अमित बिश्नोई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों अमेरिका के दौरे पर हैं. प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात पहले अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से हुई और उसके बाद यूएस प्रेजिडेंट जो बाइडेन से आमने सामने की मीटिंग हुई. इन दोनों मुलाकातों में अमेरिका के दो रंग नज़र आये. पहला ज्ञान का पाठ पढ़ाने वाला और दूसरा प्यार दुलार का. या आप ऐसा भी कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी जी को पहले खटास का एहसास कराया गया और फिर मिठास का स्वाद चखाया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पिछला अमरीकी दौरा 2019 में हुआ था जब ह्यूस्टन में आयोजित हाउडी मोदी के कार्यक्रम में उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प का चुनाव प्रचार करते हुए “फिर एकबार ट्रम्प सरकार” का भारतीय नस्ल के अमरीकियों से नारा लगवाया था. लेकिन इसबार वह माहौल नहीं था, अमरीका में सत्ता बदल गयी, लोग बदल गए और कोरोना महामारी से हालात भी बदल गए।
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मोदी जी के चेहरे पर इसबार 2017 या 19 के दौरे वाली चमक नज़र नहीं आयी. पिछले दौरों में जिस तरह की झप्पियों वाला माहौल था, कोरोना के कारण वह इस बार नदारद था. प्रेजिडेंट बाइडेन ने तो फिर भी मोदी के बाज़ुओं को पकड़कर गर्मजोशी का मुज़ाहेरा किया मगर मोदी जी के चेहरे पर एक शून्यता दिखी। यह शून्यता शायद इसलिए भी थी कि कमला हैरिस ने लोकतंत्र पर उन्हें अच्छा खासा लेक्चर दे डाला था जिससे उनका मूड बिगड़ना वाजिब था या फिर ऐसा भी हो सकता है कि उनको अपने पुराने मित्र डोनाल्ड ट्रम्प की याद सता रही हो. या फिर इस बात का पश्चाताप भी हो सकता है कि उन्होंने क्यों किसी दूसरे देश की चुनावी प्रक्रिया में दखल दिया और एक पक्ष के लिए वोट मांगे और अब दूसरे पक्ष का लीडर राष्ट्रपति के रूप में उनके सामने बैठा है।
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वैसे कमला हैरिस ने मोदी जी के साथ लोकतंत्र को बनाये रखने के लिए जो बातें कहीं वह यक़ीनन मोदी जी के लिए उनकी दुखती रग पर हाथ रखने वाली थीं . मोदी जी एक प्रधानमंत्री के रूप में यूएस के मेहमान थे मगर कमला हैरिस ने जिस तरह मोदी जी को ज्ञान दिया उसे मेहमाननवाज़ी तो हरगिज़ नहीं कहा जा सकता। जब दुभाषिया कमला हैरिस की बातों का अनुवाद कर मोदी जी को बता रही थी तो उनके चेहरे पर असहजता के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे. हमारे देश में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, कैसे हो रहा है, सरकार उन मुद्दों से कैसे निपट रही है यह हमारा अंदुरुनी मामला है. किसी और देश को अपने यहाँ बुलाकर उसे उसके अंदुरुनी मामलों पर ज्ञान बांटना हरगिज़ सही नहीं कहा जा सकता। शायद यही वजह थी जो अमरीकी राष्ट्रपति से मुलाकात के समय मोदी जी में गर्मजोशी वाला भाव नहीं था।

अब सवाल उठता है कि अमरीका की उपराष्ट्रपति द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को लोकतंत्र पर ज्ञान देना क्या उनका अपना नज़रिया था या इसके पीछे अमेरिका की कोई कूटनीति शामिल थी. आमतौर पर किसी देश के प्रमुख से आमने सामने इस तरह की बातें हरगिज़ नहीं की जातीं जिनसे संबंधों में खटास पैदा हो, इसलिए ऐसा बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि इसके पीछे अमेरिका की कोई मंशा न हो, हालाँकि अपने सम्बोधन में कमला हैरिस ने पूरी दुनिया में लोकतंत्र पर बढ़ते खतरे की बात कही थी मगर उनका इशारा कहाँ और किसकी तरफ था यह साफ़ ज़ाहिर था.
शायद यही वजह थी कि दो देशों के प्रमुखों की मुलाकात में जो बाइडेन ने ज़्यादा गर्मजोशी दिखाई। क्योंकि बाइडेन को इस बात का अच्छी तरह से एहसास है कि भारत एक बड़ी शक्ति है, एक बड़ा बाजार है, युवा टैलेंट का बड़ा हब है जिसकी ज़रुरत पूरी दुनिया को है. दुनिया का कोई भी देश अब भारत को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। बाइडेन ने भी बातचीत में स्वीकारा कि दोनों देशों को एक दूसरे की ज़रुरत है।
भले ही दुनिया के दो सर्वोच्च नेताओं के बीच 2019 वाली गर्मजोशी न हो मगर दोनों एक दूसरे को नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकते। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद वैश्विक स्तर पर बड़ी तेज़ी से बदलाव हुए हैं. भारत को जहाँ पड़ोसी पाकिस्तान पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका की ज़रुरत है वहीँ अमेरिका को चीन के बढ़ते कारोबारी वर्चस्व को रोकने के लिए भारत का साथ बेहद ज़रूरी है. इसलिए दोनों देशों के बीच “दिल मिले न मिले हाथ मिलाते रहिये” वाली बात चल रही है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या अमरीकी राष्ट्रपति भारत के प्रधानमंत्री के साथ उसी तरह के संबंधों को स्थापित रखेंगे जैसे कि डोनाल्ड ट्रम्प के समय में थे। वहीँ क्या भारत भी अमेरिका के साथ उसी तरह की रणनीतिक साझेदारी के साथ आगे बढ़ेगा जो ट्रम्प और मोदी के समय स्थापित हुई थी? आखिर में एक बात, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अबतक अमेरिका का 6 बार दौरा किया है और इन सभी दौरों में इस दौरे को निश्चित ही सबसे ठंडा दौरा कहा जा सकता है।

