मैनपुरी के मैदान में साख बचाने और तबाह करने का खेल

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अमित बिश्नोई
मैनपुरी में कांग्रेस और बसपा की किनाराकशी के बाद मुकाबला अब सीधा समाजवादी पार्टी और भाजपा में हो गया है. मैनपुरी जहाँ से सपा संस्थापक मुलायम सिंह हमेशा से जीतते रहे हैं, आज उनकी विरासत को संभालने के लिए उनकी बड़ी बहू डिंपल यादव सामने आयी हैं. भाजपा से सामने कौन है इससे ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि मैनपुरी से ससुर की विरासत को आगे बढ़ाने का बहू को मौका मिलेगा या नहीं, सवाल इसका है और इसी बात से फ़र्क़ भी पड़ने वाला है. वैसे तो भाजपा ने यहाँ से सांसद रघुराज शाक्य के रूप अपना जो उम्मीदवार मैदान में उतारा है उससे मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है. यह दिलचस्पी सपा को कितनी भारी पड़ सकती है यह आने वाला समय ही बताएगा।

मैनपुरी भले ही सपा का गढ़ रहा हो लेकिन भाजपा की शातिर चलें बड़े बड़े गढ़ को ध्वस्त करती रही हैं, रामपुर का गढ़ इसकी ताज़ा मिसाल है जहाँ की लोकसभा सीट पर आज भाजपा का कब्ज़ा है. मैनपुरी में सपा का कब्ज़ा बरकरार रहेगा इसकी कोई गारंटी नहीं, हालाँकि लगता नहीं कि रामपुर जैसा हाल मैनपुरी का होगा। फिर भी सपा मुखिया अखिलेश यादव परेशान ज़रूर है. मैनपुरी में डिंपल यादव की नहीं बल्कि अखिलेश यादव बल्कि यूँ कहिये कि पूरी समाजवादी पार्टी की राजनीतिक साख दांव पर लगी हुई है. मैनपुरी में मुकाबला साख को बचाने और उसे तबाह करने के बीच है.

सपा ने इस साख को बचाने के लिए जहाँ परिवार का सहारा लिया है वहीँ इस साख को तबाह करने के लिए भाजपा ने मुलायम सिंह के करीबी को ही आगे किया है. भाजपा का रघुराज शाक्य को यहाँ से उतारना एक चाणक्य नीति ही है, शाक्य को अपने अपमान का बदला लेना है जो पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान अखिलेश यादव से उन्हें मिला था, शाक्य को टिकट देने से अखिलेश ने साफ़ इंकार कर दिया था, यहाँ तक कि शिवपाल यादव ने भी उनके नाम की सिफारिश की थी, इसके बाद रघुराज शाक्य ने भाजपा का दामन थाम लिया था वो भी बिना शर्त। भाजपा ने भी उन्हें टिकट नहीं दिया था लेकिन इसका उन्हें कोई शिकवा नहीं था. आज एक सही मौका भाजपा और शाक्य दोनों को मिला है. दुश्मन का दुश्मन दोस्त के रूप में भाजपा को मिला और भाजपा ने सही मौके पर उसका इस्तेमाल किया।

अब यहाँ पर अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव की भूमिका बहुत अहम् हो जाती है. शिवपाल यादव मैनपुरी लोकसभा के अंतर्गत आने वाली सीट जसवंत नगर से सपा के विधायक हैं. अब देखना है कि इस उपचुनाव में भतीजे से उनकी नाराज़गी कोई गुल खिलाती है या फिर भाई और परिवार का प्यार अभी भी बरक़रार रहेगा. शिवपाल भले ही अकेले विधायक हैं लेकिन उनकी हैसियत अकेली नहीं है, कम से कम मैनपुरी में तो बिलकुल नहीं, वो खेल बनाने की हैसियत भले ही न रखते हों लेकिन बिगाड़ने की उनकी हैसियत ज़रूर है. सवाल यही है कि वह सपा की साख को बरकरार रखने में सहयोग देंगे या फिर पिछले कुछ सालों से भतीजे द्वारा कई बार अपमानित होने का बदला लेंगे। भाजपा की नज़रें इसी पर लगी होंगी, रघुराज शाक्य को उम्मीदवार बनाने की एक वजह शायद यही होगी क्योंकि मुलायम की तरह शिवपाल से भी उनके बहुत करीबी सम्बन्ध थे और अभी हैं. भाजपा चाहेगी कि इन सबंधों का उसे फायदा मिले। भाजपा को यह अच्छी तरह मालूम है कि अगर उसे अपने मकसद में कामयाबी हासिल हो गयी तो समझिये उसने सपा की कमर तोड़ने में कामयाबी हासिल कर ली।

सपा मुखिया अखिलेश को भी इन सब बातों का एहसास है, अखिलेश इस चुनाव को एक उपचुनाव की तरह नहीं देख रहे हैं, उन्हें भी मालूम है कि यह सिर्फ एक सीट नहीं पार्टी का वजूद है. इस सीट से उनका भावनात्मक रिश्ता होने के साथ साथ उनके राजनीतिक भविष्य का भी रिश्ता है. यहाँ पर जीत मिलने पर भले ही उनको कोई राजनीत फायदा न हो लेकिन कुछ भी गलत होने पर उनका राजनीतिक भविष्य अंधकारमय ज़रूर हो सकता है. तो यह उनके लिए वर्तमान से ज़्यादा भविष्य की लड़ाई भी है. मैनपुरी में जिस तरह वो चुनाव प्रचार में लगे हैं, जिस शिद्दत के साथ वो मैनपुरी की सड़कों पर हैं वह सिर्फ अपनी पत्नी के लिए नहीं बल्कि पार्टी के मनोबल को गिराने से बचाने के लिए हैं. अब देखना है कि साख को बचाने और तबाह करने के खेल में बाज़ी किसके हाथ लगती है?

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