Sunday, November 28, 2021
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पश्चिमी यूपी, प्रियंका और पंचायतें

नवेद शिकोह

naved shiko

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन की बढ़ती गहमागहमी में विपक्षी राजनीति की फसलें लहलहाने लगी हैं। अब कांग्रेस महासचिव प्रियंका वाड्रा गांधी ने भी पश्चिम की खड़ी बोले से अपने नर्म लहजे के सुर मिलाना शुरू कर दिए हैं। लोकदल और आम आदमी पार्टी की तरह किसानों, जाटों और आंदोलनकारियों से तालमेल बैठाने के लिए कांग्रेस की जद्दोजहद की सिपेहसालार प्रियंका किसान आंदोलन को हवा देकर कांग्रेस की जमीन तैयार करने में लग गईं है । वो जानती हैं कि पश्चिमी यूपी की सियासत निर्णायक होती है जो पूरे सूबे और यहां तक देशभर में भी अपना असर छोड़ती है। यही कारण है कि किसान महापंचायतों में शरीक होकर प्रियंका ना सिर्फ भाषणबाजी कर रही हैं बल्कि अपने अलग अंदाज से वो किसानों से गुफ्तगू कर रही हैं। खेतों और खलियानों में किसानों से मिलना, मंदिर जाना, पूजा-पाठ के संस्कारों को दर्शाती तिलकधारी प्रियंका कभी नाव की खेवनहार बनके तो कभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर होकर यूपी में डूबती कांग्रेस को बचाने की जद्दोजहद कर रही हैं। उनकी कोशिश है कि पश्चिम से कांग्रेस का सूर्य उदय हो और भाजपा का सूर्य अस्त हो।

संवाद स्थापित करने, सवाल पूछने और जवाब देने वाली वाक् कला की दक्ष प्रियंका किसानों से मुखातिब होकर उन्हें कृषि कानूनों के खतरों से आगाह कर रही हैं। उनकी सख्त बातें नर्म लहजे की सहजता से असर छोड़े या ना छोड़े पर यूपी में कांग्रेस की बंजर जमीन को वो किसान आंदोलन के जरिए हवा-पानी देने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

गौरतलब हैं कि तकरीबन सात-आठ बरस पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश मे ही किसानों की खाप पंचायतों .. महापंचायतों ने ही उत्तर में भाजपा की जमीन तैयार की थी और इसके एक-डेढ़ वर्ष बाद यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत से जीती थी। वो समय जाटों और मुसलमानों के बीच तल्खियों का था। आरोप लगाये जाते हैं कि यहां साम्प्रदायिक तनाव को भाजपा ने भुनाकर सियासी लाभ उठाकर चुनाव जीता था।

पांच-सात वर्षों में गोमती का पानी काफी बह गया। अब भाजपा सत्ता मे है और किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पैर जमा लिये है। भाजपा की इस मुसीबत को भुनाने के लिए विपक्षी दलों की पश्चिम में परेड शुरू हो गई है। प्रियंका वाड्रा गांधी से पूर्व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकदल और फिर आम आदमी पार्टी ने किसान पंचायतों में सक्रियता दिखाई। यूपी के इस संवेदनशील हिस्से की सियासी गहमागहमियों से अभी तक बहुजन समाजवादी पार्टी दूर है। लोकदल उपाध्याय जयंत चौधरी पश्चिम में अपना खोया जनाधार वापस लाने के लिए किसान पंचायतों में दहाड़ रहे है। पश्चिम ही लोकदल की जमीन रही है और किसान और जाट इस दल की आत्मा हैं। क्योंकि लोकदल समाजवादी पार्टी एलायंस का विश्वासनीय हिस्सा है इसलिए सपा ने लोकदल को पश्चिम की सियासी बिसात पर अकेले चाले चलने का मौका दिया है।

किसान आंदोलन को भुनाने में कोई भी दल चूकना नहीं चाहता।विधानसभा चुनावों से पहले का ये आखिरी मौका है। हर कोई फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है।

देश में लहलहाते भाजपा के जनाधार ने यूपी में विपक्षी दलों का सबसे बुरा हाल था। पिछले चुनावों में गठबंधनों का हर प्रयोग असफल साबित हो चुका था। सत्ता विरोधी हर मुद्दे धराशायी होते रहे और भाजपा का विजयी रथ आगे बढ़ता गया।

जनाधार मे सबसे ज्यादा सम्पन्न उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव सिर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों की नाराजगी का पानी सरकार के सिर के ऊपर तक पंहुच रहा है। विपक्ष की बंजर हो चुकी जमीन किसानों के आंसुओं से सीची जा रही है और इस तरह कमजोर कहे जाने वाली यूपी की विपक्षी सियासत का किसान आंदोलन ने हल चला दिया है और हल निकलने की आशा की किरण भी दिखा दी है।

भाजपा से किसानों की नाराज़गी का ऊंट किस करवट बैठेगा ये अभी तय नहीं पर भाजपा का सूरज पश्चिम से निकला था और अस्त भी यहीं से होगा। इस उम्मीद ने कमज़ोर विपक्ष में जान पैदा कर दी है। दस महीने बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तारीखें आ जानी हैं। यूपी भाजपा का सबसे मजबूत किला है इसे भेदना आसान नहीं है। कल तक विपक्षी दलों की बंजर सियासत में अवसर का हल गड़ना मुश्किल था पर आज किसानों के आंसुओं ने विपक्ष की बंजर जमीन को नर्म और उपजाऊ बना दिया है।

कृषि कानूनों से नाराज आंदोलनकारी किसानों की पंचायतों की भूमि विपक्ष की सियासत के लिए उपजाऊ बन रही है। अब एक वर्ष का अंतराल ही बताएगा कि किसानों के आंसुओं से नर्म पड़ी विपक्षी बंजर भूमि में विपक्ष सत्ता की फसल उगा पायेगा या ये भी मौका हाथ से निकल जाएगा !

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