क्रिकेट के खेल को भद्रजनों का खेल कहा जाता है लेकिन कल शारजाह में पाकिस्तानी खिलाडी आसिफ अली ने जो हरकत की उसमें अभद्रता ही अभद्रता नज़र आ रही थी. माना कि मैच कभी कभी ऐसे क्षणों पर पहुँच जाता है कि भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ता है लेकिन उस ज्वार के बाद भी खुद को कंट्रोल करना ही भद्रता कहलाती है. मैच के क्षण चाहे जैसे भी हों, तनाव चाहे जितना भी हो आप किसी के साथ शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं दे सकते। क्रिकेट को चलाने वाली संस्था ICC के नियमों के मुताबिक यह बहुत बड़ा अपराध है।
बात कल पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के बीच हुए मैच को लेकर है जो अफ़ग़ानिस्तान के लिए करो या मरो जैसी स्थिति वाला था. 130 रनों के लक्ष्य की रक्षा करते हुए अफ़ग़ानिस्तान की टीम जीत के मुहाने पर पहुंच चुकी थी. घटना 18 वे ओवर के पांचवीं गेंद पर हुई थी. आसिफ ने इससे पहले वाली गेंद को 6 रनों के लिए भेजा था, मैच पल पल बदल रहा था, पाकिस्तान के आठ विकेट आउट हो चुके थे, छक्का खाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान के गेंदबाज़ ने अगली हो गेंद पर आसिफ को चलता कर अपना बदला चुकाया। आसिफ को आउट करने के बाद फरीद काफी उत्तेजित हो गए, हर उस तेज़ गेंदबाज़ की तरह जिसकी पिछली गेंद पर चौका या चक्का पड़े और अगली ही गेंद पर वह उसे आउट कर दे. ऐसी स्थिति में गेंदबाज़ का जोश में आना बनता है और उनका रिएक्शन भी ऐसा होता है जो बल्लेबाज़ को कभी पसंद नहीं आता लेकिन इसके बावजूद बल्लेबाज़ सर झुका कर पवेलियन चला जाता है, कभी कभी हलकी फुलकी गरमा गर्मी भी होती है मगर हाथापाई की नौबत आना बहुत कम होता है लेकिन कल के मैच नौबत यहाँ तक पहुंची। टीवी पर जो नज़ारा दिखा वह बड़ा अशोभनीय था, आसिफ अली को फरीद पर बल्ला तानते हुए देखा गया. दोनों टीमों के खिलाडी और अंपायर अगर फ़ौरन बीच बचाव में न आते तो बात बल्ला उठाने से भी आगे बढ़ सकती थी. मैं एकबार फिर कहता हूँ कि आप भले ही मुंह से कुछ भी बोलें मगर आप किसी के साथ शारीरिक तर्क (physical argument ) नहीं कर सकते।
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वैसे पाकिस्तानी खिलाडियों द्वारा इस तरह की कोई पहली घटना नहीं है, इस तरह की पहले भी बहुत सी घटनाएं हो चुकी हैं. आपको जावेद मियांदाद और डेनिस लिली की घटना शायद याद हो, उस विवाद की फोटो आज भी वायरल होती है और कल की घटना के बाद एकबार फिर वायरल हुई. 1981 के पर्थ टेस्ट में क्रिकेट को शर्मसार करने वाली यह घटना हुई थी जब मियांदाद ने किसी बात को लेकर पिच पर ही डेनिस लिली पर अपना बल्ला मारने के लिए ताना था. आपको भारत में खेले गए 1996 के विश्व कप की भी याद दिलाऊंगा जब बंगलोर में खेले गए क्वार्टरफाइनल में वेंकटेश प्रसाद के खिलाफ आमिर सोहैल ने किस तरह का भद्दा रिएक्शन दिया था और अगली ही गेंद पर वैंकटेश ने उन्हें आउट कर उन्हें उनकी औकात बता दी थी।
एक लम्बी फेहरिस्त है पाकिस्तानी क्रिकेटर्स की बद्तमीज़ियों की जब उन्होंने क्रिकेट के खेल को शर्मसार किया है. कल आसिफ अली ने फरीद पर बल्ला उठाकर पाकिस्तान के उसी सिलसिले को और आगे बढ़ाया है. ताज़ा जानकारी के मुताबिक मैच रेफरी ने दोनों ही खिलाडियों को तलब कर लिया है, क्या एक्शन लिया जाता है यह देखने की बात है, वैसे उम्मीद है कि एक दो मैच की पाबन्दी आसिफ अली पर लग सकती है. मेरे हिसाब से तो मैच रेफरी को दो मैचों की पाबन्दी लगाना चाहिए ताकि आसिफ के फाइनल खेलने पर भी पाबन्दी लगे, ऐसा करने से पाकिस्तान टीम पर भी कुछ असर पड़ेगा और वो आइंदा ऐसे खिलाडियों को मौका देने से पहले कई बार सोचने पर मज़बूर होगी. वहीँ ICC को मैदान पर मैच के दौरान इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से लेना चाहिए और इसके लिए सम्बंधित क्रिकेट बोर्ड को भी लताड़ लगाना चाहिए या फिर ICC रैंकिंग में कुछ अंक की कटौती करना चाहिए।
वहीँ अगर फरीद की बात की जाय तो जैसा कि मैं पहले ही कह चूका हूँ कि गेंदबाज़ का किसी को आउट करने के बाद जबकि वो उससे मार खा चूका हो जोश में आना बनता है। उससे किसी भी बल्लेबाज़ को भड़कने की ज़रुरत नहीं होती। फिर एक तेज़ गेंदबाज़ का attitude ही aggression वाला होता है। आज की क्रिकेट में यह आम बात है. फरीद के रिएक्शन पर मैच रेफरी अगर कोई कड़ी कार्रवाई करते हैं तो यह एक तरह से उनके साथ ज़्यादती होगी, हाँ अगर उन्होंने आसिफ को कोई गाली वाली दी हो तो बात अलग है मगर उसके लिए भी मैदान में अंपायर की गवाही बहुत ज़रूरी है. बहरहाल कल शारजाह में जो कुछ हुआ उससे आसिफ अली शर्मसार हुए या नहीं लेकिन क्रिकेट ज़रूर शर्मसार हुआ है, अंत में यही कहूंगा कि भद्रजनों के इस खेल को अभद्र लोगों से पाक साफ करना बहुत ज़रूरी है।
