अमित बिश्नोई
लगातार तीन बार से किसी एक सीट पर जीत के झंडे गाड़ने वाले का टिकट सिर्फ भाजपा ही काट सकती है, विशेषकर तब जब पार्टी का वफादार रहा हो, कभी कोई ऐसा बयान तक न दिया हो जो मोदी जी या अमित शाह की शान में गुस्ताखी हो. लेकिन मेरठ से राजेंद्र अग्रवाल का पत्ता काटकर भाजपा ने ये साबित कर दिया कि मोदी जी की महत्वाकांक्षाओं की योजनाओं में जो फिट है वही हिट है। अब क्या हुआ जो अग्रवाल हिट थे लेकिन शायद 400+के लक्ष्य में फिट नहीं बैठ रहे थे और यही वजह है कि तीन बार के सिटिंग MP को हटाकर राम मंदिर से बनी राम लहर को भुनाने के लिए टीवी वाले भगवान् राम अर्थात अरुण गोविल जी को मैदान में उतार दिया। मोदी जी का ये मास्टर स्ट्रोक है या फिर कुछ और ये तो बाद में पता चलेगा लेकिन फिलहाल नज़रें मेरठ के ज़रिये पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर हैं। मोदी जी को इस बार सिर्फ मेरठ ही नहीं चाहिए पूरा पश्चिम यूपी चाहिए (बिजनौर-बागपत साथी रालोद के पास है).
बकौल भाजपा इस समय यूपी ही नहीं पूरे देश में राम लहर चल रही है और यूपी में ये लहर नहीं आंधी है तभी तो इस बार सारी की सारी 80 सीटें चाहिए। 500 साल बाद अयोध्या में भगवान् राम को भाजपा ने घर दिलाया है ये बात अगर मोदी जी के अलावा जब टीवी वाले भगवान् राम जनता को जाकर बताएँगे तो प्रभाव कुछ और ही पड़ेगा, ये मैं मोदी जी और भाजपा की मानसिकता को देखकर इसलिए कह रहा हूँ कि भाजपा की एक परंपरा रही है रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक टीवी सीरियल के लोकप्रिय किरदारों को चुनाव में उतारकर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए। भाजपा ने राम जी (अरुण गोविल) को तो अब उतारा है, सीता माता (दीपिका चिखलिया) को तो 1991 में उतार दिया था और बड़ोदा से सांसद भी बना दिया था, सिर्फ सीता माता ही नहीं रावण (अरविन्द त्रिवेदी) को भी गुजरात की सांबरकांठा सीट से चुनाव लड़ाया था और उन्हें जीत भी मिली थी. इसके बाद 1996 में महाभारत वाले श्रीकृष्ण ( नितीश भारद्वाज) को जमशेदपुर से चुनावी मैदान में उतारा था और संसद पहुँचाया था. अब इसबार भगवान् राम की मदद ली जा रही है, मौका भी सही है एकदम सटीक है, भाजपा राम की मदद नहीं लेगी तो कौन लेगा। ये अलग बात है कि मेरठ वाले पूछ रहे हैं कि राजेंद्र अग्रवाल का कुसूर क्या है?
भाजपा ने राम रुपी अरुण गोविल को मेरठ में उतार तो दिया लेकिन देखना होगा कि क्या वो मेरठ की राजनीति में फिट बैठते हैं या नहीं। अरुण गोविल का मेरठ से नाता सिर्फ इतना ही है कि वो मेरठ में पैदा हुए और पढाई भी की, बाकी आगे जीवन उनका मुंबई में बीता, ये तो उम्र बढ़ने के बाद उनकी फ़िल्मी एक्टिविटी कम हो गयी तो वो कुछ सामाजिक आयोजनों में भी नज़र आने लगें। अगर टीवी वाले राम की इमेज को छोड़ दें तो अरुण गोविल को मेरठ से उम्मीदवार बनाने की और कोई वजह समझ में नहीं आती, विशेषकर तब जब उनके पास राजेंद्र अग्रवाल जैसा जिताऊ उम्मीदवार मौजूद है जिसने तब भी जीत हासिल की जब सपा-बसपा मिलकर लड़े. 2019 के चुनाव में जब मेरठ का चुनाव पूरी तरह दो हिस्सों में बंट गया था, मुस्लिम और दलित बाहुल्य इस सीट को तब अग्रवाल साहब ने भाजपा के लिए जीता और मीट कारोबारी हाजी याकूब कुरैशी के सपनों को चकनाचूर कर दिया। अग्रवाल साहब तो इनाम के हकदार थे लेकिन उनको ये सिला दिया गया!
पिछले चुनाव को छोड़ दें तो मेरठ में 2004 से त्रिकोणीय चुनाव हो रहे हैं और इसबार भी वैसा ही है। मैदान में भाजपा, बसपा और सपा (इंडिया गठबंधन) है. भाजपा को हमेशा वोटों के बंटवारे का फायदा मिलता है. 2009 में बसपा और सपा में वोटों का बंटवारा हुआ, नतीजा ये हुआ कि सिर्फ दो लाख से कुछ ज़्यादा वोट हासिल करके भाजपा के राजेंद्र अग्रवाल पहली बार सांसद बन गए. बसपा को एक लाख 84 हज़ार 999 वोट मिले थे, वहीँ सपा को 183527 वोट. इस बिखराव से भाजपा को फायदा हो गया. 2014 में भी वोट बंटा, बसपा के शाहिद एखलाक को तीन लाख से ज़्यादा और सपा के शाहिद मंज़ूर को दो लाख से ज़्यादा वोट मिला। मुस्लिम और दलित बाहुल्य वाले मेरठ में दोनों पार्टियों के वोटरों में आपसी लड़ाई और साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण का सीधा फायदा भाजपा को मिला और 2009 के मुकाबले भाजपा के वोट 15 प्रतिशत बढ़ गए और पांच लाख 32 हज़ार 981 वोट हासिल कर राजेंद्र अग्रवाल एकबार फिर कामयाब हुए. 2019 बात करें तो इसबार सपा और बसपा साथ आ गए मतलब साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण के बावजूद मुकाबला बराबरी का हो गया. 2014 के वोटों के हिसाब से इस बार विपक्ष यानि सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार के पास भी पांच लाख वोट हो गए और नतीजों में नज़र भी आया कि दोनों ही पक्षों को पांच लाख से ज़्यादा वोट मिले मगर तब भी लगभग पांच हज़ार वोट से राजेंद्र अग्रवाल ने जीत की हैटट्रिक लगा दी.
अब इतने कामयाब उम्मीदवार को हटाना भाजपा के लिए फायदे का सौदा होगा या फिर घाटे का ये तो आने वाल समय ही बताएगा। वोटरों के हिसाब से देखें तो मेरठ में सबसे ज़्यादा वोट मुस्लिम समुदाय के हैं और फिर दलित समुदाय के. यही वजह है कि मेरठ में मुस्लिम वोट मिलने के बाद बसपा का बड़ा वोट बैंक बन जाता है, इसी तरह मुस्लिम वोट सपा में जाने से सपा को भी दो लाख से ज़्यादा वोट मिल जाते हैं. यहीं कारण है कि 2019 में बुआ और बबुआ के मिलने से भाजपा को जीत हासिल करने में नाकों चने चबाना पड़े थे. सपा का इस बार कांग्रेस का साथ मिला है. पिछले चुनावों को देखें तो कांग्रेस का जनाधार यहाँ पर लगातार घटा है, फिर भी कहा जा सकता है कि 40-50 हज़ार वोट अब भी उसके पास है जो सपा के उम्मीदवार भानुप्रताप के कितना काम आएंगे, कहना मुश्किल है. भानुप्रताप जो पेशे से वकील हैं और जिन्होंने पिछले कई सालों से EVM के खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है, बाहरी व्यक्ति हैं, उनका ताल्लुक बुलंदशहर से है, हालाँकि उन्होंने पढाई मेरठ में ही की है, इस नाते आप उन्हें मेरठ का मान भी सकते हैं. एकबार विधानसभा का चुनाव लड़कर ज़मानत ज़ब्त करवा चुके हैं। सपा ने उन्हें मेरठ से उम्मीदवार क्यों बनाया ये मेरठ के सपाइयों को भी नहीं मालूम। तीसरे उम्मीदवार बसपा के देववृत त्यागी हैं, बसपा की सोशल इंजीनियरिंग में फिट बैठे तो उम्मीदवार बना दिए गए, बताया जाता है कि पहले पुलिस विभाग में थे, मगर नौकरी छोड़ दी, दवा के कारोबार में हैं। त्यागी को बसपा ने ब्राह्मण कार्ड के रूप फेंका है, मेरठ में दो लाख जाटव वोट के साथ एक लाख 18 हजार ब्राह्मण समुदाय के लोग भी हैं, इसमें कुछ मुसलमान वोट ऐड कर दिए जांय तो विनिंग कॉम्बिनेशन बन सकता है और भाजपा का राम कार्ड नाकाम हो सकता है. मेरठ में इस बार के चुनाव में सबसे ख़ास बात ये है मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के बावजूद यहाँ से कोई मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जो इस चुनाव को बेहद दिलचस्प बना रहा है. कम से कम इस बार पिछली बार की तरह सीधे तौर साम्प्रदायिकता के नाम पर तो वोट नहीं पड़ना चाहिए और शायद बसपा, सपा ने इसी रणनीति को ध्यान में रखकर प्रत्याशी घोषित किया है, जिसे एक अच्छी रणनीति कहा जा सकता है. देखना होगा कि मेरठ वासी क्या सोचते हैं, क्या वो टीवी वाले भगवान में असली राम को देखेंगे या फिर राजेंद्र अग्रवाल का चेहरा उनके सामने होगा जो सवाल पूछ रहा होगा कि मेरा कुसूर क्या है?
