुख मायावती ने कांशीराम के पुराने साथी व बसपा के संस्थापक सदस्य रहे राष्ट्रीय महासचिव रामअचल राजभर और विधायक दल क नेता लालजी वर्मा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इन नेताओं पर आरोप है कि इन्होंने पंचायत चुनाव में पार्टी को नुकसान पहुंचाने का काम किया। सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि यह भी कहा गया कि विधानसभा चुनाव से पूर्व यह उपरोक्त नेता किसी और दल में शामिल होने की फिराक में थे। वह पार्टी से निकाले गए नेताओं का कहना है कि उन पर लगाए गए आरोप निराधार हैं और बहनजी को कुछ गलतफहमी हुई है। वे जल्द ही उनसे मिलकर उनकी गलतफहमी दूर करने के प्रयास करेंगे। वैसे मायावती की यह फितरत नहीं है कि अपने फैसले को बदले या फिर किसी नेता को माफ करें। मायावती का रिकार्ड बताता है कि अगर वे किसी बात पर पार्टी के किसी नेता से नाराज हो गई तो बसपा में उसका वर्तमान और भविष्य दोनों ही खत्म। यह पहला मौका नहीं है कि मायावती ने पार्टी के किसी नेता को बाहर का रास्ता दिखाया हो। मायावती अक्सर ऐसा करती रहती हैं। यही कारण है कि पिछले 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा के जीते कुल 19 विधायकों में से सिर्फ 7 ही बचे हैं। पार्टी के 11 विधायकों को वे विभिन्न कारणों के चलते निकाल चुकी हैं। जबकि एक सीट बसपा उपचुनाव मे हार गई थी।

अपने नेताओं को पार्टी से बाहर निकालने के मायावती के इस चिरपरिचित अभियान के बाद यह कहा जा सकता है कि अब बसपा में मायावती व सतीश चंद्र मिश्रा के बाद बड़े नाम व कद को कोई नेता नहीं बचा है। जो हैं उनका कोई खास राजनीतिक वजूद नहीं । फिर कब तक बसपा में बने रहेंगे, यह मायावती पर निर्भर करता है। पता नहीं वे किसी बात से नाराज होकर पार्टी से बाहर निकालने का आदेश जारी कर दें। अगर यही हाल रहा तो बसपा के वजदू पर सवालिया निशान लग जाएगा। वरना एक समय ऐसा भी था कि बसपा में जहां कांशीराम के पुराने साथी नेताओं से लेकर संस्थापक सदस्यों जिनके बड़े-बडे़ नाम थे जैसे दीनानाथ भस्कार, रामपूजन पटेल, नसीमउद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्या, ब्रजेश पाठक जो जमीन व जनता से जुड़े हुए थे। इनमें से बहुत से ऐसे है जिन्होंने कांशीराम के साथ संघर्ष कर बसपा को प्रदेश की राजनीति में पहचान दिलाई। पहले विपक्ष फिर प्रदेश की सत्ता तक पहुंचाने में अहम योगदान दिया। लेकिन कांशीराम के निधन के बाद जब मायावती के हाथों बसपा की बागडोर आई तो कहा जाता है कि पार्टी में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए मायावती ने कांशीराम के करीबियों को एक-एक करके बाहर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा। फिर दूसरे और नेताओं के साथ भी ऐसा सलूक किया ताकि पार्टी में उनकी हनक बनी रही। इनमे से नसीमउद्दीन सिद्दीकी को तो मायावती का सबसे खास सिपाहसलार कहा जाता था। लेकिन मायावती ने उन तक को भी नहीं बख्शा और पार्टी से बाहर करने में देरी नहीं की। जो बसपा से निकाले जाने के बाद कांगे्रस में शामिल हो गए।

जाहिर सी बात है कि बसपा से निकाले जाने के बाद इन नेताओं ने दूसरे राजनीतिक दलों की शरण ली। मायावती द्वारा अनुशासन की कार्यवाही के नाम पर निकाले गए नेताओं से इतर देखने वाली बात यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से तो माना जाता है कि बसपा छोड़कर सपा में शामिल होने वालों की लंबी लाइन लग गई। बसपा से आया राम और गयाराम की जो गाड़ी चली उसका प्रमुख कारण यह माना जा रहा है कि निरंतर दो लोकसभा चुनाव क्रमशः 2014 व 2019 तथा लगातार दो विधानसभा चुनाव क्रमशः 2012 व 2017 में हार के बाद यह माना गया दलित के नाम पर राजनीति करने वाली बसपा के राजनीतिक आधार अब खत्म होने के कगार पर है। वहीं इससे पूर्व 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा को इतिहास में पहली बार सूबे में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने का गौरव हासिल हुआ। लेकिन मायावती इस जीत के क्रम को बरकरार नहीं रख सकी। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा न सिर्फ हारी, बल्कि उसे सत्ता से भी हाथ धोना पड़ा। 2014 के लोकसभा सभा चुनाव में बसपा का खाता तक नहीं खुला। जिसके लिए उन्होंने मुस्लिम मतदातओं को दोषी ठहराकर अपनी करारी हार पर पर्दा डालने की कोशिश की। अब भला मुसलमान कोई बंधुआ मजदूर तो हैं नहीं कि हर कोई उन पर हक जाता रहे। बहरहाल, हार के लंबे सिलसिले ने मायावती को सपा के साथ अपनी पुरानी अदावत को खत्म करने के लिए विवश किया। पिछला लोकसभा चुनाव सपा-बसपा ने मिल कर लड़ा। कहा जा रहा था कि यह गठबंधन प्रदेश में ऐतिहासिक जीत हासिल करेगा। परंतु भाजपा द्वारा पुलवामा के शहीदों के नाम पर की गई चुनावी राजनीति के कारण इस गठबंधन को महज 15 सीटें ही मिली। जिसमें की सर्वाधिक 10 बसपा को मिली। मायावती को लगा कि दलित-मुस्लिम गठजोड़ के कारण उन्हें 10 सीटें मिली हैं और इससे उत्साहित मायावती ने सपा से गठबंधन तोड़ने में जरा सी भी देरी नहीं की। जो उनकी राजीतिक भूल ही कही जाएगी। और एक बार फिर उन्होंने अगला विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा की है। लेकिन अकेले चुनाव लड़ने के लिए किसी राजनीतिक दल में जो वोटबैंक के अलावा दमखम, जनाधार वाले नेताओं की लंबी कतार और कार्यकर्ताओं की जो फौज होनी चाहिए थी उसका घोर अभाव बसपा में देखने को मिल रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि कांशीराम की अथाह मेहनत व संघर्ष से बामसेफ मूवमेंट से उपजी बसपा कहीं नाम की पार्टी बन कर न रह जाए।

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