- सीमा चतुर्वेदी

दिन पर दिन असंतुलित और बायस्ड होती जा रही मीडिया के रवैयों को देखकर अक्सर लोगों के लब पर एक वाक्य आता रहा है-
जिस मीडिया का ज़मीर मर गया हो इसकी रक्षा भगवान भी नहीं कर सकता !
शायद भगवान ऐसे जुमलों से नाराज हो गये और उन्होंने हिम्मत और हौसलों से भरी ईमानदार पत्रकारिता की रक्षा करने वालों को अवतरित करना शुरु कर दिया। मेरठ में किसान महापंचायत के मंच पर कुछ ऐसा हुआ कि मझधार में डूबती हुई पत्रकारिता को सहारा मिलता दिखाई दिखाई दिया| देश के चौथे खम्भे के प्रति लोगों में बढ़ती निराशा के बीच आशा की किरन दिखाई देने लगी।
मेरठ में किसान महापंचायत के मंच पर उम्मीद की रोशनी दिखी। निष्पक्षता और सच्चाई की सिसकती सांसों को देख कर लग रहा था कि पत्रकारिता की रक्षा कोई नहीं कर सकता। एक न्यूज चैनल के पत्रकार रक्षित जैसी साहसी ताकतें अब पत्रकारिता की रक्षा के लिए आगे आने लगी हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन की कड़ी में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महापंचायतों का सिलसिला जारी है। इसी क्रम में बीते शनिवार को मेरठ में किसान पंचायत के मंच पर अपने न्यूज चैनल पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाते हुए साहसी रक्षित ने इस्तीफे की घोषणा कर दी।
उन्होंने कहा कि उनपर दबाव बनाया जा रहा था कि किसानों की आवाज दबाने के लिए वो कम भीड़ दिखाने का मैनेजमेंट करें। कार्यक्रम से पहले ही वो अपनी यूनिट से मंच के आसपास के सन्नाटे का फुटेज मैनेज करवाएं। उन्होंने कहा कि वो झूठी रिपोर्ट दिखाने का गुनाह ना करके इस्तीफा देना बेहतर समझते हैं। चाहे उन्हें जितनी भी तकलीफों और खतरों का सामना करना पड़े पर वो पत्रकारिता की निष्ठा,सरोकारों,आदर्शों, मूल्यों और कर्तव्य निभाने की जिम्मेदारी का गला नहीं घोटेंगे।
उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि न्यूज चैनल्स सच्ची खबरें नहीं दिखाते हैं और मीडिया कर्मियों पर सच दबाने और झूठ दिखाने का दबाव होता है। रक्षित ने कहा कि चैनल में उनका सालाना सैलरी पैकेज बारह लाख से ज्यादा है। यानी करीब एक लाख रुपए वेतन की नौकरी को वो त्याग रहे हैं। जबकि इस वेतन से ही उनका घर चलता है। एक छोटा बच्चा,पत्नी और बूढ़े बाप सहित पूरा परिवार उनकी इस तनख्वाह पर निर्भर है जिसे उन्होंने त्याग दिया। सच के खिलाफ और झूठ के आगे सिर झुकाने वाली नौकरी या तनख्वाह उन्हें क़बूल नहीं है भले उन्हें भूखा ही रहना क्यों ना पड़े। उन्होंने आशंका जताई कि हो सकता है कि उनके खिलाफ मुकदमें दर्ज हों। उन्हें देशद्रोही कहा जाए। ट्रोल किया जाए। उनकी पत्नी और मां को बुरा भला कहा जाए। हो सकता है कि उनके पीछे से आ रही किसी ट्रक का ब्रेक फेल हो जाए। जो भी हो, वो सब कुछ सहने को तैयार हैं पर झूठी खबरों के जरिए पत्रकारिता को कलंकित नहीं होने देंगे।
इस हिम्मत, हौसले और कुर्बानी को देखकर पत्रकार रक्षित देश में चर्चा का विषय बन गए। लोग कह रहे हैं कि इस पत्रकार ने ना सिर्फ पत्रकारिता की बल्कि अपने नाम की भी लाज रख ली। रक्षित का अर्थ होता है रक्षा करने वाला और रक्षित पत्रकारिता के “रक्षित” साबित हुए। इसलिए गोदी मीडिया के दौर में पत्रकार रक्षित को सलाम तो बनता ही है|

