राजनीतिक दलों के शिकंजे में जकड़ते पंचायत चुनाव

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राजनीतिक दलों के शिकंजे में जकड़ते पंचायत चुनाव

सुनील शर्मा

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। प्रत्याशी कमर कस कर चुनावी मैदान में उतरने को तैयार हैं। पंचायत चुनाव कहने को तो गांव की सरकार का चुनाव है मगर वर्तमान में राजनीतिक दलों की ग्रामीण मतदाताओं तक पहुंचने की महत्वकांक्षा ने गांव के चुनाव को बेहद खास बना दिया है। पंचायत चुनाव में राजनीतिक दलों के दखल ने गांव की सरकार के चुनाव को हाईप्रोफाइल बना दिया है। राजनीतिक महत्वकांक्षाएं बढ़ी तो सामान्य माने जाने वाले चुनाव में अवैध हथियार, शराब और पैसे का प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा। ग्राम प्रधान की सम्मानित पदवी अब राजनीति का प्रवेश द्वार समझी जाने लगी है। राजनीतिक दलों के शिकंजे में जकड़ते जा रहे पंचायत चुुनाव अपनी स्थापना की मूल भावना और उद्देश्य को खोते जा रहे हैं। क्यों जरूरी समझी गयी गांव की सरकार, क्या थे मूल उद्देश्य और अब क्या है स्थिति आईये जानते हैं बिजनेस बाइट्स की खास रिपोर्ट में

पंच हुुआ करते थे परमेश्वर

भारत में प्राचीनकाल से ही पंचायत का राज अस्तित्व मे रहा है। यह पंचायत पांच पंचों की सरपरस्ती में चलती थी जो गांव के सम्मानित व्यक्ति होते थे। इन पांच पंचों को पंच-परमेश्वर कहा जाता था और इनके फैसलों को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाता था। पंच परमेश्वर के रूप में चुने गये पांच अलग-अलग गुणों वाले बुजुर्ग व्यक्तियों को समाज में आदरभाव से देखा जाता। गाँव में रहने वाले लोगों के बीच का मतभेद दूर करने, गांव की रक्षा, गांव का विकास, समुदायपरक समाधान निकालने में निपुण यह पंच परमेश्वर गांव के बड़े-बड़े मसले भी पंचायत में ही सुलझा लिया करते थे। यही कारण था कि गांव के मसले पुलिस-कचहरी में जाने की बजाये पंचायत में ही सुुने जाते थे। व्यवस्था-निर्माण करने की परिचायक मानी जाती पंचायत भारतीय सभ्यता और संस्कृति की पहचान रही हैं। वर्तमान में भी पंचायतों के अनेक फैसलों ने देश की राजनीतिक की दशा और दिशा को प्रभावित किया है।
प्राचीनकाल से लेकर ब्रिटिश शासन काल और वर्तमान में भी पंचायतों के कायम रहने का मुख्य कारण यह है कि गांव से ऊपर सभी इकाईयों जैसे देश या राज्य की सीमाएं बदलती रहीं मगर भौगोलिक और सामाजिक बदलावों से अछूता गांव एक स्थिर इकाई बना रहा। अंग्रेजी शासनकाल में भी भारत में पंचायत परंपरा के महत्व को गंभीरता से लिया गया। 1830 में तत्कलीन गर्वनर जनरल मेटकाॅफ ने ब्रिटिश पार्लियामेंट की भेजी रिपोर्ट में लिखा, ‘’ग्राम समुदाय छोटे-छोटे गणराज्य है, जो अपने लिए सभी आवश्यक सामग्री की व्यवस्था कर लेते हैं। ये सभी प्रकार के बाहरी दबावों से मुक्त हैं। इनके अधिकारों और प्रबंधों पर कभी कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ। एक के बाद एक साम्राज्य आते गए, क्रांतियां एवं परिवर्तन हुए पर ग्राम-समुदाय की व्यवस्था उसी तरह बनी रही। 1786 में लार्ड वर्क द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में लाये महाभियोग के साथ ही अंग्रेजों ने पंचायत व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास किया मगर वह नाकामयाब ही रहे।

राजनीतिक दलों के शिकंजे में जकड़ते पंचायत चुनाव

आपसी सहमति से चुना जाता था ग्राम प्रधान

1947 में देश को आजादी मिलने के साथ ही राज्यों में अंतरिम सरकार का गठन हुआ। इसके बाद गांवों की पंचायतों का समाज में महत्व समझते हुए बिहार पंचायत राज अधिनियम 1947 का गठन किया गया। देश में पंचायत राज को सशक्त बनाने, व्यवस्थित विकास की जिम्मेदारी देने तथा लोकोपयोगी बनाने के लिए राष्ट्र तथा राज्य स्तर पर कई कमेटियों का गठन कर समय-समय पर उनमें बदलाव भी किये गये। पंचायत का वर्तमान स्वरुप 24 अप्रैल 1993 से पूरे देश में लागू हुआ था। इस संशोधन द्वारा पंचायत राज को संवैधानिक दर्जा देने के साथ-साथ सारे देश में इस व्यवस्था में एकरूपता लाने का प्रयास भी शामिल किया गया।

पंचायत राज को संवैधानिक दर्जा मिलने के बाद भी गांव में पंच चुने जाने और महत्वपूर्ण मामलों पर पंचायत आयोजित करने की परंपरा जारी रही। राजनीति से अछूते पंचायत चुनावों में आमतौर पर गांव के दो प्रतिष्ठित व्यक्ति ही चुनावी मैदान में उतरते थे। चुनाव से पहले या कई बार तो चुनाव की घोषणा होने के तुरंत बाद ही गांवों में पंचायत बैठती और गांव का प्रधान के नाम पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाता था। पूर्व में ही सबकुछ तय हो जाने के बाद मतदान करना औपचारिकता मात्र रह जाता था। यही कारण था की गांव के पंचायत चुनाव आमतौर पर शांतिपूर्ण होते थे। न चुनाव जीतने वाला जश्न मनाता था और न हारने वाला गम। पंच और पंचायत का फैसला सबके सिर माथे होता था। जीतने वाले को पद मिलता तो हार स्वीकार करने वाले को सम्मान। अक्सर देखा जाता था कि चुनाव जीतने और चुनाव हारने वाला प्रत्याशी एक साथ खड़े होकर मतदान संपन्न कराते थे। जीते हुए प्रत्याशी पर गांव के भरोसे पर खरा उतरने की जिम्मेदारी होती थी और वह अपने दायित्वों का पूर्णतया निर्वहन भी करता था। ग्राम प्रधान गांव की समस्याओं को शीर्ष स्तर पर उठा कर सुलझाने का प्रयास करता और गांव में सामानंतर चलती पंच-परमेश्वर की व्यवस्था ग्राम प्रधान के कार्याें पर निगाह रखती थी। यही पंचायती राज की मूल भावना थी और यही संवैधानिक दर्जा देने का उद्देश्य भी था।

राजनीतिक दलों के बढ़ते प्रभाव से बदला पंचायत चुनाव का स्वरूप

आजादी के बाद एक लंबे अरसे तक पंचायत चुनाव राजनीतिक दलों की पहुंच से दूर रहे। क्षेत्रीय दलों ने ग्राम पंचायत चुनाव में दखलअंदाजी का प्रयास किया तो गांवों ने एक सुर में उन्हें नकार दिया। मगर देेश के मतदाताओं का बड़ा हिस्सा गांव में रहता है जिस पर राजनीतिक दलों की निगाहें लगी रहीं। धीरे-धीरे क्षेत्रीय दलों ने पंचायत चुनाव में अपना कदम बढ़ाना शुरू किया। शुरूआत में पंचायत चुनाव में अपने दल का प्रत्याशी उतारने की बजाये राजनीतिक दलों ने चुनावी मैदान में उतरे प्र्रत्याशियों को बाहर से समर्थन देना शुरू कर दिया। राजनीतिक दलों द्वारा समर्थित प्रत्याशियों की जीत ने गांव पंचायत चुुनाव में राजनीति के प्रभाव को स्थापित कर दिया। वहीं गांव-किसान के संगठनों ने राजनीतिक दलों को विधानसभा-लोकसभा चुनाव में बाहरी समर्थन देना शुरू कर दिया। यह आपसी समझौता तेजी से बढ़ता गया और आज क्षेत्रीय दल ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय पार्टियां भी ग्राम पंचायत चुनाव में उतर आयीं हैं। गांवों की सरकार बनाने के लिये राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशी उतारने शुरू कर दिये। ऐसे में पंचायत चुनाव का राजनीतिकरण तेजी से बढ़ा और यह चुनाव अपनी मूल भावना और उद्देश्य से भटकता नजर आ रहा है।

राजनीतिक दलों के दखल से बढ़ी हिंसा

ग्राम पंचायत चुनाव में राजनीतिक दलों के दखल के साथ ही शांतिपूर्ण होने वाले चुनाव रक्तरंजित होने लगे। राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने के साथ बाहुबलियों के चुनावी मैदान में उतरना शुरू हो गया। इसी के साथ पंचायत चुनाव में जहां पैसा और शराब पानी की तरह बहाया जाने लगा। वहीं दबदबा कायम करने को अवैध हथियारों का खुलेआम प्रदर्शन और इस्तेमाल भी शुरू हो गया। पंच परमेश्वर की मौजूदगी में गांव की पंचायत में तय होने वाले ग्राम प्रधान का नाम अब राजनीतिक दल बंद कमरों में तय करने लगे। ग्राम प्रधान प्रत्याशी चुनते समय राजनीतिक दल उसकी क्षेत्र में प्रतिष्ठा, समाज के लिये की गयी सेवा आदि को किनारे रख क्षेत्र के जातिगत आंकडे़ खंगालते हैं। प्रत्याशी की छवि कैसी भी हो बस उसकी जेब में पार्टी को देने और चुनाव में खर्च करने के लिये पैसा होना चाहिये।
पहले जहां ग्राम प्रधान का चयन गांव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों के बीच से ही किया जाता था वहीं आज ऐसे व्यक्ति जो बरसों पहले गांव से संबंध तोड़ चुके थे या जो चुनावद से कुछ समय पहले ही गांव से जुड़े हैं वो चुनावी मैदान में ताल ठोकते नजर आते हैं। धन और बाहुल्य से राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल कर चुनावी मैदान में उतरे यह प्रत्याशी जीत हासिल करने के लिये हरसंभव प्रयास करते हैं। ऐसे प्रत्याशियों की महत्वकांक्षा ग्राम पंचायत चुनाव में हिंसा को जन्म देती है।

पंचायत चुनाव के जरिये ग्रामीण वोटबैंक पर निगाह

बात करें उत्तर प्रदेश में होने वाले ग्राम पंचायत चुनाव की तो इसे अगले साल राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। कारण यह कि गांव की सरकार पर राजनीतिक दलों की निगाह न केवल गढ़ी हुई है बल्कि वह इन चुनावों में जीत हासिल कर ग्रामीण वोटबैंक को अपने पाले में खिंचना चाहते हैं। प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के लिये जरूरी ग्रामीण मतदाताओं का समर्थन हासिल करने के लिये प्रदेश में सत्तारूढ पार्टी भाजपा से लेकर कांग्रेस, सपा, बसपा, रालोद काफी समय से प्रयासरत हैं। वहीं अब अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने भी पंचायत चुनाव में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। इन राजनीतिक दलों के स्टार प्रचारकों द्वारा भी ग्राम पंचायत चुनाव में प्रचार करने की संभावना जतायी जा रही है। ऐसे में ग्राम प्रधान के साथ-साथ बीडीसी मेंबर, ब्लाॅक प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य और प्रदेश के सभी 75 जिलों में जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव दिलचस्प भले हो गया हो लेकिन अपनी स्थापना की आवश्यकता और मूल भावना से भटकाव ग्राम पंचायत चुनाव के उद्देश्य को प्रभावित कर रहा है।

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