साॅरी रमन, क्योंकि तुम किसान नहीं थे…

 
साॅरी रमन, क्योंकि तुम किसान नहीं थे… साॅरी रमन, क्योंकि तुम किसान नहीं थे…
  • लखीमपुर खीरी हिंसा में टीवी पत्रकार रमन कश्यप की हुई थी मौत
  • किसानों को राहत, दिवंगत पत्रकार की नहीं उठा रहा कोई आवाज

सुनील शर्मा

साॅरी रमन, तुम्हें शहीद कोई नहीं कहेगा, क्योंकि तुम किसान नहीं सिर्फ एक पत्रकार थे। वहां जाना और भीड़ के बीच अपनी जान को दांव पर लगाकर घटना कवर करना तुम्हारा फर्ज था। अब तुमने दुस्सहास दिखाया तो इसमें तुम्हारी ही तो गलती है न। अरे भाई, तुम कोई कोई किसान थोड़े ही न थे जो भले की किसी चलती गाड़ी की राह रोकते हुए उसकी चपेट में आ जाने पर भी शहीद कहलायें। सरकार भी उन्हीं के परिवार को समझाने के लिये अपने आला अधिकारी मौके पर भेज दे। मुआवजा दे, सरकारी नौकरी दे, तमाम आला अधिकारी उनके घर पर पहुंच कर गुहार लगायें, उच्चस्तीय जांच करायी जाये, दोबारा से पोस्टमार्टम कराया जाये, देश भर के किसान संगठन, राजनीतिक दल मृत किसानों के गम में शरीक होकर उन्हें न्याय दिलाने के लिये झंडा बुलंद कर दें, अरे भई यह तो सिर्फ किसानों के लिये ही हो सकता है किसी पत्रकार के लिये थोड़े ही न। अरे एक पत्रकार जायेगा तो दूसरा आ जायेगा, मगर किसान तो वोट बैंक हैं न, सभी नेताओं की पहली पसंद, अब वोट बैंक के आगे किसी पत्रकार की भला क्या बिसात। अरे रमन, अपनी जान दांव पर लगाने से पहले क्यों नहीं समझ पाये कि तुम सिर्फ एक पत्रकार हो…

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देखो न रमन, जिन किसानों की आवाज बनकर तुम वहां पहुंचे थे उन्हीं किसानों के किसी भी संगठन ने तुम्हारे बलिदान को याद किया क्या? किसानों को शहीद का दर्जा देने वाले सभी राजनीतिक दलों में से किसी के भी नेता ने क्या तुम्हारी शहादत को नमन किया? क्या किसी नेता ने किसानों के अलावा तुम्हारे परिवार से भी मिलने की इच्छा जताई? क्या किसी ने कहा कि दिवंगत पत्रकार भी आंदोलन में शहीद हुआ है उसे सम्मान दो, उसके परिवार को सहारा दो, उसे शहीद का दर्जा दो।

अरे भाई, औरों की तो बात जाने दो क्या किसानों, नेताओं की आवाज उठाने वाले तुम्हारे अपने मीडिया ने ही तुम्हारी आवाज उठाई। किसी घटना को कवर करते हुए एक मीडियाकर्मी की मौत होना क्या खबर नहीं है? क्या उसकी मौत के बाद उसका परिवार पीड़ित नहीं है? क्या उसे सहारे की जरूरत नहीं है? लेकिन मीडिया के लिये किसानों की मौत तो हत्या हो सकती है मगर पत्रकार की मौत… इस पर कोई सवाल उठाने को तैयार क्यों नहीं है।

अरे खुद को सर्वशक्तिमान समझने वाले मीडिया से अच्छे तो किसान संगठन हैं जिन्होंने प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार तक को हिला दिया। जगह-जगह प्रदर्शन किये, आवाज उठाई तो राजनीतिक दलों के नेताओं में लखीमपुर पहुंच कर मृतक किसानों के परिवार से मिलने की होड़ लग गयी। सरकार भी घुटने टेक कर किसानों को मनाने में लग गयी। किसान के पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर सवाल उठे तो दोबारा पोस्टमार्टम भी करा दिया। तुम्हारा परिवार कहता रह गया कि मौत गोली लगने से हुई तो किसी ने सुना तक नहीं। राजनेताओं पर लखीमपुर जाने पर रोक लगायी गयी थी मगर तमाम मीडिया संगठनों में से किसी ने भी तुम्हारे परिवार से मिलने के लिए जाना उचित समझा? पत्रकार हित में आवाज उठाने, एकजुट होकर एक-दूसरे का सहारा बनने का दावा करने वाले किसी भी मीडिया संगठन ने तुम्हारे परिवार का सहारा बनने की कोशिश की।

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हां, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया तुम्हारी मौत के कारणों का पता करने के लिये जांच कराने की मांग कर पहल तो की है। मगर यह मांग क्यों मीडिया संस्थानों ने नहीं उठाई, क्यों तुम्हारी आवाज उठाने से परहेज किया? क्यों वो तुम्हारे साथ नहीं थे? तुम न किसानों के विरोधी थे न भाजपाईयों का रास्ता रोकने को खड़े थे।, तुम तो सिर्फ पत्रकारिता का फर्ज अदा कर रहे थे। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जान गंवाने वाले को शहीद कहा जाता है तो पत्रकार संगठन क्यों तुम्हें शहीद का सम्मान नहीं दे रहे। क्योंकि तुम किसान नहीं थे, क्योंकि तुम सिर्फ एक पत्रकार थे???