लखनऊ/ बरेली। यूपी चुनावी दंगल 2022 – एमवाई फैक्टर समाजवादी पार्टी को चुनाव में जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाता रहा है। इस बार सत्ता पाने के लिए समाजवादी पार्टी ने अपनी नई सोशल इंजीनियरिंग का जो ताना-बाना बुना है उसमें सिर्फ एमवाई ही नहीं बल्कि सभी वर्गों को साथ में लेने की कोशिश की गई है। इस कोशिश के चलते बरेली में एक भी सीट पर यादव प्रत्याशी चुनावी मैदान में नहीं है।
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उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में मुस्लिम और यादव मतदाताओं पर कुछ पार्टियां हमेशा ही अपना दावा करती रही हैं। इन मतदाताओं ने भी अपने रुझान से इस बात पर मोहर लगाई है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को यादव मतदाता अपने सबसे करीब पाते हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को भी यादव मतदाताओं ने भरपूर प्यार दिया। मगर, सत्ता पाने के लिए कई तरह की कुर्बानी भी करनी पड़ती है। इस बार यह कुर्बानी यादवों के नाम ही आई है। बरेली की नौ विधानसभा सीटों में से एक पर भी यादव दावेदार को टिकट नहीं मिला। बिथरी विधानसभा क्षेत्र की बात की जाए तो यहां पार्टी से आदेश सिंह यादव, प्रमोद यादव, सूरज यादव आदि टिकट मांग रहे थे। चर्चा यह भी चल रही थी कि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के वीरपाल सिंह यादव को यहां से मैदान में उतारा जाएगा। वीरपाल सिंह यादव ने बरेली में समाजवादी पार्टी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई थी। 1992 में पार्टी के गठन के बाद उन्हें 1993 में जिला अध्यक्ष चुना गया था। 2006 तक लगातार 15 वर्ष इस पद पर रहे। 2010-11 में एक बार फिर वीरपाल जिलाध्यक्ष बने थे। पार्टी में विघटन के बाद वो प्रसपा में चले गए। सपा-प्रसपा गठबंधन को देखते हुए यह सीट उन्हें मिलने की पूरी उम्मीद थी। अंतिम समय में पार्टी ने वर्तमान जिला अध्यक्ष अगम मौर्या को मैदान में उतार दिया।
यह हैं जातिगत आंकड़े
जातिगत आंकड़ों के हिसाब से बिथरी सीट पर लगभग 25000 यादव मतदाता हैं। बहेड़ी सीट पर 22000, नवाबगंज और भोजीपुरा में दस-दस हज़ार, आंवला में 30 हज़ार, फरीदपुर में 40 हज़ार और मीरगंज में करीब 7000 यादव मतदाता है। इसके बाद भी किसी सीट पर यादव को टिकट नहीं दिया गया। आंवला से पूर्व विधायक महिपाल सिंह यादव, जीराज यादव और विजेंद्र सिंह यादव टिकट मांग रहे थे। मजबूत दावे के बाद भी किसी को टिकट नहीं मिला। यहां तक पार्टी ने अपने नए जिलाध्यक्ष के पद पर भी शिवचरण कश्यप को बैठा दिया। ऐसे में अखिलेश यादव ने पिछड़ा वर्ग को भी अपने पाले में लेते हुए सोशल इंजीनियरिंग की नई परिभाषा लिखने की कोशिश की है।
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सपा के बदलाव के बाद यह है रणनीति
टिकटों की अगर बात की जाए तो समाजवादी पार्टी ने इस बार शहर से राजेश अग्रवाल और कैंट से सुप्रिया ऐरन को टिकट दिया है। यह दोनों ही वैश्य बिरादरी से नाता रखते हैं। बिथरी में मौर्य बिरादरी के अगम मौर्य और भोजीपुरा, मीरगंज और बहेड़ी में मुस्लिम प्रत्याशी उतारे गए हैं। फरीदपुर में सुरक्षित सीट होने के कारण विजय पाल सिंह को टिकट मिला है। ब्राह्मण मतदाताओं को साधते हुए आंवला में पंडित आर के शर्मा को मैदान में उतारा गया है। नवाबगंज में भगवत सरन गंगवार के रूप में मजबूत कुर्मी चेहरा मैदान में है। इस तरह से देखा जाए तो पार्टी ने तीन मुस्लिम, दो वैश्य, एक मौर्य, एक एससी, एक कुर्मी और एक ब्राह्मण को टिकट देकर सभी वर्गों को साधने की कोशिश की है। पार्टी के रणनीतिकार इसे ही सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग कह रहे हैं और इसके दम पर सत्ता पाने का दावा भी कर रहे हैं।

