बिजली का संकट, ब्लैक आउट की बातें और चिंता में देश

 

अमित बिश्‍नोई

कोरोना महामारी से जूझ रही दुनिया इस समय एक नए संकट में घिरती जा रही है और वह है बिजली का संकट। कोरोना महामारी की तरह इस संकट की शुरुआत भी चीन से ही हुई. जर्मनी, लेबनान और कई अन्य देशों से होता हुआ यह संकट अब भारत पहुँच चूका है जिसने सरकार को भले ही चिंता में न डाला हो पर देशवासियों को चिंता में ज़रूर डाल दिया है. बिजली पर जीवन की निर्भरता को बताने की ज़रुरत नहीं। जल ही जीवन की तरह अब बिजली भी जीवन है.

सरकार भी इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि देश में बिजली संकट है और उसकी वजह है कोयला। दरअसल देश में बिजली उत्पादन का मुख्य स्रोत थर्मल पावर प्लांट हैं जो कोयले पर निर्भर रहते हैं. देश की 70 प्रतिशत बिजली इन्ही थर्मल पावर प्लांटों से बनती है. इन प्लांटों में कोयले की आपूर्ति ठप्प होने से यह पावर प्लांट एक एक करके बंद होने लगे हैं और नौबत यहाँ तक पहुँच गयी है कि देश के कई राज्यों में बिजली का गंभीर संकट पैदा हो गया, यहाँ तक कि देश की राजधानी दिल्ली में ब्लैक आउट की वार्निंग दे दी गयी है. कई अन्य राज्यों ने भी केंद्र को पत्र लिखकर पैदा होने वाली स्थितियों पर चिंता ज़ाहिर की है और जल्द ही कुछ करने को कहा है वहीँ केंद्र सरकार इन स्थितियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमतों में तेज़ इज़ाफ़े को वजह बताकर ज़िम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही है बिलकुल उसी तरह जैसे पेट्रोल-डीज़ल की आसमान छूती कीमतों का ठीकरा अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार पर फोड़कर वह बचने की कोशिश करती रही है.

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हालाँकि यह सच है कि इंटरनेशनल मार्केट में कोयले की कीमतों में इज़ाफ़ा दुनिया भर में बिजली संकट की एक बड़ी वजह है, यह भी सच है कि मार्च से अक्टूबर तक कोयले के दाम 60 डॉलर प्रति टन से 160 डॉलर प्रति टन हो चुके हैं मगर भारत में बढ़ते बिजली संकट की सिर्फ यही वजह नहीं है. सरकार को यह अच्छी तरह मालूम था कि कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने से उद्योग जगत ढर्रे पर आएगा और बिजली की खपत भी बढ़ेगी लेकिन सरकार ने इसकी पहले से कोई तैयारी नहीं की. बरसात के दिनों में सभी को मालूम है कि खनन वाले कार्य लगभग बंद रहते हैं ऐसे में भण्डारण करके ही डिमांड और सप्लाई में संतुलन बनाया जाता है. कोरोना महामारी का बहाना लेकर सरकार ने भण्डारण व्यवस्था पर कोई ध्यान नहीं दिया, परिणाम स्वरुप हमें कोयले के लिए विदेशी बाजार पर निर्भर होना पड़ा जहाँ कोयले की कीमतों में आग लगी हुई है. यही वजह है कि अचानक थर्मल पावर प्लांटों में कोयले की कमी हो गयी और वह एक के बाद एक बंद होने लगे.

देश में इस समय कुल 135 थर्मल पावर प्लांट्स हैं जो कोयले पर आधारित हैं. बिजली के उत्पादन के लिए इन पावर प्लांटों में कोयले का स्टॉक 40 दिन का सुरक्षित रखा जाता है ताकि कोयले की कमी से उत्पादन न रुके। अब कोयले की कमी के कारण पावर प्लांटों में यह सुरक्षित स्टॉक लगभग ख़त्म हो गया है, किसी के पास दो तो किसी के पास तीन दिन का स्टॉक बचा है, यही वजह है जो देश में ब्लैक आउट की बातें चल रही हैं.

राज्यों की बात करें यूपी में आठ पावर प्लांट कोयले की कमी के कारण बंद हो चुके हैं. पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश के पॉवर प्लांटों में कोयले का गंभीर संकट है, ऐसे में सरकार के सामने भी एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है, इनमें से उत्तर प्रदेश और पंजाब दो ऐसे राज्य हैं जहाँ कुछ ही महीनों में चुनाव होने वाले हैं. भाजपा शाषित केंद्र सरकार के लिए उत्तर प्रदेश में बिजली संकट पैदा होना उसकी चुनावी सेहत के लिए ठीक नहीं होगा।

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आने वाले दिनों में विपक्ष इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर जनता के सामने पेश कर सकता है. चुनावी मौसम में भाजपा के लिए इन दिनों ऐसे भी शनि का प्रकोप चल रहा. भाजपा शासित केंद्र और कई राज्य सरकारों में हुई कई घटनाओं ने पार्टी और सरकार को परेशान कर रखा है ऐसे में अगर कोयले की कमी से पैदा हुए बिजली संकट को जल्द हल न किया गया तो इसे चुनावी मुद्दा बनने से कोई नहीं रोक सकता। वैसे भी सोशल मीडिया पर इस तरह की बातें गश्त करने लगी हैं कि बिजली का यह संकट मोदी सरकार द्वारा पैदा किया हुआ है ताकि पावर सेक्टर को भी पूरी तरह निजी हाथों में बेचा जा सके. वैसे वर्तमान सरकार की जो कार्यप्रणाली है उसमें ऐसा होना संभव भी हो सकता है.

बहरहाल भगवान् न करे देश के किसी भी हिस्से में ब्लैक आउट की नौबत आये लेकिन अगर ऐसा हो गया तो अपने को विश्वगुरु स्थापित करने में जुटे भारत की छवि पर यह कोयले की कालिक जैसा एक एक काला धब्बा होगा।