कांग्रेस को भारी पड़ सकता है इमरान प्रतापगढ़ी का प्रमोशन!

 
 इमरान प्रतापगढ़ी का प्रमोशन

अमित बिश्‍नोई


कांग्रेस पार्टी ने कल जबसे राज्यसभा के लिए अपने 10 उम्मीदवारों के नामों का एलान किया है तब से पार्टी के अंदर हंगामा मचा हुआ है. ग़ुलाम नबी आज़ाद और आनंद शर्मा जैसे पुराने और बाग़ी कांग्रेसियों को किनारे कर प्रियंका गाँधी के चहीते शायर इमरान प्रतापगढ़ी और राहुल गाँधी के नज़दीकी पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला को तरजीह दी गयी है. यूपी के तीन तीन लोगों को एडजस्ट किया गया गया है, ज़ाहिर सी बात है कि दुसरे प्रदेशों में ही एडजस्ट किया जाएगा क्योंकि यूपी में तो उसकी किसी दूसरे को सपोर्ट करने की भी हैसियत नहीं है. 

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कांग्रेस पार्टी में जो 10 नाम घोषित हुए हैं उनमें सबसे ज़्यादा विरोध कांग्रेस पार्टी या फिर कहें कि पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी के नए नए चहीते शायर इमरान प्रतापगढ़ी का हो रहा है, यह वही इमरान प्रतापगढ़ी हैं जिन्हें 2019 में कांग्रेस पार्टी ने मुरादाबाद से टिकट दिया था और वह बुरी तरह चुनाव हारे थे. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के स्टार प्रचारक थे, विशेषकर जहाँ जहाँ पार्टी ने मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा। चुनाव में पार्टी का क्या हाल हुआ सबके सामने है. 

इन्हीं इमरान प्रतापगढ़ी की उम्मीदवारी पर पवन खेड़ा और नग़मा जैसे पुराने कांग्रेसी सवाल उठा रहे हैं, दिल का दर्द बयान कर रहे हैं, अपनी 18 साल की तपस्या पर शक करने लगे हैं. इन लोगों का सवाल उठाना, दर्द का इज़हार करना जायज़ है. कितना लम्बा है शायर महोदय का कांग्रेस पार्टी का साथ, दो साल, तीन साल या चार साल. कांग्रेस पार्टी के लिए इन्होने कौन से तीर मार दिए जो उन्हें राज्यसभा के लिए नॉमिनेट कर दिया। राज्यसभा कोई मुशायरे का मंच नहीं जो अपनी तथाकथित इंकलाबी शायरी का वहां इज़हार करेंगे। देश के गंभीर मुद्दों पर वहां गंभीर चर्चा होती है, इसीलिए उसे उच्च सदन कहा जाता है और इसलिए सभी पार्टियां वहां पर उन लोगों को भेजती हैं जो मुद्दों की गंभीरता को समझते हैं. मेज़ें थपथपाने के लिए नहीं, उसके लिए लोकसभा काफी है जहाँ डायलॉग बाज़ी से ज़्यादा काम लिया जाता है. शायर महोदय को पार्टी ने 2019 में मौका दिया था लोकसभा जाने का मगर वह उसके काबिल ही नहीं निकले। 

पवन खेड़ा क्या करते? क्या इमरान उनसे अच्छे वक्ता हैं, उनसे अच्छी राजनीतिक जानकारी रखते हैं, मुद्दों को समझने और उस पर बहस करने की उनकी समझ क्या पवन खेड़ा से ज़्यादा है. पिछले कई वर्षों से दिल्ली की मीडिया के चुभते सवालों के हमलों पर पवन खेड़ा जिस तरह से पार्टी का बचाव कर रहे हैं क्या शायर महोदय उन चुभते सवालों को एक दिन भी झेल पाएंगे। पवन खेड़ा एक अनुशासित सिपाही हैं. सिर्फ इतना ही कहा "लगता है मेरी तपस्या में कोई कमी रह गयी". इससे शालीन विरोध और क्या हो सकता है. 

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नग़मा ने भी अपने दर्द का इज़हार भी कुछ इसी तरह किया कि मेरी 18 सालकी तपस्या पर इमरान भाई भारी पड़ गए. इतने साल से पार्टी की स्टार प्रचारक के रूप में काम करने वाली नग़मा का अगर दर्द न छलके तो वह और क्या करे? सोनिया गाँधी ने 18 साल पहले वादा किया था, आजतक नहीं निभाया। नग़मा शिकायत न करे तो क्या करे. क्या राजस्थान के उदयपुर में कांग्रेस पार्टी ने यही संकल्प लिया था कि चापलूसों को प्रसाद बांटो और श्रद्धालुओं को भूखा रखो. कांग्रेस में ऊपर बैठे हुए लोग पता नहीं किन ख्यालों में रहते हैं. भूल जाय कांग्रेस पार्टी कि जनता उन्हें एकदिन सत्ता प्लेट में परोसकर देगी। इमरान प्रतापगढ़ी हों, सुजरेवाला हों या फिर राजीव शुक्ला, ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। ज़रुरत है सही जगह पर सही आदमी भेजने की और जो पार्टी इसमें नाकाम तो समझिये उनकी राजनीति भी नाकाम।