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बिहार चुनाव : कारवां गुजर गया गुब्बार देखते रहे


बिहार चुनाव : कारवां गुजर गया गुब्बार देखते रहे

चितरंजन कुमार

तीन चरणों में बिहार विधानसभा चुनाव पूरा हुआ और आज 12 बजे तक परिणाम सबके सामने होगा । पर इस चुनाव में विकास का मुद्दा कहीं कोने में दुबका हुआ था । ऊपर ऊपर लुभावने वादे , अंदर से वही तिकड़म। इस बार बिहार में कोई स्वस्थ राजनीति नहीं हो रही थी, इस दफ़े यहाँ खुलेआम पकड़ा पकड़ी का खेल चल रहा था ।

कोई राजपूत पकड़ रहा था, कोई ब्राम्हण. कोई कुर्मी पकड़ रहा था कोई पासवान. जिसके हाथ से यादव छुट गया उसने भूमिहार पकड़ कर मामले को “मैनेज” किया . “मैला आंचल” के चेथरिया पीर की तरह लोकतंत्र चुपचाप किसी डाल पर अटका पड़ा है….

अपने लहूलुहान वर्तमान से घायल बिहार हर बार नालंदा, विक्रमशिला और बोधगया का मरहम लगाता है.यहाँ उम्मीद का ठोस रास्ता न जाने कैसे आहिस्ता आहिस्ता एक बड़े दलदल में तब्दील हो जाता है. स्वप्न और यथार्थ के बीच जो फासला है, उसे हकीकत में देखने की आरजू लिए न जाने कितनी पीढियाँ जमीदोंज हो गई.

हर पांच साल पर चुनाव के वक्त पटना के गाँधी मैदान से क्रांति की जो लहर उठती है उसे ना जाने कौन मायावी सुरसा खा जाती है . बदलाव और क्रांति के नारे को उदरस्थ करके यहाँ के घाघ राजनेता डकार भी नहीं मरते. होशियार रहिये कि मुस्कान यहाँ षड्यंत्र की पहचान है. उम्मीद की लौ बस इसलिए जलाई जाती है ताकि जहालत और बेबसी से ठिठुरती हड्डियों को “वोट बैंक” में तब्दील किया जा सके . मिथिला, तिरहुत, कोसी में आपको कही विकास दिखे तो बताइएगा । इतने सालों से कोसी बाढ़ में डूब रहा है । इतने सालों से बरसात में पूरा पटना नाले में बदल जाता है । इतने सालों से सरकारी अस्पतालों की हालत खस्ताहाल बनी हुई है । इतने सालों से राजनेता वादों की डुगडुगी बजा रहे हैं। मेरी उँगलियों में वह ताकत नहीं जो बेबस आँखों का दर्द उकेर सके । पता नहीं कोई नया “ह्यंन श्यांग” इसे तारीख में दर्ज करेगा या नहीं ।

आप पटना से सहरसा जाइये या गया से भागलपुर जाइये. ट्रेन की बोगी में एक ऐसा आदमी जरुर मिलेगा जो कह रहा होगा कि वह लालू, नीतीश या सुशील मोदी को 20 साल पहले से जानता है. कि कैसे जेपी आंदोलन में उसने लालू को जेल से बचाया था. की आज भी अकेले में मिलने पर नीतीश कुमार हालचाल जरुर पूछते हैं .पूरा बिहार इन हवाई किस्सों से खुद को दिलासा देता है. वह अपने कुछ होने की डिंग हांक कर रिलैक्स फील करता है. जिसके पास कुछ ठोस न हो वह कल्पना में ही सुख पाता है.और सुख है की बिहार की मुट्ठी से रह रह कर फिसल जाता है। कल नीतीश हों या तेजस्वी क्या फर्क पड़ता है ?…

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