- कंपनियां हमारी लाइक पाने की चाहत से कैसे कर रही है ट्रिलियन डॉलर का कारोबार
- हमें यह तो एहसार है कि हम फंस रहे हैं लेकिन कितना बड़ी भूमिका में है इसका अंदाजा नहीं
अमित बिश्नोई
सोशल मीडिया मौजूदा दौर में लगभग दुनिया के हर घर में प्रवेश कर चुका हैं. सभी एक दूसरे से बात करते हुए देखे जाते हैं कि देखो कितनी देर तक मोबाइल पर समय दे रहे हैं. वी द पीपल की जगह यदि कहे वी द डेटा हो गए ताे यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा. कहानी बिल्कुल साफ है कि सोशल मीडिया जो डाइलेमा खड़ा कर रहा है उससे हम आप अछूते नहीं है. इसको सही से यूज किया जाए तो यह बेहतर प्लेटफॉर्म भी है लेकिन गलत वे में यूज करें तो यह जानलेवा भी साबित हो जाता है. यदि आपको इसकी सही से जानकारी लेनी है तो आप नेटफिल्क्स पर आए डॉक्यू ड्रामा रिलीज द सोशल डाइलेमा देख लें. आपकी आंखें खुली की खुली रह जाएगी कि कैसे यह कंपनियां हमारा और परिवार में जो मोबाइल या लैपटॉप यूजर है उसका इस्तेमाल कर रही हैं. इसमें बताया गया है कि इन कंपनियों का उद् देश्य सिर्फ प्रॉफिट कमाना है. इनकी कल्पना में बहते-बहते हम कहां पहुंच गए हैं.
देशों की सीमाओं से नहीं बंधा सोशल मीडिया
यह किसी एक देश तक सीमित नहीं है. सोशल मीडिया की कंपनियों ने पूरे ब्रह्मांड में कब्जा करके रखा है. वो अपने हिसाब से हमें घुमा रही हैं. अगर यह कहे की कठपुतली हो गए हैं हम तो यह बात गलत नहीं होगी.
डॉक्यू ड्रामा क्यों देंखे?
आपके जेहन में होगा कि इसमें सोशल मीडिया की नाकामी दिखाई होगी. लेकिन हम आपको यह बताना चाहते हैं इसे इसलिए देखें क्योंकि इस डॉक्यू ड्रामा को 10 से 12 लोग जो फेसबुक, गूगल जैसी कंपनियों में काम कर चुके हैं ने बनाया है. उन्होंने अपने अनुभव से दर्शाया है कि सिलिकन वैली में जो डिजाइन किया गया वो कैसे हमारी नसों में जहर घोल रहा है. यह हमारे मन को पूरी तरह कंट्रोल कर रहा है.
अटेंसन इकनॉमी क्या होती है?
जब हमारे मन में किसी का कंट्रोल होता है तो उसे अटेंसन इकनॉमी कहा जाता हैं. कपंनियाें को विज्ञापन देना होता है तो ये सोशल मीडिया कंपनी यूजर्स लाकर देने का दावा करती हैं और दे भी देती हैं. इस ड्रामा में बताया गया है कि यूजर्स कैसे ज्यादा सोशल मीडिया पर समय बिताए. इसके लिए उन्हें इसका लती बनाया जाता है. शेयर करो, लाइक करो, नोटिफिकेशन खोलो, फोटो के साथ टैग करो जैसे कुछ टूल्स हैं जिनका यूज कंपनियां करती हैं. जिस तरह की चीजें आप देखते हैं कंपनियां ऐसे प्रोडक्ट आपके सामने ले आती हैं. इसके लिए सर्विलांस कैपिटलिज्म का यूज होता है.
सर्विलांस कैपिटलिज्म चलता कैसे है?
आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस या मशीन लर्निंग का काम ये नहीं है कि इंसानों के व्यवहार का काम जानकर मुकाम तक पहुंचे. मुकाम तय करने के बाद इंसान को वहां पहुंचाया जाता है. हमें हमारे मानसिक व्यवहार का पता नहीं चलता और ये टूल हमसे ले लिया जाता है. हम कहीं भी जाते हैं तो खुश होने जाते हैं. कोई हमारी चीजों को लाइक करता है तो हमें अच्छा लगता है.
अमेरिका में देखें क्या है स्थिति?
2010-11 के बाद से खुद को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं बढ़ीं
– 15 से 19 साल के बच्चे- 62 परसेंट
– 10 से 14 साल के बच्चे- 189 परसेंट
2010-11 के बाद सुसाइड केस बढ़े
– 15 से 19 साल के बच्चे-70 परसेंट
– 10 से 14 साल के बच्चे- 151 परसेंट
सोशल मीडिया कंपनियों की ताकत
– 2019-20 में रेवेन्यू- 773 बिलियन डॉलर
सबसे बड़ी कंपनियों का मार्केट कैप- 8.6 ट्रिलियन डॉलर
– हाथ में कैश- 420 बिलियन डॉलर

