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Uttarakhand Politics: भगत दा के उत्तराखंड वापसी की खबर से सूबे की राजनीतिक हलचल तेज

Uttarakhand Politics

देहरादून- महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के उत्तराखंड वापसी की खबरों से सुबे के राजनीतिक माहौल में हलचल महसूस की जाने लगी है मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले भगत दा कि उत्तराखंड वापसी उनके लिए ढाल का काम करेगी या फिर उनके लिए चुनौतियां पेश करेगी यह सवाल राज्य की राजनीतिक गलियारों में फिलहाल गूंज रहा है आपको बता दें की महाराष्ट्र के राज्यपाल और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सभी राजनीतिक दायित्व से मुक्ति देने की बात कही थी

राजनीतिक हलचल

मौजूदा समय में उत्तराखंड से दूर दूर रहने के बाद भी उत्तराखंड की राजनीतिक दूरी के इर्द-गिर्द नजर आने वाले भगत दा अब उत्तराखंड आने की तैयारी में है. पीएम मोदी को लिखे पत्र में उन्होंने अपने को सभी राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त करने का आग्रह किया है. जिसके बाद उनके उत्तराखंड में वापसी दो धुरी मैं बैठी भाजपा की राजनीति में हलचल महसूस होने लगी है. इन सब टीवी के सवाल यह भी उठना लाजमी है कि मौजूदा सीएम पुष्कर सिंह धामी के राजनीतिक गुरु कहे जाने वाले भगत सिंह कोश्यारी, धामी के लिए सुरक्षा कवच बनेंगे या फिर उनके लिए चुनौती पेश करेंगे.

वर्तमान में उत्तराखंड बीजेपी में फिलहाल दो ही गुट नजर आ रहे हैं जिसमें पहला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तो दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को माना जाता है. दोनों के बीच की राजनीतिक कशमकश पिछले काफी समय से चर्चा का विषय बनी हुई है ऐसे में सियासी गलियारों में हमेशा से ही चर्चा रही है कि धामी से नाराज लोग त्रिवेंद्र सिंह रावत के यहां नजर आते हैं. भगत दा की वापसी धामी खेमे को मजबूत करने का काम करेगा. महाराष्ट्र के राज्यपाल रहते हुए भी उनकी हनक धामी सरकार में लगातार देखने को मिलती रही है.

भगत दा की इच्छा

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने ट्वीट कर अपनी मंशा जाहिर की थी. उन्होंने पीएम मोदी को पत्र लिख सभी राजनीतिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने का आग्रह किया था. उन्होंने इस मुक्ति के बाद अपना सारा समय अध्ययन और अन्य सामाजिक गतिविधियों मैं लगाने की इच्छा जाहिर की. इधर भगत सिंह कोश्यारी ने सोशल मीडिया पर अपनी इच्छा जाहिर की और दूसरी तरफ उत्तराखंड की शांत वादियों में राजनीतिक कयास बाजी तेज हो गई.

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