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बिलकीस बानो का सम्मान या अपमान?

गुजरात दंगों के दौरान बिलकीस बानो केस बहुत चर्चित रहा था, गोधरा कांड के बाद भड़की दंगों की आग की लपटों से बचाने के लिए सभी लोग अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे थे, बिलकीस बानो भी उनमें से एक थीं जिन्होंने अपने परिवार संग गाँव छोड़ दिया था मगर वो दंगाइयों के हत्थे चढ़ गयीं। उनके परिवार के सात लोगों की हत्या कर दी गयी, कुछ लोग भाग निकलने में कामयाब हो गए और बिलकीस बानो दंगाइयों के हैवानियत का शिकार बनीं, उनके साथ गैंग रेप हुआ और जिस समय उनके साथ ये हैवानियत हुई वो गर्भ से थीं मगर हवस के पुजारियों को ज़रा भी दया नहीं आयी. बाद में मामले की जांच हुई, आरोपी गिरफ्तार हुए, सीबीआई की स्पेशल अदालत में मुकदमा चला, आजीवन कारावास की सजा भी हुई और सभी 11 दोषी सजा भी काट रहे थे मगर गुजरात सरकार ने राज्य के माफ़ी कानून का सहारा लेकर 15 साल बाद बिलकीस बानों के इन रेपिस्टों को माफ़ी दे दी, कल वो लोग जेल से बाहर भी आ गए हैं. इन रेपिस्टों को माफ़ी देने का फैसला गुजरात सरकार ने अपने विवेक से किया है क्योंकि गुजरात में कानून है कि 15 साल से ज़्यादा की सजा काट चुके उम्र कैद के सजायाफ्ताओं को गुजरात सरकार चाहे तो माफ़ी दे सकती है और गुजरात की भाजपा सरकार ने वही किया, उसके विवेक के हिसाब से एक गर्भवती महिला के साथ गैंग रेप करने वालों को इतनी सजा काफी है.

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अभी कल ही लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारी के सम्मान में बड़ी बड़ी बातें कही थीं और उसी दिन गुजरात जो उनका गृह राज्य है, जहाँ के वो लम्बे समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं, जहाँ पर एक पत्ता भी उनके आदेश के बिना नहीं हिलता, मुख्यमंत्री कोई भी हो लेकिन फरमान तो ऊपर से ही आता है, उसी गुजरात में दंगों का दंश झेलने वाली एक नारी बिलकीस बानों जो दंगों के दौरान गर्भ की हालत में सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई, जिसके परिवार के सात लोगों की हत्या कर दी गयी, वह बलात्कारी आज गुजरात सरकार की कृपा से जेल के बाहर आ गए. नारी सम्मान की यह किस तरह की बातें हैं, क्या इन बलात्कारियों को कानून का सहारा लेकर आज़ाद कर देना बिलकीस बानों का सम्मान करना कहा जायेगा। बात यह नहीं कि बिलकिस बानो के बलात्कारी छोड़े गए या किसी और के, बात सिर्फ यह है कि एक महिला अपने साथ हुई एक घिनावनी घटना में इन्साफ पाकर संतुष्ट थी, अपना जीवन जी रही थी, बलात्कारियों के इस माफ़ीनामें के बाद वो अपने आपको एक बार फिर ठगी सी  महसूस कर रही होगी। जेल से जब उसके बलात्कारी बाहर आकर खुशियां मना रहे थे , लड्डू खा रहे थे, महसूस ही किया जा सकता है कि उस पीड़ित महिला पर क्या बीत रही होगी

आप कह सकते हैं कि उनको यह माफ़ी कानून के तहत मिली है लेकिन उस कानून में ऐसी कोई बंदिश नहीं थी कि ऐसे किसी जघन्य अपराध के सज़ायाफ्ता को माफ़ी देना ज़रूरी है, आपके विवेक पर है और माफीनामे का यह फैसला गुजरात सरकार के विवेक पर ही सवाल उठा रहा है. क्या एक गर्भवती महिला से सामूहिक दुष्कर्म करने वालों को सामूहिक माफीनामा देना सही फैसला है. बात अगर कानून की है तो बेशक गुजरात राज्य में इस तरह का कानून है मगर गुजरात सरकार का यह फैसला ऐसे मामलों के केंद्र के सिद्धांत के खिलाफ जाता है. गृह मंत्रालय की बेबसाइट पर केंद्र की विशेष नीति के पेज 4 के बिंदु क्रमांक 5 में इस बारे में स्पष्ट तौर पर लिखा है जिसमें कहा गया है कि उम्र क़ैद की सजा वाले किसी भी व्यक्ति को रिहा नहीं किया जाएगा. 

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सवाल यहाँ यह भी उठता है कि केंद्र और गुजरात में भाजपा की ही सरकार है लेकिन कानून में इतना विरोधाभास क्यों? क्या इस मामले में गुजरात सरकार को केंद्र के सिद्धांत का पालन नहीं करना चाहिए था या फिर कोई मजबूरी थी. वो मजबूरी चुनावी भी हो सकती है, गुजरात में कुछ ही महीनों में चुनाव हैं, बिलकीस बानो के बलात्कारियों को कानून के दायरे में रहकर माफीनामा देना साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण की एक कोशिश भी हो सकती और अगर ऐसा है तो इसपर किसी को हैरानी भी नहीं होनी चाहिए। हैरानी तो हमें बस इस बात पर है कि जिस दिन लाल किले से नारी सम्मान की बात हुई उसी दिन कहीं किसी नारी का अपमान हुआ.

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