तलाकनामा

समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने सुभासपा यानि ओ पी राजभर और प्रस्पा यानि शिवपाल यादव को तलाक़ दे दी है और उन्हें अपने बंधन से आज़ाद कर दिया है। 
 
Talaqnama
Illustration By Hasan Zaidi

अमित बिश्‍नोई

1982 में बी आर चोपड़ा की एक फिल्म आयी थी "निकाह" जिसका पहले नाम था "तलाक़ तलाक़ तलाक़". चूँकि तलाक़ शब्द काफ़ी बुरा माना जाता है इसलिए उन्होंने फिल्म का नाम इसके उलट रख दिया, लेकिन राजनीति में ऐसा कुछ भी नहीं, यहाँ कोई शब्द बुरा नहीं माना जाता फिर वह चाहे तलाक़ ही क्यों न हो. बल्कि राजनीति में तो ऐसे शब्दों की वैल्यू कुछ ज़्यादा ही होती है, ऐसे शब्दों का वेटेज काफी होता है, यूपी की सियासत में भी इन दिनों तलाक़ शब्द काफी चर्चा में है, मामला समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगी दलों से जुड़ा हुआ है जिनके बीच ताज़ा ताज़ा तलाक़ हुई है, अब तलाक़ किसने दी, या तलाक़ किसने ली यह बहस का विषय हो सकता है लेकिन फिलहाल जो तथ्य सामने हैं उनसे यह साफ़ है कि समाजवादी पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने सुभासपा यानि ओ पी राजभर और प्रस्पा यानि शिवपाल यादव को तलाक़ दे दी है और उन्हें अपने बंधन से आज़ाद कर दिया है। 

शिवपाल यादव ने अपने तलाकनामे में लिखा है कि आपको जहाँ ज़्यादा सम्मान मिले आप वहां जाने के लिए आज़ाद हैं. इस तलाकनामे का ओ पी राजभर और शिवपाल यादव दोनों ने दिल खोलकर स्वागत किया। सम्मान की बात से याद आया कि अखिलेश यादव ने जबसे सपा का नेतृत्व संभाला है सम्मान वहां से गायब हो चूका है, उनके पिता जी के ज़माने में ज़रूर सपा में सम्मान का महत्त्व हुआ करता था लेकिन पुत्र मोह वश अखिलेश को मुख्यमंत्री का ताज सौंपने वाले नेता जी मुलायम सिंह यादव से ही सपा में सम्मान की जगह अपमान का सिलसिला शुरू था. अखिलेश ने अपने पितश्री से पार्टी को पूरी तरह छीन लिया और उन्हें सिर्फ मार्गदर्शन करने के लिए संरक्षित कर दिया जिसका समय समय पर ज़रुरत पड़ने पर अखिलेश द्वारा उपयोग होता रहा। 

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सम्मान की जगह अपमान का यह सिलसिला आगे बढ़ता रहा, अगला शिकार चाचा शिवपाल यादव बने, शिवपाल यादव वहीँ हैं जिन्होंने समाजवादी पार्टी को आर्थिक रूप से और जनाधार के रूप में इतना मज़बूत किया कि वह किसी भी राष्ट्रीय दल से टक्कर ले सके, ये शिवपाल यादव वहीँ हैं जिन्होंने टीपू को अखिलेश बनने में बड़ी मदद की, ये वही शिवपाल यादव हैं जिन्होंने अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने पर भी कभी खुलकर ऐतराज़ नहीं किया और इन्हीं शिवपाल का अखिलेश ने लगातार अपमान किया, शिवपाल इस अपमान को लगातार सहते रहे मगर अखिलेश द्वारा शिवपाल के अपमान का सिलसिला नहीं थमा. मजबूरन शिवपाल को अलग पार्टी बनानी पड़ी मगर तब भी वो मुलायम सिंह को ही अपना नेता मानते रहे. हद तो तब हो गयी जब पिछले विधानसभा चुनावों में हो रहे गठबंधन के दौर के बीच अखिलेश ने बार बार कहा कि उनका उचित सम्मान होगा और यह उचित सम्मान यह था कि सपा प्रमुख ने प्रस्पा प्रमुख और अपने चाचा शिवपाल को मात्र एक सीट के काबिल समझा और वो भी उनके चुनाव चिन्ह पर नहीं बल्कि साइकिल के चुनाव निशान पर. अखिलेश ने इस तरह जता दिया कि उनके दौर में सम्मान की क्या परिभाषा है, शायद इसीलिए ही उन्होंने कहा कि जिसको जहाँ ज़्यादा सम्मान मिले वो वहां जा सकता है, यहाँ तो सिर्फ इतना ही मिलेगा।

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दरअसल इस तलाकनामे की नीव तो विधानसभा चुनाव से पहले ही पड़ चुकी थी, जो चुनावी नतीजों के बाद और गहरी हो गयी. चुनाव प्रचार के अंतिम चरणों में अखिलेश यादव की बोली और भाषा दोनों ही बदल चुकी थी,हो सकता है उन्हें अपनी हार का एहसास हो गया हो और कुंठा में उनका व्यवहार घमंडी हो गया हो, या फिर जीत के प्रति अतिआत्मविश्वास ने उन्हें और घमंडी बना दिया हो, वैसे घमंडी तो वो हमेशा से थे, ये बात उनके करीबी भी कहते हैं.  बात अगर ओ पी राजभर की करें तो वो एक मुंहफट राजनेता हैं. जो मन में आता है खुलकर बोल देते हैं. सुभासपा प्रमुख ने हमेशा अखिलेश को आईना दिखाया है, उन्हें वह बताने और दिखाने की कोशिश की है जिसे देखने और जानने में उनकी ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रहती। सुभासपा प्रमुख ने क्या गलत कहा कि अखिलेश कमरे में बैठकर ट्विटर से सियासत करना चाहते हैं. अखिलेश ने जबसे पार्टी संभाली है सपा ने एक भी चुनाव नहीं जीती है, राजभर की यह बात कड़वी भले ही है लेकिन सौ फ़ीसदी सच है. राजभर की गलती बस यह है कि उन्होंने उस शख्स से वफ़ा की उम्मीद लगाईं जो नहीं जानता वफ़ा क्या है. जो इंसान अपने पिता का नहीं हुआ, अपने चाचा का नहीं हुआ वो किसी और का कैसे हो सकता है।