भाजपा की मजबूरी है, किसान वोट उसके लिये भी जरूरी हैं

उत्तराखंडभाजपा की मजबूरी है, किसान वोट उसके लिये भी जरूरी हैं

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भाजपा की मजबूरी है, किसान वोट उसके लिये भी जरूरी हैं

यूपी पंचायत चुनाव में मिली हार ने खोल दी भाजपा नेतृत्व की आंखे
अगले वर्ष होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मंडरा रहा हार का खतरा

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। नये कृषि कानून लागू करने को लेकर किसानों का विरोध झेल रही भाजपा को उत्तर प्रदेश में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। इस पराजय ने अब तक खुद को अजेय समझने वाले भाजपा नेतृत्व की आंखें खोल दी। संगठन को समझ में आ चुका है कि किसानों का विरोध जारी रहा तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी उसे पराजय का सामना करना पड़ेगा। और यदि ऐसा हो गया तो मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट विपक्ष को और मजबूती मिलेगी जो आने वाले समय में केंद्र सरकार के लिये बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

किसानों के हित में बताये जा रहे तीन कृषि कानून को लागू करना केंद्र की मोदी सरकार के लिये गले की फांस बन गया। कृषि कानून के विरोध में एकजुट हुए किसानों को केद्र सरकार नजरअंदाज करती गयी। किसान आंदोलन को कभी कारोबारियों का आंदोलन बताया गया तो कभी खालिस्तानियों की किसान आंदोलन में भागीदारी का मुद्दा उठाया गया। आंदोलन ने भी कई करवटें बदली और बीती 26 जनवरी को लालकिले तक पहुंचे किसानों ने दिल्ली में जमकर उत्पात मचाया। हालांकि किसान संगठनों ने उपद्रवियों के कृत्य से खुद को और आंदोलन को अलग कर लिया। किसान आंदोलन को समाप्त करने की तैयारी की गयीं लेकिन भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत के आंसूओं ने आंदोलन का रूख ही बदल दिया। देखते ही देखते किसान आंदोलन फिर से खड़ा हो गया।

किसान आंदोलन को हल्के में लेने का खामियाजा भाजपा को उत्तर प्रदेश में हुए त्रिस्तीय पंचायत चुनाव में भुगतना पड़ा। एकजुट हुए किसानों ने भाजपा को पराजय का मुंह देखने को मजबूर कर दिया। इस हार से तिलमिलाई भाजपा को समझ आ गया कि आने वाले विधानसभा चुनाव उसके लिये बेहद चुनौतीपूर्ण होने जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि हाल ही में आरएसएस से लेकर भाजपा संगठनों की बैठकों में भी किसान विरोध से होने वाले राजनीतिक नुकसान पर गंभीरता से चर्चा की गयी। भाजपा नेतृत्व भी यह समझ चुका है कि यदि किसान आंदोलन इसी प्रकार जारी रहा तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पराजय का मुँह देखना पड़ सकता है।

ऐसे में भाजपा नेतृत्व ने किसानों को मनाने का रास्ता खोजना शुरू कर दिया है। इसी के तहत महीनों से किसान आंदोलन को नजरअंदाज करती आ रही मोदी सरकार की ओर से किसानों से वार्ता का प्रयास किया जा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि नए कृषि कानूनों से संबंधित प्रावधानों पर किसी भी किसान संगठन से और कभी भी बात करने को तैयार है। उन्होंने कहा, ‘कोई कमी नहीं है, भारत सरकार किसान से वार्ता करने को तैयार हैं। कानून निरस्त करने को छोड़कर एक्ट से संबंधित प्रावधान पर कोई भी किसान यूनियन आधी रात को बात करने को तैयार है तो नरेंद्र सिंह तोमर उनका स्वागत करेगा। नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद का भी कहना है कि किसानों को सरकार के साथ बातचीत फिर से शुरू करने के लिये कृषि कानूनों को एकदम से निरस्त करने की मांग के बजाए खामियों को स्पष्ट रूप से बताने के बारे में ‘कुछ संकेत’ देने चाहिएं।

जाहिर है कि मोदी सरकार ने किसानों को मनाने के प्रयास शुरू कर दिये हैं मगर वह अपने लिये भी सम्मानजनक समझौता चाहती है। केंद्रीय कृषि मंत्री ने स्पष्ट किया है कि वह कानून निरस्त करने को छोड़कर एक्ट से संबंधित प्रावधान पर बात करने को तैयार है। यानि मोदी सरकार किसानों की नाराजगी देखते हुए कृषि कानून में परिवर्तन लाने को तो तैयार है मगर अपने अहम को बचाने के लिये कृषि कानून वापस लेने को वह अब भी तैयार नहीं है। मोदी सरकार किसान आंदोलन समाप्ति का ऐसा समझौता चाहती है जिससे दोनों पक्षों की जीत हो। मगर किसान संगठन कृषि कानून रद किये बिना किसी भी प्रकार की वार्ता करने को तैयार नहीं है। वहीं उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में किसान एकजुटता ने आंदोलन को और मजबूती दे दी है। ऐसे में किसान अपनी मांगों से आसानी से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

नये कृषि कानून को लागू करने की जिद ने भाजपा को बड़ा नुकसान पहुंचाया है और यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के सामने हार का खतरा मंडरा रहा है। लेकिन इसके लिये जिम्मेदार खुद भाजपा सरकार है। खुद को अजेय समझकर अहम से भरे भाजपा नेतृत्व ने किसान आंदोलन को छिन्न-भिन्न करने के लिये जो तरीके अपनाये उससे आंदोलन और मजबूत होता चला गया। आज सामने खड़े राजनीतिक संकट को देखते हुए मोदी सरकार भले ही बातचीत के लिये आगे आ रही है मगर किसान आंदोलन के दौरान हुए अत्याचार, किसानों की मौत का हिसाब देना उसके लिये मुश्किल होगा। किसानों से बातचीत करना ‘सही’ मगर ‘देर’ से उठाया कदम है। यदि अपनी जिद को छोड़कर भाजपा ने पहले ही आंदोलन को खत्म करने के लिये किसानों को मनाने का सार्थक प्रयास किया होता तो शायद उसे यूपी पंचायत चुनाव में हार का सामना न करना पड़ता। किसान आंदोलन से संजीवनी पाई रालोद आज मजबूत प्रतिद्वंदी बनकर उसके सामने न खड़ी होती। सपा, कांग्रेस के साथ आप को यूपी में पैर जमाने का इतना अच्छा अवसर न मिल पाता।

‘देर आये दुरस्त आये’ की कहावत शायद भाजपा के लिये उपयुक्त न बैठे क्योंकि देर से आगे आयी भाजपा के लिये संभवत आने वाला समय इतना दुरस्त न हो। जख्म भरने में समय लगता है और किसान आंदोलन और केंद्र सरकार के रवैये की पीड़ा लंबे समय तक किसानों के मन में कायम रहेगी। कहा जाता है की देर से शुरू किया गया इलाज जख्म को नासूर बना देता है जिसका खामियाजा अंग-भंग करवा कर भुगतना पड़ता है। लेकिन किसान और देश हित में वार्ता करने के साथ आवश्यक है कि किसानों को समझाने के साथ उनकी पीड़ा, उनकी चिंताओं को भी समझा जायेे। क्योंकि किसान हित में लाये गये कानून यदि किसानों को ही समझ नहीं आये तो ऐसे कानून को लागू करने को लाभ क्या है। बेहतर होगा कि कृषि कानून को वापस न लेने की जिद भाजपा नेतृत्व छोड़ दे और किसानों के साथ जल्द वार्ता कर आंदोलन का समापन करने का प्रयास करे। क्योंकि भाजपा की भी मजबूरी है, किसान वोट उसके लिये भी जरूरी है।

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