ज़ीनत सिद्दीकी

यूपी में चुनावी मौसम शुरू हो चूका है, सियासत और सत्ता के गलियारों में हलचलें तेज हो गई हैं, प्रदेश में जहाँ सत्तारूढ़ दल थोड़ा संकट में दिखाई दे रहा है तो वहीँ पंचायत चुनाव में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज कराने के बाद सपा में जोश हिलोरें मार रहा है, आभासी दुनिया को लोकप्रियता का अगर पैमाना मानें तो फिलहाल फेसबुक पर इस हफ्ते अखिलेश यादव, मोदी और योगी से ज़्यादा पॉपुलर दिखाई दे रहे हैं इसलिए कहा जा सकता है कि सियासी हवा का रुख फिलहाल तो यही बता रहा है कि साइकिल की रफ़्तार को हवा का यह रुख और तेज़ कर रहा है और वर्तमान दौर की राजनीति का पहला उसूल है कि जिधर हवा बहे उधर बहते चलो. ऐसा ही कुछ आजकल समाजवादी पार्टी में भी हो रहा है. बहती हवाओं के साथ सत्ता की सुगंध सूंघते मौसमी सौदागरों की 19 विक्रमादित्य मार्ग में आमदो रफ़्त काफी बढ़ गयी है.
कहने का मतलब यह है कि हर बार की तरह चुनावी मौसम आते ही राजनैतिक विचाधाराओं को तिलांजलि देने का दौर शुरू या कहिये कि खेल शुरू हो गया है, यहाँ हम इसपर बात नहीं करेंगे कि कौन कहाँ जा रहा है. यहाँ पर हम बात करेंगे कि आखिर इस पंच वर्षीय राजनीति का कोई अंत होगा, इसका अंत करने के लिए किसी को तो शुरुआत करनी ही होगी, क्योंकि यह समस्या धीरे धीरे राजनीति के लिए कैंसर का रूप लेती जा रही है.
दुनिया के हर देश में विचारधाराओं की ही राजनीति होती है, वोटर भी ज़्यादातर विचारधाराओं से ही जुड़े होते हैं, सियासी पार्टियां भी अपनी विचारधारा पर काम करती हैं, वह अपनी उसी विचारधारा को लेकर आगे बढ़ती हैं, धीरे-धीरे उसी विचारधारा के लोग पार्टी में जुड़ते चले जाते हैं और पार्टी भी अपने कार्यकर्ताओं के विश्वास के बल पर आगे बढ़ती है. पार्टी को यह लोग किसी पंचवर्षीय पैकेज के तौर पर नहीं चुनते हैं कि जहां पैकेज ज्यादा मिलेगा वहां कार्य करेंगे, वह दिल से जुड़ते हैं क्योंकि वह अपनी विचारधारा को उस पार्टी से रिलेट करते हैं। हर राजनीतिक पार्टी का अपना एक सिद्धांत होता है. पूंजीवादी, समाजवादी, सांप्रदायिक, सेकुलर, दक्षिणपंथी, वामपंथी। यह सभी विचारधाराएं एक दूसरे के विपरीत हैं. आप की मान्यता अगर समाजवाद में है तो आप पूंजीवाद की तरफ कैसे जा सकते हैं? सेक्युलर विचारधारा को मानने वाला दक्षिणपंथी कैसे बन सकता है? आप अपनी पार्टी से, पार्टी के नेता से नाराज़ हैं तो इसका मतलब यह तो नहीं कि विपरीत विचारधारा को अपना लें. आप समान विचारधारा के किसी और दल के साथ जा सकते हैं, सामर्थ्य है तो अपनी नयी पार्टी भी खड़ी कर सकते हैं मगर विपरीत सिद्धातों के साथ कैसे जा सकते हैं? इसके बावजूद अगर आप विपरीत सिद्धांतों के साथ जा रहे हैं तो आप सिद्धांतहीन हैं और सिद्धांतहीन व्यक्ति किसी का क्या मार्गदर्शन करेगा?
जनता जनार्दन को यह बात समझनी होगी कि आज राजनीति को लोगों ने पंचवर्षीय योजना की तरह अपना लिया है, राजनीति में आने का एकमात्र उद्देश्य पद लोलुपता, सत्ता सुख हासिल करना भर रह गया है, कोई भी नेता बिना पद और सत्ता के नहीं रहना चाहता। उसे जिस पार्टी में सत्ता सुख मिलता नज़र आता है उधर ही उड़ जाता है. लोगों में आत्मसम्मान, शर्म, नैतिकता मर चुकी है. यह बेशर्म लोग आलोचनाओं के बाद भी गूंगे बहरे बनकर अपने काम में लगे रहते हैं. एक कांग्रेसी जब भाजपा में या एक भाजपाई जब समाजवादी पार्टी में शामिल होता है तो उसे ज़रा भी ग्लानि नहीं होती। उससे ज़्यादा बेशर्मी तो पार्टी के उन प्रमुखों की होती है जो ऐसे लोगों का पार्टी में ज़ोरदार ढंग से स्वागत करते हैं. उन्हें इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं होता कि विचारधाराओं की तिलांजलि देने वाले यह अवसरवादी पार्टी के लिए बरसों से खून पसीना बहाने वाले किसी कार्यकर्ता का अवसर काट रहे हैं, क्षणिक लाभ के लिए जब आप किसी अपने का अवसर किसी बाहरी बहरूपिये को सौंपते हैं तो उस बेचारे पर क्या गुज़रती है, इसे शायद ऊपर बैठे लोग नहीं समझ पाते या जानकार भी अनजान बने रहते हैं. यह सब वह घाव होते हैं जो पार्टियां अपने कर्मठ कार्यकर्ताओं को जाने अनजाने देती रहती हैं जो धीरे-धीरे नासूर बन जाते हैं.
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस इस बात का सबसे बेहतरीन उदाहरण है, सत्ता प्राप्ति के लिए तोड़फोड़ का जो खेल उसने दशकों पहले शुरू किया यह उसी का नतीजा है कि आज पार्टी गर्त में डूबती जा रही है. आज देश में अगर कोई राजनीतिक पार्टी है जिसके विधायकों, सांसदों को आसानी से तोड़ा जा सके तो सिर्फ कांग्रेस का नाम ही सामने आएगा। अवसरवादिता की ताज़ा मिसाल पश्चिम बंगाल है, अल्पकालीन और सामयिक लाभ उठाने के लिए बंगाल में भाजपा ने क्या क्या नहीं किया और नतीजा सबके सामने है, पार्टी में भगदड़ मची है, गली गली मुनादी करके अवसरवादी और पंचवर्षीय योजना वाले नेता भाजपा का त्याग कर दीदी-ओ दीदी की गुहार लगा रहे हैं.
इसीलिए देश की इन सबसे पुरानी पार्टियों की गलतियों से सीख लेते हुए समाजवादी पार्टी को ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है क्योंकि जो अपने दल, अपनी विचारधारा के नहीं हुए वह आपके और आपकी विचारधारा के क्या होंगे। अखिलेश को समझना होगा कि इन पंचवर्षीय योजना वाले सौदागरों की जगह पार्टी के कर्मठ नेता और कार्यकर्ता कहीं ज़्यादा फायदेमंद होंगे जो दिल से दल को ऊपर उठाने में आपके कंधे से कन्धा मिलाएंगे।

