माया को घेरने की कोशिश

आर्टिकल/इंटरव्यूमाया को घेरने की कोशिश

Date:

अमित बिश्नोई

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल ही में रायबरेली के दो दिवसीय दौरे पर कहा कि अगर बसपा सुप्रीमो मायावती उनके साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़तीं तो उत्तर प्रदेश में भाजपा का सफाया हो जाता। राहुल ने एक तरह से बसपा सुप्रीमो पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि पता नहीं मायावती ने चुनाव लड़ने के प्रति उदासीन रवैया क्यों अपनाया है। हालांकि राहुल गांधी का भाषण सुनने वालों के मुताबिक यह सामान्य बात ही कही जाएगी, लेकिन राहुल गांधी का यह बयान देश और प्रदेश की राजनीति में तूफान आने का संकेत है। दरअसल, कांशीराम और मायावती को लेकर एक दलित युवक द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में राहुल गांधी ने कहा था कि बहन मायावती के सत्ता में आने पर दलितों की स्थिति बदल गई। राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव से पहले हमने उनसे भारत गठबंधन में शामिल होने को कहा था। अगर ऐसा होता तो हमारे लिए राह आसान हो सकती थी।

प्रदेश विधानसभा चुनाव से दो साल पहले शुरू हुई विपक्ष की यह सुगबुगाहट बताती है कि इस बार विपक्षी दलों ने सत्तारूढ़ भाजपा को घेरने के लिए अपनी चालें चलनी शुरू कर दी हैं। राहुल गांधी दो दिन रायबरेली में रहे। लखनऊ से सड़क मार्ग से वो रायबरेली गए, चुरुवा में हनुमान मंदिर में पूजा-अर्चना भी की। बछरावां में उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच बूथ मैनेजमेंट संभालने की नसीहत दी। पहली बार विपक्षी गठबंधन के किसी बड़े नेता ने यह खुलासा किया है। चुनाव लड़ने में बसपा की यह बेरुखी मायावती को भारी पड़ सकती है। उत्तर प्रदेश में अभी भी मायावती के पास दलित वोट बैंक है। हालांकि 2024 के चुनाव में अखिलेश यादव की सपा ने भाजपा से अयोध्या लोकसभा सीट छीन ली है, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि दलित वोट भी उनके साथ आ रहा है।

उत्तर प्रदेश में इंडिया ब्लॉक् ने भाजपा को पीछे धकेल दिया था। सपा लोकसभा में नंबर वन पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस को भी छह सीटें मिलीं, जबकि 2019 में उसे सिर्फ एक सीट पर सफलता मिली थी। अगर यूपी में चुनाव की बात करें तो अभी इसके लिए दो साल बाकी हैं। इधर, योगी आदित्यनाथ सरकार ने विधानसभा उपचुनाव में जीत का ढोल पीटकर इसकी तैयारी कर ली है। कुंभ की सफलता को भी भुनाने की तैयारी में है, हालांकि महाकुंभ का प्रबंधन कितना बेहतर रहा, इस पर सवाल है। घटनाओं की एक लंबी शृंखला है और उन घटनाओं को छिपाने की भी बात होती है, लेकिन आज के दौर में कुछ भी छिपाना बहुत मुश्किल है। इधर, राहुल गांधी का मायावती को चुनाव के प्रति उदासीन कहना इस बात का संकेत है कि गठबंधन न बनने की स्थिति में दलित मतदाता को अपनी अलग लाइन तय करनी चाहिए।

हालांकि, अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ मिलकर चुनाव लड़ा हो। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा और 2025 में सपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा। विधानसभा में सपा और बसपा ने 1993 का चुनाव मिलकर लड़ा था। तब उत्तर प्रदेश में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह की सरकार बनी थी। इसके बाद 1996 में बसपा और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। 1996 के विधानसभा चुनाव में मायावती को लगा कि कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ना उनके लिए फायदेमंद नहीं है। बड़ी पार्टियां छोटी पार्टियों का वोट बैंक छीन सकती हैं। इसके बाद मायावती ने कांग्रेस से दूरी बना ली। 2017 में विधानसभा में सपा और कांग्रेस ने फिर हाथ मिला लिया। तब बसपा को 19 सीटें मिलीं। सत्तारूढ़ सपा को सिर्फ 47 और कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिल पाईं। जबकि भाजपा के एनडीए गठबंधन को 312 सीटें मिलीं। 2022 के विधानसभा चुनाव में सभी विपक्षी दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भाजपा का परचम फिर लहराया लेकिन उसकी सीटें काफी कम हो गईं। उसे कुल 255 सीटों से संतोष करना पड़ा।

वहीं दूसरी ओर सपा को राष्ट्रीय लोकदल और कुछ अन्य राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने का फायदा मिला। उसे 111 सीटें मिलीं। कांग्रेस और बसपा ने सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा। दोनों को क्रमश: दो और एक सीट मिली। एक बात हमेशा सुनने को मिलती रही है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से निकलकर जाता है. इसीलिए उत्तर प्रदेश के संदर्भ में राहुल गांधी का यह विस्फोटक बयान तब आया जब वह अपने लोकसभा क्षेत्र रायबरेली के दो दिवसीय दौरे पर हैं। दरअसल उत्तर प्रदेश में भाजपा के खात्मे का खाका तैयार कर चुके अखिलेश यादव लखनऊ पर ही फोकस कर रहे हैं। उन्हें केंद्र में सरकार बनाने या प्रधानमंत्री बनने की कोई जल्दी नहीं है। उनका पूरा ध्यान उत्तर प्रदेश पर है।

बात सिर्फ राहुल तक ही नहीं रुकी, कांग्रेस नेता उदित राज ने भी बयान दिया कि मायावती ने दलितों का गला घोंटा है. इसलिए अब मायावती का गला घोंटने का वक्त आ गया है. इसके बाद अखिलेश यादव ने एक कार्यक्रम में कहा कि अगर 2024 में मायावती उनके साथ होतीं तो वो बीजेपी को जीरो पर कर देते. ये मायावती को हर तरफ से घेरने की कवायद है. अब बीएसपी कब तक बीजेपी से आमने-सामने की लड़ाई लड़ने से कतराती रहेगी! महज एक दशक पहले बीएसपी एक राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी. लेकिन आज उसकी हालत ये है कि उत्तर प्रदेश में भी उसकी मान्यता खतरे में है. लोकसभा में उसका कोई सदस्य नहीं है और विधानसभा में सिर्फ एक सदस्य है. इतनी बड़ी गिरावट से लगता है कि अगर बीएसपी ने अपनी रणनीति नहीं बदली तो आने वाले दिनों में वो गुजरे जमाने की पार्टी बन जाएगी.

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related