- नवेद.शिकोह
कोरोना संक्रमण की तबाही से दहली यूपी की शहरी जनता सेल्फ लॉकडाउन लगा कर जीवन बचाने के लिए अपनी जीविका की कुरबानी दे चुकी है। जीविका छोड़ने वाले गैर सरकारी पेशेवरों को सरकार फिलहाल कोई मदद नहीं कर रही। यदि सरकार संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर देती तो अनिवार्य रूप से घर बैठे करोड़ों गरीबों की रोटी का इंतजाम करना अनिवार्य हो जाता। शायद इसलिए ही सरकार अदालत के आदेश के बाद भी लॉकडाउन का सरकारी आदेश ना देने की ज़िद पर अड़ गई।
करीब एक सप्ताह से ज्यादा वक्त से यूपी के तमाम शहरों में रात को कोरोना कर्फ्यू है और दिन में लोगों ने जान बचाने के लिए खुद ही निकलना बंद कर दिया है। दिन भर सड़कें सूनी हैं। आधे से ज्यादा बाजार बंद हैं। लोग बाहर नहीं निकल रहे हैं तो गरीब ठेले वालों, रिक्शे वालों, खोमचे वालों, मजदूरों-मेहनतकशों का बुरा हाल है। कोरोना इन गरीबों की रोजी-रोटी छीन चुका है। लोग उम्मीद लगाए हैं कि सरकार आर्थिक मदद की घोषणा करेगी। लेकिन ये आशा फिलहाल पूरी होती नहीं दिख रही है।
कोर्ट की बात को भी ना मान कर प्रदेश सरकार संपूर्ण लॉकडाउन नहीं लगाने की ज़िद पर क्यों अड़ गई ? इस सवाल का जवाब शायद ये हो कि सरकार नहींं चाहती की उसे राजकीय कोष का नुकसान उठाना पड़ेगा। क्योंकि सरकार को लॉकडाउन करने पर रोजी से हाथ धोने वाले करोड़ों गरीबों को आर्थिक मदद देनी ही पड़ती।
मालूम हो कि संक्रमण की बढ़ती रफ्तार और मौत की आंधी से डरी जनता ने सेल्फ लॉकडाउन पर अमल शुरू कर दिया है। दुकानदारों ने खुद बंदी का एलान कर दिया। बाजारों में सन्नाटा है। खोमचे वाले, रिक्शे वाले, ठेले वाले मजदूर, गरीब.. जो रोज कुआं खोदकर रोज़ पानी पीते थे उनकी रोटी का संकट मंडरा रहा है। फैलते संक्रमण और मौतों के खौफ से सेल्फ लॉकडाउन के दौरान सरकार गरीबों को आर्थिक पैकेज देने की कोई बात नहीं कर रही है। लेकिन अगर सरकार लॉकडाउन लगवाती है तो उसे करोड़ों गरीबों, मजदूरों, ठेले वालों, खोमचे वालों को आर्थिक पैकेज देना ही होता।
राष्ट्रधर्म, नैतिकता और नियम भी यही कहता है कि आपदा में लॉकडाउन लगाने के बाद केन्द्र और प्रदेश सरकार का दायित्व बनता है कि जिन गरीबों की घर में बैठने से जीविका ठप्प हो गई उनका पेट भरने का इंतेज़ाम करे।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल जनसंख्या वाले राज्य की करीब आधी आबादी रोज कुआं खोद कर रोज पेट भरती है। ऐसे में घोषित लॉकडाउन में दस करोड़ तक की संख्या के गरीबों-मजदूरों, मेहनतकशों को केंद्र और प्रदेश की सरकार द्वारा आर्थिक मदद देना ही पड़ती।
लॉकडाउन का सरकारी फरमान न जारी करने की यूपी सरकार की ये मंशा हो सकती है कि जब जनता खुद ही संक्रमण से जान बचाने के लिए लॉकडाउन जारी रखे है तो सरकार को लॉकडाउन लगाने की क्या जरुरत !
यूपी सरकार जब अदालत की बात को भी मानने को तैयार नहीं हुई तो आमजन में सरकार की जिद के पीछे उसकी मंशा पर बहस छिड़ गई। सरकार के इस फैसले के पीछे कई मुंह और कई तरह की बाते होने लगीं।
शाम को खबर आई कि अदालत ने यूपी में लॉकडाउन लगाने को कहा है। बाजारों में खरीदारी के लिए लोग टूट पड़े। दवा से लेकर दारू, किराना स्टोर से लेकर सब्जी और सिगरेट-पान की दुकानों पर हुजूम लग गया। लोग अनुमान लगा रहे थे कि यूपी सरकार कोर्ट के आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू कर देगी। लोगों ने अंदाज़ा लगाया कि रात के कर्फ्यू के साथ लॉकडाउन शुरू हो जाएगा। एकाएकी बाजारों में लगी भीड़ कम होने लगी। दो घंटे के हाइवोल्टेज ड्रामें में सरकार के बयान की दूसरी ख़बर आ चुकी थी जिसमें कहा गया था कि जीवन के साथ जीविका भी बचानी है इसलिए यूपी सरकार संपूर्ण लॉकडाउन नहीं लगाएगी।
उच्च न्यायालय के आदेश के क्रम में यूपी सरकार के प्रवक्ता ने बताया कि प्रदेश में कोरोना के मामले बढ़े है, और सख्ती कोरोना के नियंत्रण के लिए आवश्यक है।उत्तर प्रदेश सरकार ने कई कदम उठाए है। और आगे भी जितना भी संभव होगा सख्ती बरती जाएगी। प्रदेश सरकार ने.कहा कि जीवन बचाने के साथ गरीबों की आजीविका भी बचाना ज़रूरी है। समपूर्ण लॉक डाउन अभी नही लगेग। नागरिक खुद जारुकता दिखा रहे हैं। व्यापारियों ने स्वत: बंदी जारी रखी हैं।
सरकार के इस बयान से ये बात साफ जाहिर हो गई कि बंदी (सेल्फ लॉकडाउन) चल ही रही है तो लॉकडाउन का सरकारी आदेश क्यों दिया जाए !
लेकिन सरकार की यही मंशा है तो ठीक है, घर बैठने से जीविका से हाथ धोने वाले गरीबों, मजदूरों, ठेले, खोमचे वाले गरीबों और छोटे व्यापारियों की रोटी का इंतजाम करने का कर्तव्य निभाना चाहिए है। कोरोना की मौतों के खौफ और संक्रमण को काबू करने के लिए आम जनता जब अपनी ज़िम्मेवारी निभाकर खुद घरों में बैठ गई है तो इनका पेट भरने के लिए सरकार को भी अपनी जिम्मेदारी से भागना नहीं चाहिए !

