खेल दिवस पर विशेष

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खेल दिवस पर विशेष

भविष्य के ‘अर्जुन’ बेच रहे सब्जी, ‘द्रोणाचार्य’ चला रहे टैक्सी

कोरोना का चर्कव्यूह भेदने में दोनों ही रहे नाकाम

खिलाडिय़ों और प्रशिक्षकों का हाल देखकर ओलम्पिक में पदक लाना लगता है बेइमानी

अमित बिश्‍नोई

कानपुर। कल खेल दिवस है लेकिन शायद ही ऐसा पहली बार होगा कि इस दिन को लेकर खेल जगत में कोई भी उत्साह नहीं है। कोरोना महामारी का चाबुक इस क्षेत्र पर ऐसा चला जिससे वह आज तक उबर नहीं पाया है। एक ओर जहां खेलों की शुरुआत नहीं हो पायी है तो वहीं खेल से अपनी रोजी-रोटी चलाने वाले तंगहाली में जीवन-यापन कर रहे हैं। कई राष्ट्रीय खिलाड़ी व प्रशिक्षक पिछले कई महीनों से वेतन न मिलने के कारण ऐसा काम करने पर विवश हैं जो खेल दिवस पर इनकी दूदर्शा को बयां करता है। जो भविष्य में अर्जुन व द्रोणाचार्य पुरस्कार हासिल करने का माद्दा रखते हैं वह इस समय सब्जी, चाट-पकौड़ी बेच रहे हैं तो कोई कपड़े की दुकान व टैक्सी चला रहा है। इन लोगों की सुद लेने वाला भी कोई नहीं। ऐसे में इन खिलाडिय़ों के लिये खेल दिवस एक उपहास है क्योंकि उन्होंने कभी भी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस क्षेत्र में वह अपने सपने साकार करेंगे वही उनके लिये दु:स्वप्न साबित होगा। 

कोरोना के चर्कव्यूह ने पिछले कई महीनों से खेल जगत को ऐसा घेरा हुआ है जिससे न तो इसके खिलाड़ी और न ही उनमें महारत हासिल करने वाले प्रशिक्षक भेद पा रहे हैं। खेलों का महाकुंभ कहे जाने वाले ओलम्पिक खेलों में भारत की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। इन खेलों में एकमात्र हाकी खेल ही ऐसा है जिसने सबसे अधिक पदक जीते। इन्हीं के पुरोधा कहे जाने वाले मेजर ध्यान चंद्र जिन्हें हाकी का जादूगर भी कहा जाता है, के जन्मदिन पर ही देश में २९ अगस्त को खेल दिवस मनाया जाता है। हालांकि ‘दद्दा’ खुद आज तक भारत रत्न पुरस्कार पाने के लिये तरस रहे हैं। सरकार ओलम्पिक में पदकों की झड़ी लगाने की बात तो करती है लेकिन जमीनी स्तर पर खिलाडिय़ों की जो दूर्दशा है उसे देखकर यही लगता है कि जो दो-तीन पदक खिलाड़ी जीतते है वही काफी है। प्राइमरी स्कूली स्तर से लेकर स्टेडियम तक खिलाडिय़ों को अंशकालिक के रूप में रखना ही देश में खेल की स्थिति को बयां करती है। इन्हीं के चलते आज खिलाडिय़ों को दो वक्तकी रोटी के लिये मोहताज होना पड़ रहा है। शहर में सैकड़ों खिलाड़ी पिछले कई महीनों से पैसों के लिये तरस रहे हैं। उनका नवीनीकरण तो दूर पिछला बकाया वेतन तक नहीं दिया गया है। जो खिलाड़ी स्कूलों में प्रशिक्षण देते थे उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया है। वह  किसी से अपनी स्थिति बयां तक नहीं कर पा रहे क्योंकि पूरी जिन्दगी उन्होंने खेलों को दे दिया अब वह क्या काम करें उन्हें खुद कुछ समझ नहीं आ रहा। 

शहर में यह स्थिति सभी खेलों के साथ जुड़ी हुई है। खेलों में अंपायर, स्कोरर हो या कोच जिनकी रोजी-रोटी केवल इन्हीं से चलती थी वह इस समय पैसों के लिये तरस रहे हैं। सरकार हो या स्कूल कोई भी इनकी मदद को आगे नहीं आ रहा। ग्रीनपार्क स्टेडियम में १३ अंशकालिक प्रशिक्षकों को खेल प्रोत्साहन समिति से एक बार आर्थिक मदद जरूर दी गयी लेकिन उसके बाद विभाग ने भी चुप्पी साध ली। नगर निगम के जो आउट सोर्सिंग से कोच रखे गये हैं वह सभी मार्च माह से वेतन का इंतजार कर रहे हैं। स्कूलों में खेल प्रशिक्षकों के हाल तो सबसे बुरे हैं। लगभग सभी को नौकरी से निकाल दिया गया है जो कुछ बचे भी हैं उन्हें भी आधी से कम सैलरी दी जा रही। खेल संघों से जुड़े अंपायर, स्कोरर, रैफरी, आफीशियल, टेक्नीशियन आदि की सुध लेने के लिये कोई भी संघ का पदाधिकारी आगे नहीं आया। सभी ने इन सभी को उनके बुरे हाल पर ऐसे ही छोड़ दिया है।

शहर में खिलाडिय़ों की स्थिति पर एक नजर

१- शिवलाल यादव: खो-खो का यह राष्ट्रीय खिलाड़ी इस समय टैक्सी चला रहा है क्योंकि मैदान में ट्रेनिंग बंद है और जिन दो स्कूलों में क्लास देने जाता था वहां से भी निकाल दिया गया है।

२- सौरभ चतुर्वेदी: बीसीसीआई के वरिष्ठ स्कोरर को बोर्ड ने यह कहकर हटा दिया कि वह ६० साल के हो गये जबकि उन्हें एक पैसे का भी गुजारा भत्ता नहीं दिया। जबकि बोर्ड में कार्यकारणी के लिये ७० वर्ष की उम्र सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित लोढ़ा समिति द्वारा निर्धारित है।

३- हसीन अहमद: प्रदेश की अंडर-१९ व २२ का यह खिलाड़ी नगर निगम के पालिका स्टेडियम में प्रशिक्षण देता है लेकिन मार्च माह से विभाग ने कोई पैसा नहीं दिया लिहाजा कपड़े की दुकान में काम करने को मजबूर है।

४- डेरिक : फुटबाल का राष्ट्रीय खिलाड़ी इस समय लोगों को घर में व्यायाम  कराने जा रहा क्योंकि स्कूल ने निकाल दिया और मैदान में अभ्यास करा नहीं सकते।

५- राजेंद्र वर्मा: ग्रीनपार्क के हाकी कोच इस समय प्रदेश सरकार की नीतियों के खिलाफ ओन्दोलन छेड़ चुके हैंक्योंकि इन्होंने अपने सभी साथियों को उनका हक  दिलाने के लिये अपनी जमा-पूंजी की भी चिन्ता नहीं की। 

६- संजय दीक्षित: शहर की नामी क्रिकेटर्स एकेडमी के प्रशिक्षक कोचिंग बंद होने से तो परेशान थे ही साथ ही जिस स्कूल में ट्रेनिंग देते थे वहां से भी वेतन बंद हो चुका है।

७- मुरली: खो-खो का राज्य स्तर का खिलाड़ी हरसहाय में प्रशिक्षण देकर कुछ पैसे कमा लेता था लेकिन वह भी बंद होने के चलते अब सब्जी का ढेला लगाने पर मजबूर है।

८- शुभम गौड़ : रतनलाल शर्मा स्टेडियम में बैडमिंटन कोच को विभाग ने जनवरी से वेतन ही नहीं दिया। कई बार आलाधिकारियों से फरियाद की लेकिन नतीजा आज तक नहीं निकला।

९- संजय बरतिया : क्रिकेट मैचों की स्कोरिंग कर अपना जीवन-यापन कर रहे थे लेकिन खेल बन्द हो जाने के बाद अब एक-एक पैसों के लिये मोहताज है। 

१०- राजेंद्र गौड़ : तीरंदाजी संघ के अध्यक्ष कई स्कूलों में जुड़े थे लेकिन सब जगह से वेतन बंद है। यहां तक कि संघ के २८ लोग जो स्कूल से जुड़े थे वह सब भी घर में बैठे है। किसी को एक पैसे की भी आर्थिक मदद नहीं मिलती देख राजेंद्र लोगों से मांगकर अपने साथियों की मदद कर रहे हैं।

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