ठोकर लगी तो सपा नरेश को दिखाई पड़ी ज़मीन

यह भी कह सकते हैं कि अखिलेश ने खुद ही उन्हें दूर कर दिया है, इसमें उनके सगे चाचा शिवपाल यादव भी हैं.
 
akhilesh yadav
Illustration By Hasan Zaidi

तौक़ीर सिद्दीकी

कहते हैं कि इंसान को जब ठोकर लगती है तभी बात उसकी समझ में आती है, कुछ ऐसा ही समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव के साथ हो रहा है. विधानसभा चुनावों में सत्ता वापसी का सपना ऐसे चकनाचूर हुआ कि काफी दिनों तक उन्हें यक़ीन ही नहीं हुआ कि उनके साथ क्या हुआ है, बहरहाल जब होश आया तो बहुत कुछ लुट  चूका था, जो बचा था उसे सहेजने की ज़रुरत थी हालाँकि उसमें भी वह नाकाम ही रहे हैं. पिछले विधानसभा चुनावों में साथ आये कई सहयोगी अब उनसे दूर जा चुके हैं या यह भी कह सकते हैं कि अखिलेश ने खुद ही उन्हें दूर कर दिया है, इसमें उनके सगे चाचा शिवपाल यादव भी हैं.

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खैर सपा सुप्रीमो अब अपनी पार्टी को सहेजने में जुटे हुए हैं, शायद उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि राजनीति में ज़मीन पर उतरना कितना ज़रूरी है। राजनीति की जंग सोशल मीडिया के ज़रिये नहीं लड़ी जा सकती, चुनावी लड़ाई में सोशल मीडिया एक सहायक की भूमिका ज़रूर निभा सकता है लेकिन इस पर भरोसा करना सच्चाई से आँखें मूंदने के बराबर है क्योंकी इस आभासी दुनिया में शायद सबकुछ आभासी ही रहता है इसलिए अखिलेश अब सपने की दुनिया से निकलकर सच के संसार में आने और जमने का प्रयास शुरू कर रहे हैं. इसकी शुरुआत उन्होंने सदस्यता अभियान से की है. एक लम्बी चौड़ी लिस्ट तैयार की गयी है उन ज़िम्मेदारों की जिन्हें यह टास्क मिला है कि वह पूरे प्रदेश में सघन तौर पर लोगों समाजवादी पार्टी से जोड़ें।

इसके अलावा मुस्लिम समर्थक पार्टी के ठप्पे को भी समाजवादी पार्टी अब हटाना चाहती है और शायद यही वजह कि अखिलेश धर्म पर राजनीती या कोई बयान देने से बच रहे हैं यहाँ तक कि कई मीडिया वालों के उकसाने पर भी अखिलेश यादव ने कांवड़ यात्रा को लेकर बयानबाज़ी से परहेज़ किया। वरना इससे पहले वह इस बात की चर्चा ज़रूर करते थे कि उनके शासन में कांवड़ियों के लिए क्या क्या व्यवस्थाएं की जाती रही हैं. यह परिवर्तन अखिलेश या समाजवादी पार्टी के सॉफ्ट हिंदुत्व का संकेत दे रहा है. अखिलेश को इस बात का एहसास हो रहा है कि सत्ता चाहिए तो सिर्फ मुसलमानों से काम नहीं चलने वाला, हालाँकि यह बात भी सौ फ़ीसदी सच है कि समाजवादी पार्टी को इसबार जो सीटें मिली हैं उसमें यादवों से ज़्यादा मुसलमानों का हाथ है.

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पर देर आयद दुरुस्त आयद वाली बात ही कही जायगी जो ज़मीन पर उतरना अखिलेश यादव की मजबूरी बनी. समाजवादी पार्टी की अगली परीक्षा 2024 का लोकसभा चुनाव है, सपा के लिए पांच सीटों से आगे बढ़ना बेहद ज़रूरी है, पिछली बार गठबंधन का फायदा तो बहनजी ले गयी थी. 2027 के लिए कुछ ज़मीन तैयार करना है तो 24 में 24 का लक्ष्य तो बनाना ही पड़ेगा। वैसे पिछले कुछ हफ़्तों से सपा में कुछ बदलाव भी दिख रहा है. कन्नौज और जौनपुर में अखिलेश यादव ने कुछ छोटी सभाएं की हैं और अगस्त क्रांति दिवस यानी 9 अगस्त से पूर्वांचल में “देश बचाओ देश बनाओ समाजवादी पदयात्रा” की शुरुआत करने जा रही है. पहला चरण गाज़ीपुर से शुरू होगा। यात्रा बलिया, मऊ ,आजमगढ़, जौनपुर, भदोही होते हुए वाराणसी पहुंचेगी और पहले चरण का समापन होगा। अगले चरण का एलान इसके बाद होगा। इस पूरी यात्रा के दौरान अखिलेश यादव गाँव देहात के लोगों से जुड़ने की कोशिश करेंगे। यात्रा के दौरान कोशिश होगी कि सिर्फ सपाइयों की भीड़ न दिखे बल्कि आम लोगों की भागीदारी हो. अब देखना होगा कि पूर्वांचल के लिए अखिलेश यादव का ये मेगा प्लान कितना कारगर साबित होता है.